मंगलवार, 23 अगस्त 2011

रामवृक्ष सिंह की मानसूनी कविताएँ - बरखा में बौराए मनवाँ। कजरी-ठुमरी गाए मनवाँ।

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(1)
बादलों ने एक ना मानी
इस कदर बरसा गए पानी
            कंचुकी सारी भिगो डाली
            देह सारी हो गयी धानी।

रह गयी फिर पेट से पोखर
रात जब कजरी लगी गाने
दादुरों ने की बड़ी अनुनय
बात कोई एक तो माने’
        भोर की गुमनाम सी किरणें
        हो गयी हैं आज बेमानी।

दूधिया भीगा बदन कोमल
सब वसन चूने लगे तिपतिप
कुंदनी धुलती सजीली देह
कोरकों में बस रही लुकछिप
        नेहमय जब देह हो आयी
        रूप ने तब नयन से ठानी।

बुत रिबेका का हुई काया
पाँव रतनारे हुए गंदुम
धुल गया सब आँख का काजल
गाल पर फबने लगा कुंकुम
        चेतना सब कुंद हो आयी
        खुल गए सब द्वार रूहानी।

फिर उमड़ आए घने बादल
धुल चुके उन्मत्त शिखरों पर
और रोमिल उष्ण घाटी में
बह चली धारा कोई उर्वर
        और फिर जागी कोई पीड़ा
        वादियों में आज अनजानी।


(2)
अनकहे बंधने लगी हैं भूमिकाएँ।
क्यों प्रगल्भा हो गयी हैं कामनाएं।

दूर तक विस्तीर्ण हरियाली मनोहर।
किन्तु शाश्वत कुछ नहीं मृण्माण्य नश्वर।   

और तिस पर हर कदम हैं वर्जनाएँ।।

ये पनारे खेत धानी, क्षिप्र निर्झर।
झूमती है कांस नद की बाँसुरी पर।
गा रहे जन प्रेम की सुंदर ऋचाएँ।।

आ रहे पाहुन पखेरू पंख तोले।
जोहती है बाट धरती बाँह खोले।
घिर गयी हैं दूर पर्वत पर घटाएँ।।

खोल अवगुंठनसभी समवेत स्वर में।
साथ गाएं हम मिलन के इस प्रहर में।
आज उमगी जा रहीं मृदु भावनाएँ।।

 
(3)
कितना घना अंधेरा रहता था ओ गोरी गाँव में।
जब से तुम आयी हो फैली खूब अंजोरी गाँव में।

दिन पागल रातें थीं प्यासी
आँखों में थी बसी उदासी
तुम बिन लगती थीं सब बातें कोरी-कोरी गाँव में।

जाने क्या जादू चितवन में
तुम ही तुम रहती हो मन में
रूपलुनैया ने आँखों से की बरजोरी गाँव में।

रँग डाले मेरे दिन सारे
मधुर बनाए पल-छिन सारे
अनगिन खुशियाँ आयीं तुम संग चोरी-चोरी गाँव में।
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(4)
याद तुम्हें है क्या अब भी वह प्रथम मिलन की रात प्रिये।
मधुर यामिनी में मधु रस की पायी जब सौगात प्रिये।।

साँसों में जब साँस घुली थी
अधरों से जब अधर मिले थे।
कुंडलिनी जागी थी जैसे
सहस्रार शत बार खिले थे।।
प्रकृति और पुरुष का जैसे होता था संघात प्रिये।

रोम रोम पुलकित हो आया
प्रिय का प्रथम स्पर्श जो पाया।
हम तुम मिले परस्पर ऐसे
जैसे मिले ब्रह्म से माया।।
बीती रैना किन्तु न बीती हम दोनों की बात प्रिये।

प्राची पर लाली जब छायी
जगे स्वजन अर्गला बजायी।
आतुर अधरो से अधरों ने
ली थी तब संक्षिप्त विदायी।।
मिलने की अतृप्त चाह ले आया पुनः प्रभात प्रिये।

रह-रहकर बजती थी बिछिया
जब मेरे कानों के पास।
मधुरिम आहों में चाहों में
जाने कब बीता मधुमास।।
प्रेम सुधा की किन्तु अभी तो बाकी है बरसात प्रिये।

प्यार हमारा घटा न पाएँ
निष्ठुर लहरें कभी समय की।
आओ गाएँ हम गाथाएँ
शाश्वत अपने प्रेम प्रणय की।।
युगातीत हो प्रेम हमारा समय को भी दें मात प्रिये।
हर दिन हो अपने जीवन में प्रथम मिलन की रात प्रिये।।
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(5)
घिर गई है पास शम ए दिल के आकर फिर उदासी
आज बरसेगी घटा फिर औ रहेगी रूह प्यासी
मिलन में उन्मत्त हो सीत्कार करती हैं बदलियाँ
नारिकेलों को पवन के स्पर्श से है बदहवासी

काँपते पीपल के पत्तों में सिहरता आर्द्र कागा
बाज के भय से अभय पा गौर ने संकोच त्यागा
झूमते बाँसों के झुरमुट लरजतीं तन्वी लताएं
दादुरों में मेघ की आश्वस्ति से कंदर्प जागा

चाँद की अभिलाष में नतशिर रहेगी आज नलिनी
केलियों में कैद भँवरे को रखेगी फिर कमलिनी
मेरे भीतर मेरे बाहर व्याप जाएगी दिशा सी
वह तुम्हारी साँस दोलित उष्ण फागुन की हवासी

चाँप देंगे चेतना को सर्द पवनों के थपेड़े
घेर लेंगे आर्द्र पर्वत को कहीं बादल घनेरे
स्वेद भीगे मुख अजानी रात जैसे मुस्कुराती
वर्जती तम के प्रणय को तुम रहोगी दीपिका सी
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ramvriksh_singh

डॉ. रामवृक्ष सिंह
सी-1/509
सेक्टर जी, जानकीपुरम, लखनऊ-21

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