मंगलवार, 23 अगस्त 2011

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता

जीत, हार के भ्रम में

कब तक हम सब

खून से लथपथ या अन्‍य शहर

की सड़कें, गलियां, घर

कब तक कितने दिन और

कितने परिवार होंगे बेघर

उन्‍हें जो जनतन्‍त्र के लिए

कभी अंग्रेजों से लड़ते रहे

क्‍या जवाब देंगे

अब भी क्‍या हुआ है?

 

परिवर्तन में सिर्फ

गोरों की जगह काले-

खास लोग ही आये है

जो कभी गोरों की

चिलम भरते थे।

वे ही हम पर लाठी, गोली

चलवाते अपनों से अपनों पर

क्‍या इतने जर्जर हो गये हम

खामोशी के साथ

सारे प्रहार सहते रहेंगे

या प्रतिरोध भी कर सकेंगे?

 

--सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन- 120/132

बेलदारी लेन लालबाग,

लखनऊ।

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------