बुधवार, 31 अगस्त 2011

दामोदर लाल ‘जांगिड़' की अन्ना हजारे को समर्पित ग़ज़ल

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ग़ज़ल

जो सुने ना प्रजा की हुंकार ।

बिलकुल बहरी है सरकार॥

 

प्रजातंत्र की पीर अपार,

बन गयी ‘अन्‍ना' का दरबार।

 

राज मुकुट सिंहासन डोले,

सुन कर ‘अन्‍ना' की ललकार।

 

डटे रहेंगे डट कर जो हम,

झुक जायेगी ये सरकार।

 

कई साल से सोयी थी जो,

जागी जनता फिर इक बार।

 

उनके तेवर देखे समझा,

क्‍यो पसरा हैं भ्रष्‍टाचार।

 

प्रजातंत्र की हर धमनी में,

हुआ नये खून का फिर संचार।

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