संजय दानी की ग़ज़ल - मां गांव में अकेले ही मर ख़फ़ गई मगर, मैं बज़्मे-शह्र से कभी भी ना निकल सका...

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हर जंग का मिज़ान है हिम्मत ओ हौसला,
पर इश्क़ के मकान में ताक़त का काम क्या।

आवारा घूमता है विरह की गली में चांद,
फिर बादलों से चांदनी का टांका भिड़ गया।

मंज़ूर है चरागे-जिगर को शरारे ग़म,
महफ़िल-ए-हुस्न जलवा दिखाये तो मरहबा।

पतझड़ भरे खेतों में कल आयेगी बहार,
हर ज़िन्दगी के साथ है सुख दुख का सिलसिला।

हमको मिला ग़रीबी का दानव तमाम उम्र,
गोया अमीरों की ही इबादत सुने ख़ुदा।

मां गांव में अकेले ही मर ख़फ़ गई मगर,
मैं बज़्मे-शह्र से कभी भी ना निकल सका।

जलते रहा वफ़ा के शरारों में मेरा दिल,
मेरे जनाज़े में भी न ,पर आई बेवफ़ा।

वो नीमकश निगाहें वो दिलकश अदायें हाय,
उस बेरहम को कैसे दूं मर के भी बद्दुआ।

मझधारे-शौक़ को हरा कर दानी आया है,
पर सब्र के किनारों को मुश्किल है जीतना।

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2 टिप्पणियाँ "संजय दानी की ग़ज़ल - मां गांव में अकेले ही मर ख़फ़ गई मगर, मैं बज़्मे-शह्र से कभी भी ना निकल सका..."

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