मंगलवार, 23 अगस्त 2011

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता

जीत, हार के भ्रम में

कब तक हम सब

खून से लथपथ या अन्‍य शहर

की सड़कें, गलियां, घर

कब तक कितने दिन और

कितने परिवार होंगे बेघर

उन्‍हें जो जनतन्‍त्र के लिए

कभी अंग्रेजों से लड़ते रहे

क्‍या जवाब देंगे

अब भी क्‍या हुआ है?

 

परिवर्तन में सिर्फ

गोरों की जगह काले-

खास लोग ही आये है

जो कभी गोरों की

चिलम भरते थे।

वे ही हम पर लाठी, गोली

चलवाते अपनों से अपनों पर

क्‍या इतने जर्जर हो गये हम

खामोशी के साथ

सारे प्रहार सहते रहेंगे

या प्रतिरोध भी कर सकेंगे?

 

--सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन- 120/132

बेलदारी लेन लालबाग,

लखनऊ।

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