गुरुवार, 11 अगस्त 2011

अजय कुमार तिवारी की कविता - जागो फिर एक बार

जागो फिर एक बार

जाने क्‍यों बरसात भी कम हो रही है दोस्‍तों।

ईमान की सरिता ये सूखी रो रही है दोस्‍तों ।

 

लोभ की चढ़ती नदी गरमा गई है इस कदर

हिम की पट्‌टी कट के पानी हो रही है दोस्‍तों ।

 

पर्वतों से हाल पूछा भरभराकर बोला वो

खदानों से नींव खंडहर हो गई है दोस्‍तों ।

 

सूखा जंगल सत्‍य का लहरा रही कसबेंवरें ,

नाथुओं की फौज भारी हो रही है दोस्‍तों ।

 

साधु ,बाबा ,संत व्‍यापारी हुए हैं आजकल ,

फिक्र बस धंधे की उनको हो रही है दोस्‍तों ।

 

बीज बोओ तुम चरागों को तो कुछ एहसान हो ,

हर तरफ तम की दुपहरी हो रही है दोस्‍तों ।

 

हाईब्रिड कुछ खून की तुम कुछ लगाओ फैक्टरियाँ ,

बंदूकों की जद ये फैली जा रही है दोस्‍तों ।

 

कुछ शहीदों ने दिलाई कौम को स्‍वाधीनता ,

जागो फिर एक बार माता रो रही है दोस्‍तों ।

--

अजय कुमार तिवारी

बी-14,डी.ए.वी. स्‍टाफ कालोनी,

जरही, भटगाँव कालरी,

जिला-सरगुजा , छत्‍तीसगढ़

497235

4 blogger-facebook:

  1. वाह बहुत ही सुन्दर
    रचा है आप ने

    उत्तर देंहटाएं
  2. शंकर लाल7:12 pm

    बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  3. जागकर एक नयी मीनार बनायेंगे
    ऐसी होगी उसकी दिवार की
    बेईमान व्यापारी न गिरा पाएंगे
    वादा है भारत जागेगा दोस्तों
    एक नया सवेरा आपकी गूँज लायेगा दोस्तों

    उत्तर देंहटाएं

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