मंगलवार, 23 अगस्त 2011

पुरुषोत्तम व्यास की कविता - कहते हैं - भारतीय है

 

कहते हैं-भारतीय है।
 
पीट-पीट कर मेजों को
अधिकार की लड़ाई-लड़ते
सुनते-नहीं
मिलते-नहीं
मतलब के बयान देते।
 
परिवार –हमारा
गीत-उसी पर लिखते।
 
विद्वान-हैं हम
इस-पर सुर्खियों पर छाये रहते
बात-एक
हजार-बार दोहराना
भूसे-पर रोटी सकते हैं।
 
अधिकार की लड़ाई
भाषा-की
विचारों-की
सिर्फ अपने लिये
सेनापति-बन गये
बिना-जिये सैनिक का जीवन।
 
सुख-संपन्नता-वैभव पाना
जरूरी हैं-
दूसरे-के मुख से निवाला-छिनना
भी उचित है।
 
कुर्सी –पर बैठकर
बिना-कुछ लिये
नही-होता सांसों में उतार चढ़ाव
लार-टपकते ऐसी
कुत्ते भी झेंप जाते।
 
मुनियों की पावन-धरती
ज्ञान ही जहाँ पूजा
सुंदर-से विचारों
जहाँ-अपनाया जाता।
 
ऋषि-दधीचि का दान
इन-कथाओं असर नही
स्वार्थ का हर तरफ खेल दिखता
फिर-भी
गर्व से कहते हैं-
हम भारतीय हैं ।
 
---
ई-मेल pur_vyas007@yahoo.com

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------