सोमवार, 15 अगस्त 2011

दामोदर लाल ‘जांगिड़' की स्वतंत्रता-दिवस विशेष ग़ज़लें

ग़ज़ल

वो लूट रहे हैं आजादी का मजा मियां।
हम भुगत रहे हैं आजादी की सजा मियां॥

भुना रहे हैं बापू के बलिदानों को,
फिर गांधी की तस्‍वीर गोडसे सजा मियां।

कितने तो रोटी की खातिर जूझ रहे हैं,
तो कुछ का धन दूर देश में जमा मियां।

यूं कई मर्तबा बदइखलाखी मौत हुई,
तो कब आयेगी उन्‍हें आखिरी कजा मियां।

कितना खाया इसकी चर्चा क्‍या करनी,
है ताज्‍जुब कैसे आसानी से पचा मियां।

जब जब भी जो जम्‍हूरीयत जांबाक हुई,
तो तौबा तौबा तुमने दी हैं रजा मियां।

किस अंजाम पे जाकर ‘जांगिड़' ठहरेगी,
जो धीरे धीरे बदल रही जो फजा मियां।

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ग़ज़ल

ले गया चोर क्‍या क्‍या पता ले गया।
लो फकीरों तुम्‍हारी  मता ले गया॥

लोग ग़ज़ल,शेर मिसरे चुराते सुने,
वो समूचा मुजल्‍ला चुरा  ले गया।

सरपरस्‍ती सियासत हैं हासिल उसे,
ना तभी तो खुदा से डरा ले गया।

चोर पकड़ा गया था रंगे हाथ जो,
वो बड़ा चोर उसको छुड़ा  ले गया।

था मुहाफिज अंधेरे का वो  शर्तिर्या,
आखिरी रोशनी की शुआ ले गया।

तखलीक,तखईल और नजरियात,
पास मेरे यही था बचा  ले गया।

काम की चीज थी या बिना काम की,
हाथ जो भी लगा वो उठा ले गया।

      दामोदर लाल ‘जांगिड़'
छंद.प्रिय छंद
बारह वर्ण,बीस मात्राएं
सूत्र.राजभा राजभा राजभा राजभा
मुजल्‍ला पत्रिका,मता=खजाना,मुहाफिज=रक्षक,शुआ=किरण,तखलीक=सर्जन,तखईल=चिंतन

1 blogger-facebook:

  1. yoon to dono hi gazalen badhiya hai magar shilp ki nazar se doosariwali vakai umada hai jisamen matarik aur varnik dono chhadon ki khoobiyan mouzud hai

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