सोमवार, 15 अगस्त 2011

ऋता शेखर ‘मधु’ की स्वतंत्रता-दिवस विशेष कविता - मैं भी चमकूं

मैं भी चमकूँ

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हम निवासी स्वाधीन देश के

उन्मुक्त विचरण करते हैं

वसुन्धरा के व्योम मंडल में

भास्कर में भारत को देखते हैं

 

निशा के घने अंधियारे में

नभ के चमकीले चन्द्र में

गाँधी का चेहरा चमकता है

सबसे प्रज्वलित ध्रुवतारे में

देशरत्न सा रतन दमकताहै

 

अगणित टिमटिम तारों में

बलिदानियों का

रक्तिम मुख भभकता है

रात के खिलते सितारों में

भगतसिंह आजाद मुसकाते हैं

 

लक्ष्मीबाई वीरकुँअर का तारे

आकर्षित बहुत ही करते है

सप्तऋषि-मंडल के तारे

देशभक्त ही हैं सारे

बिस्मिल सुखदेव राजगुरू

नेहरू तिलक पटेल सुभाष

इनसे सजा भारत आकाश

सावरकर और खुदीराम

अम्बर में चमचम करते हैं

 

एक अभिलाषा मेरी भी है

देश के लिए मर मिटूँ

जब भी मैं तारा बनूँ

इनके बीच मैं भी चमकूँ|

--

ऋता शेखर मधु

परिचय:

जन्म- ३ जुलाई,

पटना,बिहार|

शिक्षा- एम एस सी{वनस्पति शास्त्र}, बी एड.

पटना,बिहार|

रुचि- अध्यापन एवं लेखन

प्रकाशन-इंटरनेट पत्रिकाओं पर रचनाएँ प्रकाशित

1) रचनाकार- ३१ जुलाई २०११

हाइगा(चित्रमय कविता)

बाल कविता-शिशु बेचारा

2) अनुभूति हाइकु (20 जून 2011)

3) हिन्दी हाइकु - हाइकु एवं हाइगा

4) सहज साहित्य पर तीन कविताएँ

6 blogger-facebook:

  1. एक अभिलाषा मेरी भी है
    देश के लिए मर मिटूँ
    जब भी मैं तारा बनूँ
    इनके बीच ही मैं भी चमकूँ|

    आपकी यह अभिलाषा मन में देशभक्ति की भावना
    जगाती है|बहुत भावपूर्ण रचना है|

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर अभिव्यक्ति के साथ भावपूर्ण कविता ! शानदार प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  3. अच्छी कविता अच्छी लय !

    उत्तर देंहटाएं
  4. भावनाओं से ओतप्रोत सुन्दर रचना...बधाई...।

    उत्तर देंहटाएं

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