एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - जज्बात

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जज्बात

भ्रष्टाचार के विरुद्ध हो रहे प्रदर्शनों को देख-सुनकर रामू से भी नहीं रहा गया। अपने कुछ दोस्तों को साथ लेकर शहर के भगत सिंह चौराहे पर पहुँचकर जोर-जोर से नारे लगाने लगा। देखते ही देखते कई सो लोग इकट्ठा हो गए।

रामू ने बोलना शुरू किया। भ्रष्टाचार! भ्रष्टाचार! भ्रष्टाचार! आखिर यह जनतंत्र है कि भ्रष्टतंत्र। क्या शहीदों ने इसी भारत के लिए कुर्बानी दी थी कि हम विश्व के भ्रष्टतम देशों में शुमार हो जाएँ ?

जनतंत्र में जनहित और देशहित से सर्बोच्च कुछ भी नहीं हो सकता। न कोई परम्परा, न कोई पदाधिकारी, न कोई व्यक्ति, न कोई नियम, न कोई कानून और न ही कुछ और। यदि इनसे देश हित में बाधा पहुँचती है, देश के विकास का मार्ग अवरुद्ध होता है, देश की एकता और अखंडता अक्षुण्ण नहीं रह सकती तो हमें अवश्य बदलना होगा।

अतः हमें एक सख्त पारदर्शी कानून की जरूरत है, जिसके दायरे से कोई भी अछूता न रहने पाए, जिससे भ्रष्टाचार पर अकुंश लगाया जा सके और भ्रष्टाचारियों को कटघरे में खड़ा करके उनकी अकूत सम्पत्ति जब्त करके देश हित में लगाया जा सके।

रामू बोलता जा रहा था। विधायक जी ने आके उसकी पीठ थपथपाई और बोले मैं तुम्हारे जज्बात की कद्र करता हूँ और तुम लोगों के साथ हूँ।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर(उ. प्र.)।
URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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1 टिप्पणी "एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - जज्बात"

  1. क्या राजू को भ्रष्टाचार का मतलब भी मालूम था ??????

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