शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

ज्‍योति सिंह की कविता - तो क्या वो गलत है...

तो क्‍या वो गलत है सुबह की किरणों के साथ जब पिता अपने बच्‍चों को सहारा देता है तो क्‍या वो गलत है   अपने अस्‍तित्‍व को बनाये रखने के ल...

मालिनी गौतम का गीत - स्याह अमा की रातों में

स्याह अमा की रातों में प्रिय, स्याह अमा की रातों में तुम लक्ष्य तलक चलते ही रहो, मैं ज्योत्स्ना बन न सकूँ तो क्या? बस, दीपक बन जलती ही रहू...

रामदीन के हास्य व्यंग्य दोहे - सन्‍त कर रहे हैं आन्‍दोलन, औ सैनिक करते योग। डाक्‍टरों की फौज खड़ी हैं, पता नहीं है रोग।

अर्ध्‍य-सत्‍य भ्रष्‍टों पर हँसने की हिम्‍मत, क्‍यों ना करते लालाली। भारी हो गई भू तिहाड़ की, सोचा कभी है लालाजी।   मंहगाई काबू से बाहर, कै...

उमेश कुमार चौरसिया की तीन लघुकथाएँ

संवेदना आज आन्‍दोलन को आठ दिन हो गए हैं। प्रदेश भर में जगह-जगह धरने, प्रदर्शन हो रहे हैं, रास्‍ते जाम हो रहे हैं, रेल की पटरियां उखाड़ी जा...

शशांक मिश्र भारती की हास्य व्यंग्य कविता - गधों की सभा

गधों की सभा मैंने देखा- आज शहर के सर्वाधिक व्‍यस्‍त चौराहे पर गधों को सभा करते ढेंचू-ढेंचू से अपने बन्‍धु-बान्‍धवों की जिज्ञासा शान्‍त करत...

नन्दलाल भारती की कविताएँ

वर दे दे.... याद है बचपन के वो सूनी आंखों सपने मां-बाप की आंखों के खाली पन्‍ने । क्‍या खता थी तूने नफरत किये , विष बीज बोये नाम - का...

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का आलेख : बुंदेली लोक परम्परा में विवाह के अवसर पर बनाये जाने वाले दिखनी के पकवान

  भारत लोक में बसा है। विभिन्न भाषायें विभिन्न परम्परायें विभिन्न बोलियां और विभिन्न धर्मों में बसे भारत के रीति रिवाज भी क्षेत्रीयता के मा...

ज्योति चौहान की कविता - मैं हर हाल में खुश हूँ

मैं खुश हूं जिन्दगी है छोटी, मगर हर पल में खुश हूँ, स्कूल में खुश हूं ,घर में खुश हूँ, आज पनीर नहीं है, दाल में ही खुश हूँ   आज कार नही...

रवि गोहदपुरी की कविता - शिक्षा

कविता....शिक्षा जातिवाद की ये पाठशाला खुले आम चलती हैं समाज की गंदी धारा में शिक्षा निरंतर बिकती है   खूब पैसा खर्च किया तब पायी ये डिग्रिय...

कान्ति प्रकाश त्यागी की हास्य व्यंग्य कविता : स्वर्ग-नर्क

स्वर्ग- नर्क एक लड़की साधु के पास आई चरण छूकर, यह व्यथा सुनाई, बाबा! मुझे नींद नहीं आती कोई भी चीज़, नहीं सुहाती।   न भूख़ लगती है, न प...

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

राजीव श्रीवास्तवा की कविता - नैनों की भाषा

  नैनों की भाषा मरूभूमि सी वीरान कभी कभी उपवन सी सुंदर दिखती है कल-कल बहता झरना कभी कभी चट्टानों सी तपती है   कभी ममता की मूरत बन ये प्रेम...

बुधवार, 28 सितंबर 2011

संजय दानी की ग़जल - जब फ़स्ले-उम्र सूख चुकी तब वो आई है, मरते समय इलाज़ से कुछ फ़ायदा नहीं...

अब इश्क़ की गली में कोई पारसा नहीं, सुख, त्याग के सफ़र कोई जानता नहीं। ये दौर है हवस का सभी अपना सोचते, रिश्तों की अहमियत से कोई वास्ता नहीं...

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - मुर्गा

मुर्गा रामू ने देखा कि उसके पूर्व सहपाठी राघव और रमेश उसके कालेज कैम्पस में घूम रहे हैं। तीन वर्ष पूर्व की यादें ताजा हो गईं। उसने पुकारा-...

सृजन के तत्वावधान में हिन्‍दी व्‍यंग्‍य साहित्‍य चर्चा

हिन्‍दी साहित्‍य, संस्‍कृति एवं रंगमंच को समर्पित संस्‍था सृजन ने आज डाबा गार्डेन्‍स के पवन एनक्‍लेव मे हिन्‍दी व्‍यंग्‍य साहित्‍य चर्चा ...

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

व्येंकटेश्वारानन्द मिश्र की कविता - ख्वाब

ख्वाब अकसर सिहर जाते हैं नफरतों के साए में . परख नहीं कर पाते अपने और  पराये में . रंजिशों की तपन में जलते हैं साथ  मेरे ,  ये ख्वाब हैं म...

अभिनव प्रयास के आयोजन में तीसरी आँख साहित्य लेखन पुरस्कार/ सम्मान श्रृंखला हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित

सम्मानित लेखकगण, आप सभी के लाभार्थ एक विशेष विज्ञप्‍ति प्रस्तुत है। निम्नांकित पुरस्कार-योजनाओं में भाग लेना आपके लिए उचित होगा। विदित हो कि...

प्रभाशंकर उपाध्याय का व्यंग्य संग्रह - ऊँट भी खरगोश था - अंतिम किश्त

ऊँट भी खरगोश था व्‍यंग्‍य - संग्रह -प्रभाशंकर उपाध्‍याय   (  पिछले अंक 9 से जारी...) तीक्ष्‍णक का बुखार      संस्‍कृति स...

प्रभाशंकर उपाध्याय का व्यंग्य संग्रह - ऊँट भी खरगोश था - भाग 9

ऊँट भी खरगोश था व्‍यंग्‍य - संग्रह -प्रभाशंकर उपाध्‍याय ( पिछले अंक से जारी...) जमानत पर छूटे विश्‍वगुरू की प्रेस काँफ्रेंस     जमा...

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