बुधवार, 17 अगस्त 2011

आर.वी.सिंह की मानसूनी बाल कविता - पूरब से आ गई हवाएँ

पूरब से आ गईं हवाएँ

DSCN5246 (Medium) (Mobile)

पूरब से आ गईं हवाएँ

नभ पर लो छा गईं घटाएँ

जोर-जोर से कड़के बिजली

बादल उमड़-घुमड़ गरजाएँ

 

जी करता है उड़ें हवा में

भीगें रिमिर-झिमिर वर्षा में

जाकर बैठ रहें बादल पर

इन्द्रधनुष से तीर चलाएँ

 

छपक-छपक पानी के धारे

बहते हैं नारे-परनारे

चलो बना कागज की नौका

हम भी उनमें आज तिराएँ

 

धानी वसन धरा ने धारा

हर्षित हुआ जगत है सारा

मोर नाचते हैं बगिया में

मेंढकजी मलहार सुनाएँ

 

कुदरत की कितनी सौगातें

सुन्दर ऋतुएं सुखकर रातें

आओ मिलकर सभी सहेजें

कुदरत की सब सुन्दरताएँ

रात-रात जी भर टर्राएँ

--

आर.वी.सिंह/R.V. Singh
उप महाप्रबन्धक (हिन्दी)/ Dy. G.M. (Hindi)
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक/ Small Inds. Dev. Bank of India
प्रधान कार्यालय/Head Office
लखनऊ/Lucknow- 226 001
फोन/Phone-2288774
मोबाइल/Mob-9454712299
ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in

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