मंगलवार, 30 अगस्त 2011

शोभा रस्तोगी शोभा की कविता - बिछौना भर

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उसने भी चाहा था

उड़ना नील गगन में
चलना समंदर की लहरों पे

भर लेना खुशियों को अंक में

दौड़ लगाना मखमली घास पर

खुशबू को समेट लेना सांसों में

पर --

उसे कहाँ मालूम था ?

वह तो एक बिछोना भर है

बिछना और बिछना भर ही

उसकी नियति है

वह एक स्त्री है |

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1 blogger-facebook:

  1. bichona bhar---sunder kavita hai.lekin ab mahila kisi bhi surat men maatr upbhog ki vastu nahin rahi.samy kafi badla hai -metro city ho ya gawon ki baat sab jgah mahila ab abla nahin sabla hai.

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