विजय वर्मा की स्वतंत्रता-दिवस विशेष कविता - देश प्रेम की लौ

 

देशप्रेम की लौ

*
क्यूँ काँपने लगी है लौ ?
क्या खो रही है ये रौ.?
'स्नेह' हो रहा शेष है,या
बाती को कोई क्लेश है ?


बुझने ना दो इस ज्योति को
रूठने ना दो,मना भी लो..
छोटी-बड़ी हर हथेलियों का
एक अर्धचंद्र  बना भी लो.


परेशां ना हो कुछ ना होने से
वतन के कोने-कोने से .
पोंछ लो अश्रुओं को स्वेद को
विस्तृत करो अखेद को.


सिर्फ फिक्र अपने हाथ की
लानत है ऐसी बात की.
ये मेरा राज्य,ये मेरा प्रान्त
क्यों फिज़ा करते हो क्लांत.
बांटो स्नेह बिना शुल्क के
सारे तो है इसी मुल्क के.
---------------------------------
अखेद=ख़ुशी, ,प्रसन्नता

---

v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

-----------

-----------

0 टिप्पणी "विजय वर्मा की स्वतंत्रता-दिवस विशेष कविता - देश प्रेम की लौ"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.