मंगलवार, 9 अगस्त 2011

उमेश कुमार यादव की कविता

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हाय रे गरीबी !

गरीबी ने क्या जुल्म ढाया है

आदमी को जानवर बनाया है

समय ने क्या क्या न कराया है

पेट के लिये बेशर्म बनाया है

 

भूख की अग्नि क्या होती है

गरीबों के घर ही जलती दिखती है

पेट के खातिर जो मजबूर हैं

नालियों में भी खाना खोजते जरुर हैं

 

क्या करेंगे वो जिनको किस्मत ने मारा हैं

जब इंसान ही नहीं इंसान का सहारा है

एक दिन संध्या की कहानी है

गिरी मैदान स्टेशन के बगल में एक नाली है

 

नाली से सटे स्टेशन की चहारदीवारी है

जो आम जनता के लघु शंका से भारी है

एक आदमी जो रंग रुप से साफ सुथरा

चला आ रहा था नम किये अपना मुखड़ा

 

अचानक उसने नाली के ऊपर देखा

बनी उसके चेहरे पर खुशी की एक रेखा

देखते ही नाली के इधर उधर

नज़र पड़ी पके बिखरे पड़े कुछ चावल पर

 

उसकी खुशी का ठिकाना न रहा

उसपर मक्खियाँ भिनक रही थी

और कुत्ते बस पहुँचने ही वाले थे

कि उस व्यक्ति ने एक छलांग मारी

 

और अपने कटोरी में कुछ चावल भर डाली

उठाया और छुपाकर चलता बना

जैसे कोई देख रहा हो

और छिनने को खदेड़ रहा हो

 

छि: यहीं क्या जिन्दगी है

क्या गरीबी एक गन्दगी है

या खुदा तूने गरीब क्यों बनाया

गरीब यदि बनाया भी तो

 

गरीब रुपी दैत्य क्यों बनाया

यूं तो धरती जो अन्न पैदा करती है

सारे प्राणियों के खाने से दोगुनी होती है

पर पूरे धरती की सारी उपज

एक स्वार्थी के लिये भी कम पड़ती है ।

--

द्वारा –

उमेश कुमार यादव / Umesh Kumar yadav

मकान सं.- 25/2 / Qrt No.  C-25/2

नोट मुद्रण नगर / Note Mudran Nagar

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