सोमवार, 15 अगस्त 2011

हिमकर श्याम की जश्ने आजादी कविता

फिर भी जश्ने आजादी

तड़प रही है आबादी
फिर भी जश्ने आजादी

जन-गण में लाचारी
भूख, गरीबी, बेकारी
हर चेहरा फरियादी
फिर भी जश्ने आजादी

दर्द हैं, तकलीफें हैं
चिंता की लकीरें हैं
चुनौतियां बेमियादी
फिर भी जश्ने आजादी

ना बिजली, ना पानी
मार रही ये गिरानी
खुशियां तो मियादी
फिर भी जश्ने आजादी

मजहब की दरारें हैं
जाति की दीवारें हैं
हुकूमत करे फसादी
फिर भी जश्ने आजादी

आगे-पीछे घातें हैं
आतंकी बिसाते हैं
खतरे में जिन्‍दगानी
फिर भी जश्ने आजादी

सीने में लिए अंगारे
बेजुबानों की कतारें
जख्‍मों के सब आदी
फिर भी जश्ने आजादी

सत्‍ता की चाल पुरानी
रिश्‍वत और बेईमानी
दागदार हो गयी खादी
फिर भी जश्ने आजादी

वही सिसकियां रहीं
कहीं तब्‍दीलियां नहीं
कागजी है कामयाबी
फिर भी जश्ने आजादी

अंदाज बदलता रहा
और रूप बदलता रहा
रह गयी वही गुलामी
फिर भी जश्ने आजादी

चारों तरफ बदहाली
आंखों में तंगहाली
नयी जंग की मुनादी
फिर भी जश्ने आजादी

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हिमकर श्‍याम
द्वारा : एन. पी. श्रीवास्‍तव
5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,
रांची : 8, झारखंड।

2 blogger-facebook:

  1. अंदाज़ बदलता रहा
    और रूप बदलता रहा
    रह गयी वही गुलामी
    फिर भी जश्ने आज़ादी.

    too good

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज़ादी के 64 साल बाद भी हम गुलाम है चंद मतलबी और मक्कारों के और अगर आवाज़ उठाने की कोशिश करे तो अंग्रेजों से भी बदतर दमनकारी प्रहार मिल रहा है | अन्ना एवं बाबा रामदेव प्रकरण इसका ज्वलंत उदहारण है | पता नहीं यह कैसी आज़ादी और जश्ने आज़ादी है | अब वक्त आ गया है कुछ करने का |

    उत्तर देंहटाएं

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