शंकर लाल कुमावत की कविता - क्या यही आजादी है...?

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क्या यही आजादी है ?

आतंक के साये में जीता है

हर जन हर दिन यहाँ

क्या यही आजादी है ?

 

सीना ताने भ्रष्ट मंत्री

देश को लूट-लूट कर खाते है

शिकायत करे तो किसको करे यहाँ

आम-आदमी त्राहि-त्राहि कर रोता है

क्या यही आजादी है ?

 

हर दिन हर पल जहन में

ये सवाल खड़ा होता है

क्यों पड़ा है देश का धन विदेशों में ?

क्यों हो रही है देरी इसे वापस लाने में ?

क्यों हो रहा है भ्रष्टाचार सरकारों में ?

क्यों लुटती है इज्जत भरे बाजारों में ?

क्यों कानून का खौफ नहीं गुनहगारों में ?

क्यों होती है देश की गिनती कर्जदारों में ?

क्यों है इतनी लूट सत्ता के गलियारों में ?

 

पूछो ये सब तो

पुलिस दागती है गोले और

भांजती है लाठियां रात के अंधियारो में

क्या यही आजादी है ?

 

अगर यही आजादी है

तो

इससे गुलामी कही अच्छी थी

गुलाम है हम

लुटना हमारी किस्मत में है

कम से कम इतनी तस्सली तो थी

 

---शंकर लाल इंदौर मध्यप्रदेश

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