मंगलवार, 23 अगस्त 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की हास्य-व्यंग्य ग़ज़लें - ये ताज तो हर रोज घोटाला देता...

मगर ये ताज तो हर रोज घुटाला देता

अपने दीदार में वो दिन का हवाला देता
बिना मांगे ही हमें सूर्य उजाला देता|

बलाये ताक पर रखना उसे कैसे मुमकिन‌
हर एक शै को जो हर रोज निवाला देता|

जमाना छोड़कर अखबार से यारी अच्छी
वही तो है हमें भर पूर मसाला देता|

हमारे मुल्क में रहकर हमीं से गद्दारी

क्यों नहीं देश उन्हें देश निकाला देता|

चाहते तो हमें भरपूर खुशी दे देते
मगर ये ताज तो हररोज घुटाला देता|

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(2)

अभी तक न हटा पाये हमारे भाग्य फूटे हैं

 

हमारे काम बिल्कुल एक से बिल्कुल अनूठे हैं

तुम्हारे पैर टूटे हैं हमारे हाथ टूटे हैं|

 

हमें मालूम है बैसाखियों पर आप चलते हैं

गिरा इससे नहीं पाये इधर ये हाथ टूटे हैं|

 

बनी हैं बिल्डिंगें जिनकी,करोड़ों बैंक खातों में

जरा नज़रें उठाकर देख ये मक्कार झूठे हैं|

 

जिन्हें हम दर्द कहते हैं जिन्हें अपना समझते हैं

उन्होंने डालकर डाके हज़ारों बैंक लूटे हैं|

 

लगे थे दाग दामन में हज़ारों साल पहले से

नहिं बालिश्त भर भी तो कहां दामन से छूटे हैं|

 

जमाने से रहे राजा बने हो अब भी महाराजा

अभी तक न हटा पाये हमारे भाग्य फूटे हैं |

 

हमारे हाथ में तकदीर का कोरा पुलंदा है

लगाये आपने हमने सभी ने क्यों अंगूठे हैं|

3 blogger-facebook:

  1. आदरणीय भाई श्रीवास्तव जी, ग़ज़ल इतना हलका-फुलका शब्द या इतनी कमज़ोर विधा नहीं है, जिसे तोड़-मरोड़कर कैसे भी प्रस्तुत कर दिया जाए। आप ग़ज़ल कह रहे हैं, बहुत अच्छी बात है। लेकिन, आपसे निवेदन है कि ग़ज़ल कहने के बाद उसे किसी ‘अच्छे’ शायर को पढ़वा दीजिएगा, ताकि उसकी छांदिक ख़ामियां दूर हो सकें। यह मेरा मशविरा नहीं, निवेदन है। आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगे और ‘साहित्य-हित’ व ‘समाज-हित’ में मेरी बात पर ग़ौर फ़रमाएंगे, ताकि हिंदी-ग़ज़ल और अधिक बदनाम न हो। क्षमा-याचना के साथ- कृष्णकुमार ‘नाज़’

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  2. आदरणीय भाई श्रीवास्तव जी, ग़ज़ल इतना हलका-फुलका शब्द या इतनी कमज़ोर विधा नहीं है, जिसे तोड़-मरोड़कर कैसे भी प्रस्तुत कर दिया जाए। आप ग़ज़ल कह रहे हैं, बहुत अच्छी बात है। लेकिन, आपसे निवेदन है कि ग़ज़ल कहने के बाद उसे किसी ‘अच्छे’ शायर को पढ़वा दीजिएगा, ताकि उसकी छांदिक ख़ामियां दूर हो सकें। यह मेरा मशविरा नहीं, निवेदन है। आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगे और ‘साहित्य-हित’ व ‘समाज-हित’ में मेरी बात पर ग़ौर फ़रमाएंगे, ताकि हिंदी-ग़ज़ल और अधिक बदनाम न हो। क्षमा-याचना के साथ- कृष्णकुमार ‘नाज़’

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  3. आदरणीय भाई श्रीवास्तव जी, ग़ज़ल इतना हलका-फुलका शब्द या इतनी कमज़ोर विधा नहीं है, जिसे तोड़-मरोड़कर कैसे भी प्रस्तुत कर दिया जाए। आप ग़ज़ल कह रहे हैं, बहुत अच्छी बात है। लेकिन, आपसे निवेदन है कि ग़ज़ल कहने के बाद उसे किसी ‘अच्छे’ शायर को पढ़वा दीजिएगा, ताकि उसकी छांदिक ख़ामियां दूर हो सकें। यह मेरा मशविरा नहीं, निवेदन है। आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगे और ‘साहित्य-हित’ व ‘समाज-हित’ में मेरी बात पर ग़ौर फ़रमाएंगे, ताकि हिंदी-ग़ज़ल और अधिक बदनाम न हो। क्षमा-याचना के साथ- कृष्णकुमार ‘नाज़’

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