सोमवार, 29 अगस्त 2011

के. नन्‍दन ‘अमित' की अन्ना को समर्पित दो कविताएँ

लोकपाल की निगरानी

चला अकेला अन्‍ना लेकिन नहीं अकेला रह जाए
जनता की बातों को जनमत के जोर से कह जाए
है देष गरीबों का, लेकिन सरकार यहाँ पूँजीवादी
लोकतंत्र में जनता की आँखों से आँसू बह जाए

यह देष वही भारत है जिसके गांधी नेहरू आजाद थे
था कर रहा गुलामी देष किन्‍तु उनके सपने आजाद थे
सरकार विदेशी थी, फिर भी नारे स्वदेश के चलते थे
गांधी के पीछे अनगिनत पाँव साथ-साथ पर चलते थे

ढूंढो अपराधी कौन यहाँ यह जनता है या है सरकार
अन्‍ना माँग रहा हक अपना मिला उसे क्‍यूँ कारागार
अपनी बात कहे जनता क्‍या उसको है अधिकार नहीं
है अभी यहाँ जनतंत्र, चाहिए हमको ये सरकार नहीं


क्‍यों सत्ता और शासन एक हुए भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त हुए
है देष करोड़ों का फिर भी यह भ्रष्‍टाचारी संक्षिप्‍त हुए
हैं कौन, कहाँ से आए हैं ? जनता इनकी पहचान करे
इस लोकपाल की निगरानी देखो, न कोई संदिग्‍ध करे

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अन्‍ना

होने वाली है क्रान्‍ति दिख रही जन-गण मन में,
अधिनायक अन्‍ना सा होगा भारत-भाग्‍य विधाता।
है स्वदेशी सरकार भेजती जन-नायक को कारा,
आश्चर्य है! जिस अन्‍ना को गांधी राग है भाता।


भ्रष्‍टाचारी हो सरकारी, कोई बात नहीं क्‍यों ?
मंत्री जी से नातेदारी, कोई बात नहीं क्‍यों ?
मँहगाई, बाजारों पर हो कोई बात नहीं क्‍यों ?
जनता के अधिकारों पर हो कोई बात नहीं क्‍यों ?


अन्‍न यहाँ पैदा करने को हम खेतों में मरते,
संसद में तुम बैठे-बैठे ही रूपए पैदा करते।
था भेजा चुनकर हमने तुमको करो देष समृद्ध,
नोंच-नोंच कर मांस देश का खा जाओगे गिद्ध।

लेकतंत्र है जहाँ, जनता का उच्‍चासन होता है,
भूल गए जनतंत्र में जनता का शासन होता है।
नहीं चीर है पांचाली का जनता का अधिकार,
राजनीति वह नहीं, यहाँ पर दुःशासन रोता है।

पहन मुखौटा तुम जनहित का जनता को छलते हो,
जनता को निर्वासित करके तुम सुख से पलते हो।
स्‍वतंत्र देष की जनता अपने माँग रही अधिकार,
अन्‍ना है इस युग का गांधी मान ले अब सरकार।
--
के. नन्‍दन ‘अमित'

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