मंगलवार, 30 अगस्त 2011

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ

और ख़्वाब देखना मना है

जागते रहो,

अपनी आँखों मे उगंलियाँ डाल कर

क्योंकि सोने में खतरा है

ख्वाब देखने का,

और ख़्वाब देखना मना है ।

हो सकता है, तुम्हें डर हो

अपनी मौत से,

पर यहाँ तो खतरा है ज़िन्दगी से,

मौत के बाद,

कम से कम नहीं कोई रहेगा

रक्त का हिसाब

और प्यार की कीमत लेने वाला

नहीं कोई मिलेगा

जो परंपराओं को लाकर

करा सके तुम्हारा मुँह बन्द

सोचो मत,

सोचने से खतरा है सच बोलने का

और सच बोलने वाले को

या तो दे दिया जाता है ज़हर

या चढ़ा दिया जाता है सूली पर ।

चलते रहो,

खड़े होने में खतरा है

किसी साजिश के शिकार होने का

और साजिश नहीं देखती

इंसान की नीयत ।

अपनी इच्छाऒं को सूली पर टांग कर

सूअर की तरह खाओ मैला

तो देखो ज़िन्दगी कितनी आसान है,

चिल्लाओ मत ,

नक्कारखानें की तूती

अन्धेरे के जुगनूँ

ज़िन्दगी ऐसे नहीं गुजरती .......!

----

 

प्रेम पानी है

प्रेम अब भी है दिलों में

धड़कन की तरह

प्रेम कंपकपाते होंठों पे आते हैं

लरजते बोल की तरह

पेड़ों की कोंपलें बन

फूट पड़ते हैं प्रेम

प्रेम के सहारे मॉ पाल जाती है

बच्चों को,

प्रेम के सहारे बुढ़ा जाती है मॉं

प्रेम के सहारे ही बाप सह लेता है

सारे अपमान

प्रेम के सहारे बिता दी तुमने

सारी जवानी

प्रेम के सहारे ही लोग

बिना पतवार पार कर जाते हैं नदी

प्रेम के सहारे ही नदियाँ

समा जाती है समन्दर में

प्रेम को मत रोको

प्रेम पानी है

ढ़ूंढ लेगा खुद रास्ता अपना।

--

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव

५/२ ए रामानन्द नगर

अल्लापुर, इलाहाबाद

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