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September 2011
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तो क्‍या वो गलत है

सुबह की किरणों के साथ

जब पिता अपने बच्‍चों को

सहारा देता है

तो क्‍या वो गलत है

 

अपने अस्‍तित्‍व को

बनाये रखने के लिए

अपने बच्‍चों का सहारा लेता है

तो क्‍या वो गलत है

 

हर राह में उसे

अच्‍छाई से वाकिफ कराता है

तो क्‍या वो गलत है

 

अपनी इज्‍जत को

बनाये रखने के लिए

अगर अपने बच्‍चों को

गलत करने से रोकता है

तो क्‍या वो गलत है

 

अपने घर में खुशियों का

माहौल बना रहने देना चाहता है

तो क्‍या वो गलत है

 

‘‘क्‍यों इस बात पर

उसे पुराने विचार

और रूढ़िवादी होने का

ताना सहना पड़ता है

क्‍यों उसके आखों के आँसू

दिखाई नहीं देते

जिसका सहारा लेकर

हमारे कदम जमीन पर चलना सीखे थे

 

क्‍यों अगर वो आज

अपनी इज्‍जत बचा के

रखना चाहते हैं तो

ये कहा जाता है कि इज्‍जत क्‍या होती है

 

क्‍यों हम ये भूल जाते हैं

कि जिसकी उंगलियों का

सहारा लेकर हमारे कदम

आगे बढ़े थे

क्‍या वो पिता गलत था

जिसने हमें सहारा दिया

 

क्‍या हम उन्‍हें सोचने पे

मजबूर कर दें कि

आपका सहारा देना

आपके लिए ही

एक दिन कलंक बन जायेगा''

--

ज्‍योति सिंह

पीएच.डी (हिन्‍दी)

वनस्‍थली विद्यापीठ

राजस्‍थान-304022

rajputsinghjyoti@gmail.com

स्याह अमा की रातों में

प्रिय, स्याह अमा की रातों में

तुम लक्ष्य तलक चलते ही रहो,

मैं ज्योत्स्ना बन न सकूँ तो क्या?

बस, दीपक बन जलती ही रहूँ !

 

इस राग-द्वेष की दुनियाँ में

तुम निर्मल बन बढ़ते ही रहो

मैं सागर बन न सकूँ तो क्या?

बस, सरिता बन बहती ही रहूँ !

 

प्रिय, बाट जोहती आँखों में

तुम बन उपवन फलते ही रहो

मैं मंजरी बन न सकूँ तो क्या?

बन पीत-पात झरती ही रहूँ !

 

इस सूखी-बंजर धरती पर

तुम पावस बन झरते ही रहो

मैं बदली बन न सकूँ तो क्या?

बस चातक बन तकती ही रहूँ !

 

हर शोकाकुल आहत मन में

तुम बंसी बन बजते ही रहो

मैं राधा बन न सकूँ तो क्या?

बन स्वर-लहरी बहती ही रहूँ !

 

डॉ. मालिनी गौतम

अर्ध्‍य-सत्‍य

भ्रष्‍टों पर हँसने की हिम्‍मत, क्‍यों ना करते लालाली।

भारी हो गई भू तिहाड़ की, सोचा कभी है लालाजी।

 

मंहगाई काबू से बाहर, कैसे हो गई लालाजी।

हर चौथे दिन मूल्‍य वृद्धि पर, चुप क्‍यों रहते लालाजी।

 

सन्‍त कर रहे हैं आन्‍दोलन, औ सैनिक करते योग।

डाक्‍टरों की फौज खड़ी हैं, पता नहीं है रोग।

 

भरत मिलाप देख मेले में, भोला बहुत ही रोया।

पर, तनिक बात पर सगे बन्‍धु को, सरे आम लठियाया।

 

बहुत काम करने को सिर पर, मत तरसाओं लालाजी।

फटे हाल हो गये गिरधारी, कमर टूट गई लालाजी।

 

बैंको की फिर ब्‍याज बढ़ गई, रूकी न कीमत लालाजी।

एक साल में सात करोड़ी, कैसे हो गये लालाजी।

 

बोझ तिहाड़ का कम करवाओं, पित्रपक्ष है लालाजी।

सबके पुरखों की आत्‍माएं, भटक रही है लालाजी।

 

जेल में चक्‍की अब नाही हैं, मिले सभी कुछ लालाजी।

आज किसी घर से भी ज्‍यादा, सुखी हैं जेलें लालाजी।

 

कर्णधार ये न्‍याय बदल लें, अपने ढंग का लालाजी।

अफसर और व्‍यवस्‍था बदलें, अपने सुख को लालाजी।

 

पर, नहीं बदलते कुछ ईमानी होते जिद्‌दी, लालाजी।

रावहजारे, जय प्रकाश से होते हैं, कुछ लालाजी।

 

भ्रष्‍टों पर हँसने की ताकत, छिपी है इनमें लालाजी।

सजा अदालत से ज्‍यादा है, हँसी में इनकी लालाजी।

 

मानों या न मानो लेकिन, यही सही है लालाजी।

भ्रष्‍टों पर हँसने की हिम्‍मत अब दिखलाओ लालाजी।

 

---

-रामदीन,

जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी

कृष्‍णानगर, लखनऊ-23

संवेदना

आज आन्‍दोलन को आठ दिन हो गए हैं। प्रदेश भर में जगह-जगह धरने, प्रदर्शन हो रहे हैं, रास्‍ते जाम हो रहे हैं, रेल की पटरियां उखाड़ी जा रही हैं। राजनीतिज्ञों को अपनी कुर्सी और वोट की चिन्‍ता है तो आन्‍दोलनकारियों को अपनी मांगे मनवाने के स्‍वार्थ की फिक्र।

रोज हाथठेले से माल ठोकर मजदूरी कमाने वाला भोला आठ दिन से बेकाम बैठा है, उसके बच्‍चों को दो वक्‍त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही। मजदूरों की कच्‍ची बस्‍ती में मातम-सा छाया है। बन्‍द रास्‍तों के कारण श्रीवास्‍तव जी की दोनों लड़कियां कैरियर के लिए आवश्‍यक परीक्षा नहीं दे पाने के कारण व्‍यथित हैं। समाचार मिला है कि गांव से ट्रैक्‍टर में बैठकर शहर के स्‍कूल जा रहे बच्‍चों को बन्‍द का रौब दिखाकर मारा-पीटा गया और ट्रैक्‍टर में आग लगा दी गई। मंडी में सब्‍जियों के दाम आसमान छूने लगे हैं। हजारों यात्री ट्रेनें रद्‌द होने से स्‍टेशनों पर फंसे हुए हैं। चारों ओर आमजन हैरान-परेशान है।

आन्‍दोलनकारी रेल की पटरियों और राजमार्ग पर डेरा डाले, अलाव के ताप में छक कर खा-पी रहे हैं और ढ़ोल-नगाड़ों की ताल पर खुशी से नाच-गा रहे हैं। टी.वी. पर यह सब दृश्‍य देखकर लगता है शायद मानवीय संवेदना कहीं खो गई है।

पुण्‍य

सेठजी अपनी कोठी में यज्ञ-पूजा करवा रहे हैं। इक्‍यावन संभ्रान्‍त पंड़ितों को बुलाया गया। सबने मिलकर सेठजी की सुख-शांति के लिए यज्ञ किया और फिर विविध स्‍वादिष्‍ट व्‍यंजनों का भरपेट सेवन किया। अंत में सेठजी ने उन्‍हें कीमती शॉल, धोती-कुर्ता, चांदी का सिक्‍का और सुन्‍दर लिफाफे में ग्‍यारह सौ एक रूपये भेंट दिए। पंड़ितों ने प्रसन्‍न होकर आशीर्वाद देते हुए सेठजी से कहा-‘सेठजी, आज आपने बड़े पुण्‍य का काम किया है।‘

कोठी से कुछ दूर ही एक अनाथालय है, जिसमें मूक-बधिर व विमंदित बच्‍चे रहते हैं। वहां एक भिखारी बच्‍चों को कपड़े और खाने-पीने की वस्‍तुएं दे रहा था। बच्‍चे उस भिखारी के साथ बहुत प्रसन्‍न थे। पता लगा कि वह भिखारी लगभग प्रत्‍येक माह वहां आता है। जगह-जगह घूमकर उसे भीख में जो कपड़े और रूपये-पैसे मिलते हैं, उसमें से वह अपने उपयोग के लिए जरूरी कपड़े रखता, अपनी बीमार पत्‍नि के इलाज के लिए गांव में पैसे भेजता और फिर शेष कपड़े यहां बच्‍चों में बांट देता। जो पैसे उसके पास बचे रहते उससे बच्‍चों के लिए खाने-पीने की वस्‍तुएं और किताबें ले आता। कहता-‘इन बच्‍चों को खुश देखकर मुझे बड़ी शांति और सुकून मिलता है। लगता है जैसे कई जन्‍मों का पुण्‍य मिल गया।‘

 

क्‍यों ?

पत्‍नी के साथ बैठकर अखबार पढ़ रहा था। मुखपृष्‍ठ पर छपी खबर ने चौंका दिया। आदिवासी गांव में एक स्‍त्री को चुड़ैल मानकर उसे पेड़ से बांधकर पीटा गया। खबर के साथ छपे चित्र में पेड़ से बंधी विवश स्‍त्री बिलख रही थी और तमाम ग्रामीण पुरूष उसे घेरे डण्‍डों से पीट रहे थे।

‘‘उफ! इक्‍कीसवीं सदी में ये सब ................. ! इसे अंधविश्‍वास कहूं या अत्‍याचार।............. आश्‍चर्य इस बात का है कि जहां मीडिया पहुंच गया, वहां कानून क्‍यूं नहीं पहुंच पाता।‘‘

पत्‍नि ने याद दिलाया-‘‘अभी पिछले महीने भी तो किसी गांव में एक विधवा स्‍त्री को डायन बताकर निर्वस्‍त्र कर घुमाया गया और फिर तपती सलाखों से दागा गया था...।‘‘

यह सब सुन रही मेरी 15 वर्षीया पुत्री ने बीच में ही प्रश्‍न किया-‘‘पापा, यह सब केवल स्‍त्रियों के साथ ही क्‍यूं होता है............... किसी पुरूष के साथ क्‍यूं नहीं ?‘‘

गधों की सभा

मैंने देखा-

आज शहर के सर्वाधिक व्‍यस्‍त चौराहे पर

गधों को सभा करते

ढेंचू-ढेंचू से अपने बन्‍धु-बान्‍धवों

की जिज्ञासा शान्‍त करते,

पहुंचकर मैंने जब पूछा-

अरे भाईयों, क्‍या हो रहा है-

 

किस तरह का आप सबका

यहां जमाबाड़ा चल रहा है,

सभा तो ऐसी मनुष्‍यों की होती,

परन्‍तु-

स्‍वर ढेंचू का ही मेरे कानों मे पड़ रहा है

क्‍या अड़कर दुलत्‍ती भी मार दे रहे हैं

आप अपने बन्‍धु-बान्‍धवों को।

 

सुनते ही मेरे मुंह से इतना

बोल पड़ा, उनमें से एक बूढ़ा गधा

जनाब जुबान को लगाम दीजिए-

हम बात वाले हैं, बाप रखते हैं

दुलत्‍ती और ढेंचू का नाम मत लीजिये

ये तो हमारी जाति के गौरव का नमूना है

जिससे प्रभावित होकर अनेक

आप जैसे मेरी जाति में सम्‍मिलित हैं होते,

हम तो पीछे से ही मारते हैं,

वह चारों ओर से मरते हैं और गधाश्री की उपाधि पाते हैं,

तो कभी मूर्ख गधा भी बन जाते हैं।

 

हम सभी ढेंचू ही करते

कभी अपने मालिक को धोखा नहीं देते

और फिर हम केवल शरीर से गधे हैं

न कि मस्‍तिष्‍क से।

लेकिन-

आपने तो मेरे बच्‍चों का जीना ही मुश्‍किल किया है

जब निकले- तो कोई न कोई उंगली उठाता

और है कहता-रे, गधे के बच्‍चे देख

वो सामने गधा खड़ा है।

 

शर्म आती है बार-बार

इस तरह अपना नाम सुनकर,

फिर आप मे से कई लोगों ने

गधा बनना मान लिया है

दुलत्‍ती मारना मालिक को

स्‍वकर्तव्य ठान लिया है।

 

यह युग है प्रजातंत्र का

आपकी सभा हो या सदन में,

दुलत्‍ती ही नहीं दुहत्‍था भी मारते हैं,

प्रसन्‍न होती विदेशी प्रतिनिधियों की मण्‍डलियां

हम सब तो गधे हैं केवल जाति के

आप से मनुष्‍यता से पतित हो

तन और मन से गधा बन गए हैं

आपकी गधेयित मुझे शर्म ला रही है

अपने आपको गधा कहूं या और

श्रीमानजी समझिए-

यही है आज की इस सभा का विषय भी।

--

हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 उ.प्र. दूरवाणी-9410985048

ईमेलः- shashank.misra73@rediffmail.com

वर दे दे....

याद है बचपन के वो सूनी आंखों सपने

मां-बाप की आंखों के खाली पन्‍ने ।

क्‍या खता थी तूने नफरत किये,विष बीज बोये

नाम - काम तेरा विजय

तूने दीन के सपनों को मौत दिये ।

क्‍या माफ करेंगे रिसते आंसू

किया-कराया कत्‍ल कल का

तुझको क्‍या सजा दूं ।

 

खैर मैं सजा क्‍या दूंगा......परवर निगार देगा

मेरी बद्‌दुआ तूझे बस इतनी वक्‍त ना माफ करेगा ।

तेरे भेद ने बदनसीब बना दिया मुझे

मेरे कल की अर्थी मेरे कंधों पर डाल दिया तूने ।

क्‍या दीन-दरिद्र या चौथे दर्जे का होना कसूर था,

पेट में भूख आंखों में सपने,लेकर जीना कसूर था ।

 

गुनाहगार तू जन्‍मजन्‍मान्‍तर का रहेगा

वक्‍त ना माफ करेगा

कातिल है तू बूढी आखों के सपनों का

तूने ऐसी चाल चली अमानुष ना बना पाया

खुली आंखों के सपनों को अपना ।

जाम टकराया बदनाम कर सपनों का खून किया

अरे अमानुष कैसी सजा, तूने बेगुनाह को दिया ।

 

क्‍या हाशिये के आदमी को हक नही

पूरी आंख सपने देखो और तरक्‍की करे

सब हक तुम्‍हें अमानुष नफरत में बौराये

शोषित के तालीम और योग्‍यता का वध कर दे ।

हम क्‍या थूकेंगे दुनिया थूक रही

वो भी थूक रहे जो तेरे संग जाम टकराये थे

मरे सपनों का मोल यही प्रभु

मेहनतकश हाशिये के आदमी को तरक्‍की का वर दे ।

 

आंखों बरसे जीवन भर अमानुष विजय के नाम

हक छिनने,दमन करने वाले की ,

तेरे विधान में पुर्नजन्‍म है तो

अमानुष को जन्‍मजन्‍मान्‍तर सूकर कर दे

हे विधाता ऐसा वर दे दे....................

 

 

मैं हारता चला गया

मैं हारता चला गया

चला राह ईमान,फर्ज सेवा काम की

तबाह होती गयी मंजिलें

उम्‍मीदों का खून होता चला गया

मैं हारता चला गया..................

 

हार के बाद जीत की नइर् आशा

लहूलुहान संभलता चला गया

नया जोश नई उमंगें

घाव सहलाता चला गया

मैं हारता चला गया..................

 

हार के बाद जीत की आशा

रूठ- लूट सी गयी

योग्‍यता बेबस लगने लगी

रिसते घाव पर सन्‍तोष का

मलहम लगाता गया

मैं हारता चला गया..................

 

जवान जोश संग होश भी

बूढ़ी उम्‍मीदें सफेद होती जटा

चक्षुओं पर मोटा ऐनक डंटा

मरता आज कल को फांसी की सजा

जहां मे हक छला गया

मैं हारता चला गया..................

 

उम्‍मीदें मौत की शैया पर पड़ी

सद्‌काम-नाम बेनूर हो रहा

मृत शैया पर पड़े भविष्‍य के सहारे

मरते सपने की शव यात्रा

विष पीता मरता चला गया

मैं हारता चला गया..................

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अभिमन्‍यु की मौत

सब्र की खोती उम्‍मीदों की बदली

सूखने लगे सोते

वज्रपात कल का डरा रहा विरान

जहर पीकर कैसे जीये कैसे सींये

भेद-भरे जहां में बड़े दर्द पाये है

दर्द में जीना आंसू पीना

नसीब बन गया है ।

 

तकलीफों के दंगल में

तालीम से मंगल की उम्‍मीद थी

वह भी छली गयी

श्रेष्‍ठता के दंगल में छल-बल के सहारे

अदना क्‍या जमाये जोर

जीना और आगे बढने का जनून

मौन गिर-गिर उठता कर्म के सहारे ।

 

नही मिलता भरे जहां में कोई

आंसू का मोल समझने वाला

पकड़ा राह सधा-श्रम,सपनों की आशा

खड़ी भौंहें कुचल जाती अभिलाषा

ऐसा जहां है ये प्‍यारे

स्‍वहित में पराई आंखों के सपने जाते हैं

बे-मौत मारे ।

 

ईसा,बुद्ध और भी पूज्‍य हुए इंसान

कारण वही जो आज है जवान

भेदभाव दुख-दरिद्रता,जीव दया,मानवहित

परपीड़ा से उपजे दर्द को खुद का माना

किये काम महान

दुनिया मानती उन्‍हें भगवान ।

वक्‍त का डर्रा वही बदल गया इंसान

कमजोर के दमन में देख रहा

सुनहरा स्‍व-हित आज इंसान

दबंग के हाथों कमजोर के सपनों का कत्‍ल

अभिमन्‍यु के मौत समान

 

आओ खायें कसम ना बनेंगे शैतान

ना बोएंगे विष ना कमजोर का हक छीनेंगे

मानवहित-राष्‍ट्रहित को समर्पित होगा जीवन

बनकर दिखायेंगे परमार्थ में सच्‍चा इंसान......................

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नन्‍दलाल भारती

कवि,कहानीकार,उपन्‍यासकार चलितवार्ता-09753081066

एम.ए. । समाजशास्‍त्र । एल.एल.बी. । आनर्स । दूरभाष-0731-4057553

पी.जी.डिप.एच.आर.डी.

आजाद दीप, 15-एम-वीणा नगर ,इंदौर ।म.प्र।दूरभाष-0731-4057553/चलितवार्ता-09753081066

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भारत लोक में बसा है। विभिन्न भाषायें विभिन्न परम्परायें विभिन्न बोलियां और विभिन्न धर्मों में बसे भारत के रीति रिवाज भी क्षेत्रीयता के मान से अलग अलग हैं। मध्यप्रदेश का उत्त्तरीय भाग जिसमें संपूर्ण सागर संभाग रायसेन विदिशा गुना नरसिंहपुर होशंगाबाद छिंदवाड़ा सिवनी बालाघाट क्षेत्र भी शामिल हैं और उत्तर प्रदेश का संपूर्ण झांसी संभाग उसके जिले मिलाकर बना क्षेत्र बुंदेलखंड कहलाता है। यहां की परंपरायें लोक रिवाज अपनी अनोखी और अलग पहचान बनाये हैं।

उत्तर में यमुना से नरमदा और पूर्व में टमस से चंबल तक का भूभाग अपनी पुरातन संस्कृति एवं संस्कारों को संजोये है। लाल कवि की पंक्तियां कि इत यमुना उत नर्मदा इत चंबल उत टोंस क्षत्रसाल से लरन को रहो न काहू होंस, क्षत्रसाल के बुंदेलखंड की सोंधी महक का अहसास करा जातीं हैं। आल्हा ऊदल लोक कवि ईसुरी और लोक पूजित हरदौल की गाथाओं में रचे बसे बुंदेलखंड का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। बूंदेली लोक गीतों की आज भी सारे देश में गूंज मची रहती है।

बुंदेली विवाहों की भी अपनी अदभुत एवं अनोखी परम्परा है। लोकगीतों की भरमार जिन्हें गारीं कहा जाता है,ढोलक के साथ संगत फिर नृत्य हल्दी तेल देवर भावज नंद भौजाई की ठिठोली आनंद को दुगना कर देती है। इस मनोरंजन के साथ साथ ही एक से एक लज़ीज़ पकवान बुंदेली समारोहों में जान डाल देते हैं। दाल भात कड़ी बरा[दरया] बिजोड़े रायता पापड़ और उड़ेला गया कई चम्मच शुद्ध घी,फिर ऊपर से परोसने वालों के प्रेम पूर्ण आग्रह,इसका आनंद देखते ही बनता है। विवाह के बाद लड़की पक्ष की ओर से आनेवाला पकवान देखने लायक होता है। सजी हुई सुंदर टोकनियों में परंपरागत तरीके से बनी हुईं वस्तुयें बड़े परिश्रम से घर की ही महिलाओं द्वारा ही बनाईं जाती हैं।

इन पकवानों की शोभा और छटा निराली ही होती है। लड़की पक्ष के लोग विवाह के बाद पठोनी के रूप में यह सामग्री भेजते हैं।

इनका वर्णन नीचे दिया जा रहा है।

पिराकें.....यह बड़ी बड़ी गुझियां होती हैं,बेलबूटों त्रिभुजों चतुरभुजों बेलबूटों से मड़ी और रंग बिरंगी। यहा सादारण गुझियों से तीन से चार गुनी तक बड़ी होती हैं। ऊपरी हिस्से को बड़े करीने से सजाया जाता है। लौंग इलायची बादाम के टुकड़ों से सजी ये पिराकें मन को मोह लेतीं हैं लगता है कि देखते ही रहें। इनके भीतर खोवे का कसार मसाला काजू किशमिश चिरोंजी मिला हुआ भरा रहता है। खाने बहुत ही लजीज मीठा और स्वादिष्ट। ग्रामीण क्षेत्रों में तो इनका आकार और भी बड़ा होता है। महिलाओं को निश्चित ही बनाने बहुत परिश्रम करना पड़ता है। लोगों को डिज़ाइन से संवारना सजाना बेल बूटों को रंगना कठिन तो होता ही है विवाह के अवसर रात भर जागते हुये समय को निकालना भी एक कला है।

आस..... यह पकवान गोलाकार चक्र के आकार में होता है। ऐसा लगता है जैसे की दो पिराकें मिलाकर रख दी हों। इसमें भी रंगों की कलाकारी होती है। बादाम लोंग काजू के टुकड़ों के साथ ही एक रुपये के सिक्के भी बीचों बीच चिपकाये जाते हैं। इसमें भी खोया मसाला मिलाकर भरा रहता है। देखने में यह बहुत ही सुंदर और मन भावन होता है। कई तरह के डिज़ाइन बनाकर उनमें विभिन्न रंग भरे जाते हैं
इसकी सजावट देखते ही बनती है। बड़े जतन से बनाये गये इन पकवानों को बनाने में कई कई घंटे लग जाते हैं। गुठे हुये किनारों से पकवानों का निखार कई गुना बढ़ जाता है। गुना...........यह बेसन से बना पकवान है। यह गोलाई लिये हुये मोटे कंगन के आकार का होता है । मुटाई एक से डेढ़ इंच तक और गोलाई
तीन चार इंच तक होती है। इसे गुठाई करके बहुत सुंदर बनाया जाता है। लड़के पक्ष के लोग इसमें से नव बधु का मुंह देखते हैं।

फूल.........यह चौकोर आकार का होता है । यह खाना परोसने के काम आनेवाले चौफूले के समान होता है इसे भी गोंठकर अति सुंदर आकार का बनाया जाता है। यह पकवान भी बेसन से बनाया जाता है।
पान............यह तिकोने आकार का पकवान है जो की पान के आकार का होने के कारण पान कहलाता है। इसके किनारों पर बहुत ही सुंदर गुठाई की जाती है। आकार बड़े छोटे कई प्रकार के बन सकते हैं। आजकल शहरों चलन से बाहर होते जाने से प्रतीक के तौर पर अब मात्र औपचारिकता के चलते सब पकवान बहुत लघु रूप लेते जा रहे हं। वैसे गांव में अभी बड़े बड़े आकार में ये सामान अभी भी बन रहा है।

पुआ.......... आटे के मीठे पुए शादी का खास पकवान है। गुड़ और शक्कर दोनों ही प्रकार के पुए बनाते हैं। किनारे सुंदर गुठाई से पुए में निखार आ जाता है। बीच बीच में कई डिज़ायनें एवं सिक्के चिपकाने का भी रिवाज है। ये सभी पकवान घी अथवा तेल में सेंके जाते हैं। पहले समय में शुद्ध घी में बनते थे,किंतु अब शुद्ध घी आम लोगों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है,इससे डालडा अथवा तेल का ही सहारा रह गया है।
पहले समय में इन पकवानों को बड़े प्रेम से खाया जाता था। ये मीठे पकवान बड़े स्वादिष्ट होते हैं। विवाह के बाद ये पकवान टुकड़े करके मोहल्ले पड़ोस में बांटे जाते थे। यह बायना कहलाता था।

विवाह के बाद लोगों को बायने का इंतजार रहता था, चर्चा रहती थी कि फलाने के यहां शादी हो गई और बायना नहीं आया। किंतु आजकल इनका खाने में उपयोग कम ही हो गया है। कहीं कहीं तो ये गायों और कुत्तों के खिलाने लायक ही रह जाता है। कारण स्पष्ट है कि पहले ये सामग्री शुद्ध घी में बनती थी लोग परिश्रमी थे शारीरिक मेहनत करते थे इससे सब कुछ हज़म कर लेते थे, किंतु आजकल ये तेल अथवा डालडा में बनते हैं और आधुनिकता की दौड़ में अव्वल रहने की होड़ में जीने वाले पिज्जा बर्गर इडली डोसा खाने वाले लोग ये चीजें पसंद ही नहीं करते और पुराने ढर्रे का सामान मानकर घृणा भी करने लगे हैं। बड़े बड़े आधा आधा एक एक किलो के बेसन अथवा बूंदी के लड्डू अब कौन खाता है। बासा हो जाने के कारण ये पकवान बदबू भी करने लगते हैं इससे गाय बैलों के ही लायक रह जाते हैं।

व्यवहारिक तौर भी अब यह पकवान बेकार ही साबित हो रहे हैं। बहुत सारा पैसा और समय बर्बाद कर इनके बनाने का केवल परम्परा के नाम पर उपयोग औचित्यहीन ही लगता है। खाखरे मैदे की पुड़ी पुए एकाध दिन तक तो ठीक रहते हैं पर इसके बाद खाने लायक नहीं रह जाते। विवाह के बाद तुरत उपयोग कर लेने पर तो ठीक है किंतु विवाह की व्यस्तताओं के चलते और नई दुल्हन की आव भगत में ये पकवान वैसे ही पड़े रहते हैं और जब इनकी याद आती है तो बहुत देर हो चुकी होती है। यह तो ठीक है कि परम्परा के तौर पर चुलिया टिपारे सुहाग और शुभ के संकेत हैं किंतु व्यवहारिक तौर् पर जब इनका उपयोग न हो तो इनके बनाने का क्या औचित्य है?

ज्योति चौहान

मैं खुश हूं

जिन्दगी है छोटी,

मगर हर पल में खुश हूँ,

स्कूल में खुश हूं ,घर में खुश हूँ,

आज पनीर नहीं है, दाल में ही खुश हूँ

 

आज कार नहीं है, तो दो कदम चल के ही खुश हूँ

आज दोस्तों का साथ नहीं ,किताब पढ़के ही खुश हूँ

आज कोई नाराज है उसके इस अंदाज़ में भी खुश हूँ

जिसे देख नहीं सकती उसकी आवाज़ सुनकर ही खुश हूँ

 

जिसे पा नहीं सकती उसकी याद में ही खुश हूँ

बीता हुआ कल जा चुका है,

उस कल की मीठी याद में खुश हूँ

आने वाले पल का पता नहीं, सपनों में ही खुश हूँ

मैं हर हाल में खुश हूँ

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ज्योति चौहान

सेक्टर-२२, नॉएडा

jyotipatent@gmail.com

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कविता....शिक्षा

जातिवाद की ये पाठशाला

खुले आम चलती हैं

समाज की गंदी धारा में

शिक्षा निरंतर बिकती है

 

खूब पैसा खर्च किया

तब पायी ये डिग्रियां

खून पसीना बहाया अपार

फिर भी ना समझे दुनिया

 

शिक्षा बिकती बाजारों में

छात्र बने इसके खरीददार

शिक्षक हैं इसको बेचने वाले

पर कौन करे शिक्षा पर प्रतिहार

 

शिक्षा की धांधली को

अब हम कैसे मिटायें

शिक्षा हमारा जीवन है

इसे कैसे आगे बढायें

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रवि गोहदपुरी गोहद

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com , फतुहा पटना की कलाकृति)

स्वर्ग- नर्क

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एक लड़की साधु के पास आई

चरण छूकर, यह व्यथा सुनाई,

बाबा! मुझे नींद नहीं आती

कोई भी चीज़, नहीं सुहाती।

 

न भूख़ लगती है,

न प्यास लगती है।

घर वाले दबाब डाल रहे हैं,

मैं शादी अवश्य करूं।

मैं समझ नहीं पा रही ,

शादी करूं या ना करूं।

 

शादी शुदा भी दुखी हैं ,

बगैर शादी शुदा दुखी हैं।

आदमी शादी करता क्यूं है ?.

फिर करके पछताता क्यूं है ?.I

 

बाबा! , मैं हूँ बहुत परेशान ,

आप ही निकालिए समाधान।

बच्चा! शादी एक लड्डू है ,

प्रत्येक के मन में फूटता है।

 

हो जाय तो भी ना हो भी ,

हर तरह से मन टूटता है।

जो खाय, वह पछताय ,

जो न खाय, वह पछताय।

 

कभी यह सख़्त हो जाता है ,

क्भी यह नरम हो जाता है।

फिर भी तुम शादी कर लो ,

मन के अरमान पूरे कर लो।

 

शादी के बाद जब मृत्यु लोक जाओगी ,

तब ही इसका मतलब समझ पाओगी।

स्वर्ग मिलेगा, तो अच्छा लगेगा।

नरक मिला, तो घर जैसा लगेगा।

 
 
 
Dr.K.P.Tyagi
Prof.& HOD. Mech.Engg.Dept.
Krishna।nstitute of Engineering and Technology
13 KM. Stone, Ghaziabad-Meerut Road, 201206, Ghaziabad, UP

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(चित्र - अमरेन्द्र {aryanartist@gmail.com } - फतुहा, पटना  की कलाकृति.)

 

नैनों की भाषा

मरूभूमि सी वीरान कभी
कभी उपवन सी सुंदर दिखती है
कल-कल बहता झरना कभी
कभी चट्टानों सी तपती है
 
कभी ममता की मूरत बन
ये प्रेम सुधा बरसाती है
इसके आँचल की छाँव तले
धरती स्वर्ग बन जाती है
 
कभी खामोशी का रूप धर
हर बात बयाँ कर जाती है
बिन कहे एक भी शब्द
मन की मनसा दर्शाती है
 
जब रुद्र रूप धारण करती
ये अग्नि कुंड बन जाती है
दुश्मन पर तीखे वार कर
ये महाकाल कहलाती है
 
कभी प्रेम रस की वाणी बन
मधुर मिलन करवाती है
इज़हार मोहब्बत कर देती
जब जुबां शिथिल पड़ जाती है
 
कभी लज्जा की चादर ओढ़े
ये मंद मंद मुस्काती है
कुंदन की काया धरी रहे
जब शर्म से ये झुक जाती है
 
यहाँ भाषाओं की भीड़ है
हर मोड़ पे बदल जाती है
हम प्रेम सूत्र में बँधे हैं
क्योंकि नैनों की भाषा होती है

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डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा 

अब इश्क़ की गली में कोई पारसा नहीं,
सुख, त्याग के सफ़र कोई जानता नहीं।

ये दौर है हवस का सभी अपना सोचते,
रिश्तों की अहमियत से कोई वास्ता नहीं।

जब फ़स्ले-उम्र सूख चुकी तब वो आई है,
मरते समय इलाज़ से कुछ फ़ायदा नहीं।

मंझधार कश्तियों की मदद करनी चाहे पर,
मगरूर साहिलों का कहीं कुछ पता नहीं।

ये वक़्त है कारखानों का खेती क्यूं करें,
मजबूरी की ये इन्तहा है इब्तिदा नहीं।

मंदिर की शिक्षा बदले की,मस्जिद में वार का
अब धर्म ओ ग़ुनाह में कुछ फ़ासला नहीं।

फुटपाथ पर ग़रीबी ठिठुरती सी बैठी है,,
ज़रदारे शह्र अब किसी की सोचता नहीं।

वे क़िस्से लैला मजनूं के सुन के करेंगे क्या,
आदेश हिज्र का कोई जब मानता  नहीं।

दिल के चराग़ों को जला, सदियों से बैठा हूं,
कैसे कहूं हवा-ए-सनम में वफ़ा नहीं।


( पारसा-- पवित्र,   ज़रदार- धनवान,  हिज्र- विरह)

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मुर्गा

रामू ने देखा कि उसके पूर्व सहपाठी राघव और रमेश उसके कालेज कैम्पस में घूम रहे हैं। तीन वर्ष पूर्व की यादें ताजा हो गईं। उसने पुकारा- “राघव ! राघव” ! राघव और रमेश ने रामू को मुड़कर देखा और एक दूसरे को पहचानते देर न लगी।

उन लोगों ने बताया कि लेखपाल के पोस्ट का विज्ञापन निकला हुआ है। जो तहसील से मिलेगा और वही जमा भी होगा। इसी सिलसिले में यहाँ आए हैं। इस कॉलेज का बहुत नाम सुना था, तो सोचा चलो कॉलेज भी देख लेते हैं। अब यहाँ से तहसील जायेंगे। रास्ता भी नहीं मालूम है, पूछते हुए जाना पड़ेगा।

रामू बोला उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। क्योंकि यहाँ रहते हुए तीन साल से अधिक हो गया है। सारे रास्ते मालूम है। चलो चलते हैं। लेकिन वहाँ जाने से पहले चलो कुछ खा-पी लेते हैं। तुम लोगों के भी भूख लगी होगी। पूरे अस्सी किलोमीटर चल के आये हो।

रामू ने उन लोगों के मना करने पर भी होटल में खाना खिलाया। और एक रिक्शे पर तीनों लोग सवार होकर चल दिए। रास्ते में रमेश ने राघव के कान में धीरे से कहा। चलो अच्छा मुर्गा मिल गया। कोई दिक्कत नहीं हुई।

रामू का मन खिन्न हो गया। वह आगे कुछ बोल न सका। केवल यही सोचता रहा कि जिन्हें मैं अपना सहपाठी-दोस्त समझ रहा था। जिनके लिए मैंने मिश्रा सर की क्लास छोड़ दिया, जो हफ्ते में केवल दो लेक्चर पढ़ाने के लिए आते हैं। जिन्हें पास में शेष बचे तीन सो रूपये में से खाना खिलाया और रिक्शा करके तहसील लेकर जा रहा हूँ। वे लोग ही मुझे मुर्गा समझ रहे हैं।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर(उ. प्र.)।
URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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(चित्र - अमरेन्द्र, { aryanartist@gmail.com } फतुहा, पटना की कलाकृति)

srijan (Custom)

हिन्‍दी साहित्‍य, संस्‍कृति एवं रंगमंच को समर्पित संस्‍था सृजन ने आज डाबा गार्डेन्‍स के पवन एनक्‍लेव मे हिन्‍दी व्‍यंग्‍य साहित्‍य चर्चा का आयोजन किया। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव ने किया जबकि अध्‍यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने कार्यक्रम का संचालन किया।

स्‍वागत भाषण देते हुए डॉ टी महादेव राव ने व्‍यंग्‍य साहित्‍य चर्चा कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्‍होंने कहा कि व्‍यंग्‍य को साहित्‍य में विधा के रूप में मान्‍यता नहीं मिली जबकि वह हिन्‍दी साहित्‍य में भारतेन्‍दु हरिश्‍चंद्र के समय से आज तक पूरी शिद्दत के साथ विद्यमान है। नीरव कुमार वर्मा ने कहा जिनके लिये लिखा गया है, व्‍यंग्‍य उन पर परोक्ष रूप से आघात करता है। हास्‍य और व्‍यंग्‍य के बीच एक महीन सीमा रेखा होती है। लेखकों को इस पर विशेष ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है।

सबसे पहले सीमा वर्मा ने अपनी कविता ‘ जीवन का सत्‍य और व्‍यंग्‍य’ में जिंदगी के हर पहलू में व्‍याप्‍त व्‍यंग्‍य पर अपने विचार व्‍यक्‍त किये। श्‍वेता कुमारी ने अपनी रचना ‘ फेस बुक ’ के माध्‍यम से आज के मानव की बदलती व्‍यस्‍तता और प्राथमिकताओं पर व्‍यंग्‍य कसा। लेख ‘ हिन्‍दी साहित्‍य में हास्‍य व्‍यंग्‍य ’ में डॉ जी वी वी रामनारायणा ने उदाहरण सहित विश्‍लेषण प्रस्‍तुत किया।

सीमा शेखर ने अपने लेख ‘ लूट सके तो लूट ’ में भ्रष्‍टाचार की अनंत व्‍यापकता पर सूक्ष्‍म मगर प्रभावी विश्‍लेषण प्रस्‍तुत किया। श्रीमती मीना गुप्‍ता ने लेख ‘ जब मैं इन्‍विजिलेशन में गई ’ द्वारा परीक्षा केंद्रों में व्‍याप्‍त घपले, अनैतिकता पर करारा व्‍यंग्‍य किया। ‘ मेरा भारत महान ‘ व्‍यंग्‍य कहानी प्रस्‍तुत की बी एस मूर्ति ने जिसमें आम आदमी की भ्रष्‍टाचार के कारण परेशानी को रेखांकित किया गया। अपनी व्‍यंग्‍य कविताएं ‘पति- पत्‍नी ’, ‘ मतदाता और नेता ‘ के माध्‍यम से सामाजिक व्‍यंग्‍य प्रस्‍तुत किया लक्ष्‍मीनारायणा दोदका ने। बैंक अधिकारी के जीवन में आई व्‍यस्‍तता के कारण बिगड़ते सामाजिक संबंधों पर बीरेंद्र राय ने व्‍यंग्‍य लेख ‘मेरा पेशा ‘ पढा। जी एस एन मूर्ति ने अफसर, पति–पत्‍नी विषयों पर व्‍यंग्‍य कविताएं प्रस्‍तुत की।

‘ कवि की व्‍यथा ‘ और ‘ अभी भी समय है’ शीर्षक की दो कविताओं के माध्‍यम से शकुन्‍तला बेहुरा प्रस्‍तुत हुईं। ‘ शर्म तुम कहां हो ‘ शीर्षक अपने व्‍यंग्‍य में निर्लज्‍ज होते मनुष्‍यों की प्रवृत्‍ति पर करारा कटाक्ष किया डॉ टी महादेव राव ने । डॉ एम सुर्यकुमारी ने अपने व्‍यंग्‍य लेख ‘सर पर बाल न होने पर भी’ में वृद्धावस्‍था में भी यौवन के सपने देखते वृद्ध व्‍यक्‍तियों पर व्यंग्य कसा। नीरव कुमार वर्मा की कहानी ‘ एम एन सी में सी टी सी ‘ में आज की युवा पीढी और बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों पर व्‍यंग्‍य था।

सभी रचनाओं पर विश्‍लेषणात्‍मक चर्चा की गई। सृजन संस्‍था द्वारा आयोजित ऐसे कार्यक्रमों से लेखकों में लिखने की लगन बढ़ रही है ऐसा सभी का मत था। इस कार्यक्रम में साहित्‍य अकादमी बाल साहित्‍य पुरस्‍कार विजेता श्रीमती पुण्‍यप्रभा देवी, डी सी शारदा, रामप्रसाद यादव, डॉ जी रामनारायण, मीनाक्षी देवी, विजय कुमार राजगोपाल, सीएच ईश्‍वर राव सहित कई अन्‍य भी सक्रिय रूप से सम्‍मिलित हुए। सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव के धन्‍यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम समाप्‍त हुआ।

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ख्वाब

अकसर सिहर जाते हैं नफरतों के साए में .

परख नहीं कर पाते अपने और  पराये में .

रंजिशों की तपन में जलते हैं साथ  मेरे , 

ये ख्वाब हैं मेरी जिन्दगी के..

 

दुनिया कसर नहीं छोड़ती अधूरा करने में.

ये  छोड़ देते  है  पसीना खुद  को पूरा करने में.

खुद के लिए दुनिया बदलते हैं साथ मेरे,

ये ख्वाब हैं मेरी जिन्दगी के..

 

वह टूटना नहीं जानते हैं तोड़ दिए जाते हैं

मंजिलों से कुछ दूर पहले छोड़ दिए जाते हैं

निकल कर आँखों से बहते हैं साथ मेरे ,

ये ख्वाब हैं मेरी जिन्दगी के ........

 

     ( व्येंकटेश्वारानन्द मिश्र  )

भरजुना, सतना  (मध्य प्रदेश )

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(चित्र - अमरेन्द्र {aryanartist@gmail.com } , फतुहा, पटना की कलाकृति.)

सम्मानित लेखकगण,

आप सभी के लाभार्थ एक विशेष विज्ञप्‍ति प्रस्तुत है। निम्नांकित पुरस्कार-योजनाओं में भाग लेना आपके लिए उचित होगा। विदित हो कि त्रैमासिक अभिनव प्रयास (अलीगढ, उप्र) में प्रकाशित देश का बहुचर्चित साहित्यिक स्तम्भ तीसरी आँख अपनी निष्‍पक्षता के लिए जाना जाता है। ये सभी वार्षिक पुरस्कार/सम्मान उसी ‘तीसरी आँख’ नामक स्तम्भ द्वारा समारोहपूर्वक प्रदान किये जाते हैं। आशा है, यह सूचना ‘नव्या’ के पाठकों/रचनाकारों के लिए उपयोगी होंगे।

धन्यवाद,

समाचार प्रस्तुतकर्ता:

अश्‍विनी कुमार रॉय ‘प्रखर’

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बहुचर्चित साहित्यिक स्तम्भ तीसरी आँख की पुरस्कार/सम्मान-श्रृंखला:

पुरस्कार क्रमांक-1: श्रीमती सरस्वती सिंह स्मृति: श्रेष्ठ सृजन सम्मान

(1100/-रुपये + प्रमाण-पत्र)

वैदिक क्रांति परिषद की संस्थापिका एवं ‘सरस्वती प्रकाशन’ की प्रेरणास्रोत श्रीमती सरस्वती सिंह जी की पावन स्मृति में निर्धारित उक्त सम्मान साहित्य की किसी भी विधा (गद्य-पद्य) के रचनाकार को देय होगा जिसके लिए प्रविष्‍टियाँ निम्नांकित संलग्नकों के साथ 30 जून 2012 तक सादर आमंत्रित हैं:

1. गद्य-पद्य विधा की तीन फुटकर रचनाएँ (प्रकाशित/अप्रकाशित का बंधन नहीं) मौलिकता प्रमाण-पत्र के साथ।

2. सचित्र परिचय + डाक टिकटयुक्त एक लिफ़ाफ़ा व पता लिखे दो पोस्टकार्ड।

विशेष: इस सम्मान हेतु श्रेष्‍ठ/स्तरीय प्रविष्‍टियों के अभाव की स्थिति में रचनाओं का चयन देशव्यापी पत्र-पत्रिकाओं, इंटरनेट, गद्य/पद्य संग्रहों में से किया जा सकता है।

प्रायोजक: परामर्शदाता: चयनकर्ता:

डॉ. आनन्दसुमन सिंह श्री अशोक अंजुम जितेन्द्र जौहर

(प्र. संपादक ‘सरस्वती सुमन) (संपादक ‘अभिनव प्रयास’) (स्तम्भकार: ‘तीसरी आँख’)

देहरादून, उत्तराखण्ड. अलीगढ़, उ.प्र. सोनभद्र, उप्र

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पुरस्कार क्रमांक-2: श्री केशरीलाल आर्य स्मृति गीत/दोहा सम्मान

(5100/-रुपये + प्रमाण-पत्र)

आर्य समाज-सेवक, स्वाभिमानी राष्‍ट्रभक्त एवं पूर्व स्वतंत्रता सेनानी श्री केशरीलाल आर्य जी की शैक्षिक जागरूकता का सहज अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उन्होंने सन्‌ 1930 में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। उनकी पावन स्मृति में स्थापित उपर्युक्त वार्षिक सम्मान वरिष्‍ठ गीतकार/दोहाकार डॉ. देवेन्द्र आर्य की पितृ-भक्ति का प्रतीक है। यह सम्मान राष्‍ट्रीय स्तर पर चुने गये किसी श्रेष्‍ठ कवि/कवयित्री (कोई आयु-बंधन नहीं) को गीत अथवा दोहा-सृजन के लिए देय होगा। इस सम्मान हेतु प्रविष्‍टियाँ निम्नांकित संलग्नकों के साथ 31 मार्च 2012 तक सादर आमंत्रित हैं:

1. मौलिक गीत-संग्रह अथवा दोहा-संग्रह (प्रकाशन-वर्ष का कोई बंधन नहीं) की दो प्रतियाँ।

2. सचित्र परिचय, प्रविष्‍टि-शुल्क रु. 200/- (मनीऑर्डर द्वारा; चेक अस्वीकार्य) + डाक टिकटयुक्त एक लिफ़ाफ़ा व पता लिखे दो पोस्टकार्ड।

प्रायोजक: परामर्शदाता: चयनकर्ता:

डॉ. देवेन्द्र आर्य डॉ. शिवओम अम्बर जितेन्द्र जौहर

(वरिष्‍ठ साहित्यकार) (वरिष्‍ठ साहित्यकार) (स्तम्भकार: ‘तीसरी आँख’)

ग़ाज़ियाबाद, उप्र. फ़र्रुख़ाबाद, उ.प्र. सोनभद्र, उ.प्र.

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पुरस्कार क्रमांक-3: श्रीमती रत्‍नादेवी स्मृति काव्य-सृजन सम्मान

(5001/- रुपये + प्रमाण-पत्र)

डिप्टी कलेक्टर के रूप में तीन दशक का बेदाग़ सेवाकाल बिताने वाले 74 वर्षीय श्री आमोद तिवारीजी शांत स्वभाव एवं वैदुष्य के धनी हैं। उनकी गहन साहित्य-निष्‍ठा का प्रतीक उपर्युक्त वार्षिक सम्मान उनकी स्वर्गीया धर्मपत्‍नी श्रीमती रत्‍नादेवी जी की पावन स्मृति में स्थापित किया गया है जो कि राष्‍ट्रीय स्तर पर चयनित किसी श्रेष्‍ठ कवि/कवयित्री (युवाओं को विशेष वरीयता, तथापि आयु बंधन-नहीं) को देय होगा। इस सम्मान हेतु प्रविष्‍टियाँ निम्नांकित संलग्नकों के साथ 31 मार्च 2012 तक सादर आमंत्रित हैं:

1. काव्य की किसी भी विधा (छांदस/अछांदस) का मौलिक प्रकाशित संग्रह (प्रकाशन-वर्ष का कोई बंधन नहीं) अथवा मौलिकता प्रमाण-पत्र के साथ अप्रकाशित कृति (पाण्डुलिपि) अथवा न्यूनतम 15 फुटकर कविताएँ।

2. सचित्र परिचय, प्रविष्‍टि-शुल्क रु. 200/- (मनीऑर्डर द्वारा; चेक अस्वीकार्य) + डाक टिकटयुक्त एक लिफ़ाफ़ा व पता लिखे दो पोस्टकार्ड।

प्रायोजक: परामर्शदाता: चयनकर्ता:

श्री आमोद तिवारी डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा यायावर जितेन्द्र जौहर

(पूर्व डिप्‍टी कलेक्टर) (वरिष्‍ठ साहित्यकार) (स्तम्भकार: ‘तीसरी आँख’)

कटनी, म.प्र. फ़िरोज़ाबाद, उ.प्र. सोनभद्र, उ.प्र.

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विशेष ध्यानार्थ:

1.उपर्युक्त सभी सम्मान/पुरस्कार तीसरी आँख द्वारा आयोजित एक भव्य सम्मान-समारोह एवं गरिमापूर्ण अखिल भारतीय कवि-सम्मेलन में प्रदान किये जायेंगे जिनका विस्तृत समाचार विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ प्रेषित किया जायेगा। साथ ही, चयनित कवि/कवयित्री की चुनिन्दा रचनाओं को विभिन्न प्रतिष्‍ठित वेबसाइट्‍स/इंटरनेट पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित करने का प्रयास रहेगा।

2. चयन-प्रक्रिया अत्यन्त पारदर्शी एवं त्रिस्तरीय होगी जिसे परिणामों के साथ घोषित किया जायेगा। कृतियों के निष्पक्ष चयन का आधार-कथन (संक्षिप्‍त समीक्षा के साथ) ‘तीसरी आँख’ में प्रकाशित करने का प्रयास रहेगा।

3. प्रविष्‍टि-शुल्क का उद्‍देश्य व्यावसायिक नहीं है। इन सम्मानों/पुरस्कारों का मूल उद्‍देश्य श्रेष्‍ठ साहित्य-सृजन को प्रेरित करना है।

4. प्रशंसकों/शुभचिंतकों द्वारा भेजी गयी अपने प्रिय कवि/कवयित्री की प्रविष्‍टियाँ (वांछित संलग्नकों के साथ) स्वीकार्य हैं।

5. सभी सम्मानों के लिए अलग-अलग प्रविष्‍टियों की छूट उपलब्ध है; लिफ़ाफ़े पर सम्मान/पुरस्कार का नाम एवं क्रमांक स्पष्‍ट रूप से लिखें।

6. प्रायोजकों अथवा परामर्शदाताओं से चयन-प्रक्रिया अथवा निर्णायक-मण्डल आदि से संबंधित अनपेक्षित जानकारी माँगना अयोग्यता माना जायेगा। किसी भी समय नियम-परिवर्तन एवं अंतिम निर्णय-संबधी सर्वाधिकार उपर्युक्त नामांकित मण्डल के पास सुरक्षित हैं। निर्णय-संबधी कोई भी विवाद कदापि स्वीकार्य नहीं होगा।

7. समस्त प्रविष्‍टियाँ तीसरी आँख के निम्नांकित पते पर निर्धारित तिथि से पूर्व भेजें:

जितेन्द्र जौहर,

आई आर-13/6, रेणुसागर-231218,

सोनभद्र (उप्र). मोबा. 09450320472

ईमेल : jjauharpoet@gmail.com

ऊँट भी खरगोश था

व्‍यंग्‍य - संग्रह

-प्रभाशंकर उपाध्‍याय


 
(  पिछले अंक 9 से जारी...)

तीक्ष्‍णक का बुखार


     संस्‍कृति से सरोकार रखने वाली संस्‍था गुणपारखी द्वारा एक अवसर पर कुछेक समाज सेवकों एवं साहित्‍यकारों का सम्‍मान किया गया। अत्‍यन्‍त गरिमापूर्ण उस आयोजन के विशिष्‍ट अतिथि थे, राष्‍ट्राध्‍यक्ष डा․ समानधर्मा, हिन्‍दी-अंग्र्रेजी के उत्‍कट विद्वान। समारोह की अध्‍यक्षता लब्‍धप्रतिष्‍ठ साहित्‍यकार प्रोफेसर 'उपेक्षित' ने की। अनेक खबरनवीस उस आयोजन में उपस्‍थित थे। संस्‍था द्वारा प्रकाशनार्थ प्रेस-विज्ञप्‍तियां तथा फैक्‍स तत्‍क्षण प्रिंट तथा इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया तक पहुंचा दिए गए। न्‍यूज एजेसिंयों को भी विज्ञप्‍तियां भेजी गईं।     

सामान्‍यतया, समाचार जगत में ऐसी खबरों का कोई खास नोटिस नहीं लिया जाता। उस खबर को भी अधिक स्‍थान नहीं मिला। फौरी  तरीके से  अखबारों ने जगह दी। किन्‍तु श्रृव्‍य-दृश्‍य माध्‍यम तो चुप्‍पी मार गया।    
गुणपारखी का सचिव एक संवेदनशील किस्‍म का नौजवान था। वह मीडिया के नार्मल रवैये से बड़ा 'एबनार्मल' हुआ। सर्वप्रथम उसने न्‍यूज-एजेन्‍सियों से सम्‍पर्क साधा उन्‍होंने कुछ तकनीकी दिक्‍कतें गिना दीं। तदुपरांत , संस्‍था सचिव ने सरकारी दृश्‍य माध्‍यम को पकड़ा। वहां के समाचार सम्‍पादक से उनकी काफी जध्‍दोजहद हुई। वह वार्ता पाठकों के ज्ञानार्थ अविकल प्रस्‍तुत की जा रही है।   
  
स्‍थान है, सम्‍पादन कक्ष। संस्‍था के सचिव तथा समाचार सम्‍पादक परस्‍पर उन्‍मुख हैं - सचिव -''श्रीमान्‌ ! मैं गुणपारखी संस्‍था का सचिव हूँ। हमारी संस्‍था द्वारा आयोजित समारोह की एक विज्ञप्‍ति भेजी गयी थी, लेकिन वह समाचार ․․․․।

संपादक-(बीच में ही ) ''हां, वह समाचार । वह, हमें मिला था बट नेशनल इम्‍पोटेंर्स के     अन्‍य समाचारों की वजह से हमारे पास टाइम कम रहा और हम उसे दे नहीं पाये। ‘‘
सचिव-    '' कोई बात नहीं उसे आज लगा दीजिये। ''
संपादक-    '' क्‍या कह रहे हैं आप? यह इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया है, कोई वीकली पेपर नहीं। यूअर न्‍यूज बिकेम मच ओल्‍ड नाऊ। ''
सचिव-    (हैरत से) -''कमाल है, हमारा कल का समाचार आज इतना पुराना हो गया।आपको याद दिला दूं कि कुछ दिन पहले आपने एक प्रांत में स्‍वर्ण भण्‍डार मिलने का दो वर्ष पुराना समाचार नया मानकर प्रसारित किया था‘‘
संपादक-    (तेज स्‍वर से ) - '' आर यू अवर ऑफिसर? आप यहां खबर देने आये हैं या हमारी गलतियां गिनाने?''
सचिव-    (नरम होकर ) - '' आप बुरा नहीं मानें। मैं माफी मांगता हूं । आप इस समाचार को आज प्रसारित करवा दीजिये, यह पुराना नहीं हुआ है, मेरे कहने का अर्थ इतना ही था। ''( सचिव एक कागज आगे रखता है किन्‍तु समाचार सम्‍पादक उस ओर देखता भी नहीं । )

सम्‍पादक- ''आज तो किसी भी हाल में नहीं लगेगा। (कलाई घड़ी दिखाते हुए) लुक हियर ․․․․․․․․․․․․․․ऑनली हॉफ एन ऑवर रिमेन इन नेशनल ब्रॉडकॉस्‍ट। आपको जल्‍दी आना चाहिए था। ''
सचिव-     ''मान्‍यवर जी, मैं आपके केन्‍द्र में डेढ घंटा पूर्व आ गया था। परन्‍तु प्रवेश  संबंधी औपचारिकता पूरी करने और आपका कक्ष खोजने में मेरा पौन घंटा व्‍यर्थ हो गया।''
सम्‍पादक-    (आधा मिनट तक सचिव को घूरता है ) - '' गिव मी यूअर प्रेसनोट। (प्रेस विज्ञप्‍ति को पढ़ता है ) ओ ․․․․․․․․․․․․․यह तो राजनीतिक समाचार है। इसे कैसे प्रसारित किया जा सकता है? यों भी हम पर राजनीतिक समाचार अधिक देने के आरोप लगते रहे हैं। ''
सचिव-    (विस्‍मयपूर्वक ) - '' यह क्‍या कर रहे हैं श्रीमान्‌ जी? यह सांस्‍कृतिक समाचार है। इसे राजनीतिक किस आधार पर करार दे रहे हैं? ''

सम्‍पादक-    '' इस खबर में एक राजनीतिज्ञ डॉ․ समानधर्मा दिखाई दे रहे हैं। ''
सचिव-    '' ताज्‍जुब की बात है कि मीडिया वाले एक सांस्‍कृतिक समारोह में महामहिम की उपस्‍थिति को राजनीतिक खबर बता रहे हैं। आपको पता है, डा․ समानधर्मा एक विद्वान पुरूष और विचारक हैं। वे अनेक भाषाओं के ज्ञाता हैं, प्रख्‍यात लेखक हैं। उनकी मौजूदगी ही किसी समारोह की गरिमा बढाने के लिए पर्याप्‍त होती है। वस्‍तुतः इस समारोह का कवरेज आपको स्‍वयं ही आकर करना था। श्रोताओं- दर्शकों की आपत्‍ति ऐसे किसी साहित्‍यिक समाचार के प्रति नहीं है। आप रोज रोज राजनेताओं के गैर जिम्‍मेदाराना और फूहड़ वक्‍तत्‍व प्रसारित करते हैं, वे उसके प्रति अपना रोष जताते हैं। आप विगत तीन माह से एक नेता के हास्‍यापद व्‍यवहार को निरन्‍तर प्रसारित किये जा रहे हैं।दर्शकों की आपत्‍ति उनके प्रति है।
समाचार सं -  ‘‘ सॉरी․․․ मिस्‍टर․․․․ वैरी․․․ सॉरी․․․। न्‍यूज ब्रॉडकॉस्‍ट होने में सिर्फ
दस मिनट शेष हैं। न्‍यूज रूम भी पैक हो गया। आई कांट हैल्‍प यू।''
सचिव -    '' देखिये , मैं पन्‍द्रह मिनट से आपके सामने बैठा हूं और अब, आप मुझे समय की मजबूरी बता रहे हैं। ''

सम्‍पादक-    (खीजते हुए ) - '' नो ․․․․․․नो ․․․․․बाबा․․․․․ टाइम इज ओवर। न्‍यूज रीडर को किसी भी हाल में डिस्‍टर्ब नहीं किया जा सकता है। ''
        तभी टेलीफोन की घंटी घनघनाती है। समाचार सम्‍पादक चोगा उठाकर कान से लगाते हैं। दूसरी ओर की आवाज सुनकर सर्तक हो कहते हैं - ''यस सर ․․․․․․ लग जायेगा। सर ․․․․․सर्टेनली लगेगा․․․․․․हां․․․․․हां․․․․․․ नेशनल न्‍यूज में ही लगेगा (ही ही करते हुए घड़ी देखता है ) कैसी बात करते हैं ․․․․․․․सर ․․․․․ अभी तो ब्रॉडकास्‍ट में पांच मिनट बाकी हैं। प्रसारण के बीच भी आपका आदेश आता तब भी लगा देते। फैक्‍स भेजा है․․․․․ जी ठीक है, मैं उसे मंगवा लेता हूं। सम्‍पादक चोगा रखकर, घंटी बजाता है। चपरासी से फैक्‍स मंगवा कर, कहता है '' मिनिस्‍टर तीक्ष्‍णक के पर्सनल सैकेट्री का फोन था। मंत्री साहब को वॉयरल फीवर हो गया है, इसलिए भूसा - घोटाले की सुनवाई हेतु अदालत में उपस्‍थित नहीं हो सकेंगे। इस समाचार को हेड लाइन के साथ आज की नेशनल न्‍यूज में प्रसारित होना है। इसे न्‍यूज रूम में दे आओ, हरी․․․․․․․अप․․․․․। ''
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पियत तमाकू लाल 


बस दौड़ रही थी। मेरे पास बैठे यात्रियों में  आठ-नौ साल का एक गोल-मटोल बालक भी बैठा था। वह अपने शरारती नयन तथा चेहरे की मासूमियत से मुझे बार-बार आकृष्‍ट कर लेता था। बालक के बाजू में बैठा अधेड़, कदाचित उस बालक का पिता  झपकी लेने में तल्‍लीन था।      बस  एक जगह पर ठहरी। बालक बड़े झपाटे से नीचे उतरा। कुछ मिनट बाद वह लौटा तो उसके हाथ में गुटखा के दो पाउच थे। उसने एक पाउच अर्द्ध- निद्रित अधेड़ को दिया। उस आदमी  ने उसी अवस्‍था में पाउच फाड़ा और हलक में उलेड़ा। दो बार पीक थूक कर वह पुनः झपकीलीन हो गया। अब, बालक ने दूसरे पाउच को फाड़ा और उसे अपने मुँह में फांक लिया।  
  
मैं दंग था। उस  मासूम उम्र में गुटखों की घातकता के प्रति आशंकित होकर मैंने उनींदे अधेड़ को झिंझोडा, ''भाई साहब ․․․․․․․․․․․․․․भाई साहब। ''     '' हूँ ․․․․․․․․․․․․․․․। '' उसने बमुश्‍किल आंखें खोलीं।     '' आप जानते हैं, यह गुटखा कितना खतरनाक है? आप खुद भी खाते हैं और यह बच्‍चा भी । कम से कम इस अबोध बच्‍चे को तो रोकिये। ''  
 
अधेड़ ने मुँह की पीक को खिड़की के बाहर खर्च किया और बोले, ''क्‍या करूं, यह नालायक मानता ही नहीं। '' यह कहकर, एक हल्‍का सा तमाचा उसने बेटे के सर पर जड़ा और ऊंघने लगा।      तिरछी नजरों से घूर कर वह बालक खी-खी कर हंस दिया। सहसा, मुझे याद हो आया बिहारी का यह दोहा -
'' ओठ ऊंचेहांसी भरी, दृग भौंहन की चाल।
मो मन कहा न पी लियो, पियत तमाकू लाल॥ ''

     दोहे में वर्णित छवि तम्‍बाकू पीते छबीले नायक की है, जिसने अपने चुलबुले अंदाज से तम्‍बाकू पीने के साथ नायिका का मन पी लिया था। गनीमत है कि किसी कम्‍पनी की निगाह अभी तक इस दोहे पर नहीं पड़ी वरना वह अपने किसी तम्‍बाकू उत्‍पादों के विज्ञापन के साथ इसे जोड़ देता। यों भी इन उत्‍पादों के विज्ञापन जगत पर दृष्‍टि डालें तो इनके अधिकांश पात्र हष्‍ट -पुष्‍ट , बाकें और जवां मर्द ही नजर आयेगे। बीड़ी जैसी नाचीज चीज के विज्ञापन में भी हाथ बांधे पहलवान अथवा गलमुच्‍छों वाला गबरू जवान नजर आयेगा। सिगार और सिगरेट को लें तो उसमें माशूका को बाजू में समेटे, कोई कारनामा अंजाम देते '' ही-मैन'' होंगे।

     गुटखों के विज्ञापन में, ऊंचे लोग-ऊंची पंसद वाले नवीन निश्‍चल अथवा आसमां में लटकी ,मटकी फोड़ते गिरीश कर्नाड होंगे । कहीं, समधीजन बरातियों का स्‍वागत दूध- लस्‍सी से नहीं बल्‍कि पान-मसाला से करना चाहेंगे।

     अगर ,आज '' पीटर द ग्रेट '' जिन्‍दा होते तो उन्‍हें यह देखकर बड़ा सुकून हासिल होता कि तम्‍बाकू के तमाम प्रतिबन्‍धों के बाद भी दुनियां में इसका सेवन निरन्‍तर बढ रहा है। ( एक सर्वे के मुताबिक इसके सेवन में 21 प्रतिशत वृद्धि तथा उत्‍पादक कम्‍पनियों के मुनाफे में 67 प्रतिशत वृद्धि हुई )। सम्राट पीटर ने पन्‍द्रहवीं शती में तम्‍बाकू का सेवन अनिवार्य किया था। मगर अब, तो निषेध के बावजूद , बाल-अबाल, नर-नारियां इसके दीवाने हुए जा रहे हैं। इसे निरखकर निश्‍चय ही पीटर जी की प्रसन्‍नता का पारावार नहीं रहता।     
बहरहाल, भारत सरकार ने 1965 में एक परिपत्र प्रकाशित कर तम्‍बाकू के चौबीस घातक विष गिनाये और इससे होने वाले रोगों का राग अलापा  था। यथा -फेफड़ों की क्षति, कुंचित-आहारनाल, शुक्राणुओं की कमी , कैंसर , मोतियाबिन्‍द, हृदयरोग आदि-इत्‍यादि। विश्‍व में हर दिन ग्‍यारह हजार मौतें होने का ढिढोंरा भी खूब पीटा गया। लेकिन लोग बेहिचक तम्‍बाकू पदार्थों का सेवन कर रहे है। और तो और, समाज का दर्पण कहा जाने वाला साहित्‍य भी सुरती-प्रेमियों की हौंसला अफजाई में पीछे नहीं रहा-

'' कृष्‍ण चले बैकुंठ, राधा पकड़ी बांह।
इहां तम्‍बाकू खाई लो, उहां तम्‍बाकू नांह ॥''                                             -(हिन्‍दी)   



''हुक्‍के को पीना खलल आबरू है।
सुबह होते ही आग ही जुस्‍तजू है॥
मगर इससे बड़ी नेक खू है।
खींचो तो अल्‍लाह, फूंको तो बू है। ''                                             -(उर्दू)



''विट्‌जापुरे पद्यनाभे न प्रष्‍टं।
धृतिंतले सारभूता किमस्‍ति॥
चुतुर्भिमुखैः उत्‍तरम्‌ प्रदत्‍तं।
तमालः तमालः तमालः तमालं ॥ ''                                             -(संस्‍कृत)




     सहसा, मेरी विचारधारा को विराम लगा। झटके से बस रूक गयी। मंजिल आ चुकी थी, अतः मैं उतरने लगा। उसी समय मुझे धकियाता सा, वह बालक बस से उतरा और सामने की थड़ी से गुटखा के पाउच खरीदने लगा ।

     मेरा मन भारी हो गया। मैं थके कदमों से घर की ओर बढने लगा। घर पहुँचकर निढाल पड़ गया। कुछ मिनट बाद मित्र ठेपीलाल ने प्रवेश किया। ठेपीलाल विद्वान व्‍यक्‍ति हैं। अनेक भाषाओं के ज्ञाता हैं, किन्‍तु उन्‍हें नशे की बुरी लत है। गांजा- भांग- तम्‍बाकू उनके प्रिय व्‍यसन हैं। वार्ता के दौर में 'आयी समझ में 'तकिया-कलाम का इस्‍तेमाल  करते हैं।

     मेरे सामने वाली कुर्सी पर पसरते हुए ठेपी बोले, ''दोस्‍त, तुम्‍हें बस स्‍टैंड  से यहां आते देखा था। चाल सुस्‍त थी। मैंने सोचा जरूर कोई बात है, ‘आयी समझ में '। और  मैं वहीं से तुम्‍हारे पीछे -पीछे हो लिया। बताओ क्‍या बात है?''

     मैंने बस में घटित गुटखे वाली घटना सुनाकर आगे कहा, '' इस जहर ने तो किसी को नहीं बख्‍शा। इसने बच्‍चों तक में जड़ें जमा ली हैं। ''

     ठेपी ने बड़े इत्‍मीनान से एक बीड़ी सुलगाई। सुट्‌टा खींचा और धुंआ मेरी ओर पेलकर बोले, '' बस, तुम साहित्‍यकार लोग, चाहे जिस बात पर परेशान हो जाते हो । यह बुरी आदत है। अरे तम्‍बाकू की तलब तुम क्‍या जानो? ' आयी समझ में'। लो इसी विषय पर हिमाचल की एक पुरानी लोक कथा सुनाता हूँ- एक चरवाहा था। मवेशी चरा रहा था। तम्‍बाकू की तलब लगी तो अंटी टटोली । हैरान हुआ कि पोटली तो घर रह गयी। अब जंगल में तामाकू कहाँ मिलती ? थोड़ी देर में व्‍याकुलता बढ गई । हे भगवान! कोई राहगीर भेज दे । निगाहें दौड़ाई। घुमावदार रास्‍तों पर दो मोड़ आगे जाकर देखा। वहां चट्‌टान पर श्‍वेतवस्‍त्रधारी एक वृद्व पुरूष दिखा। उसकी सफेद दाढी हवा में लहरा रही थी। उसकी पलकें बहुत बड़ी थीं। वह अपनी एक पलक को हाथ से ऊँचा कर किसी लम्‍बे कागज को पढ रहा था। चारवाहे ने पूछा, '' यह क्‍या पढते हो?''

     बाबा बोला, '' दुनियां की कुंडली पढता हूँ। बोल तुझे क्‍या चाहिए? राजपाट, मकान, दौलत? मांगले जो चाहे। ''
     चरवाहा कहने लगा, '' नहीं मुझे यह नहीं चाहिए। बस थोड़ी तमाकू चाहिए।
     बाबा ने उसे तम्‍बाकू भरी एक चिलम दी और चला गया। यह थी तमाकू की दीवानगी। चरवाहे ने उसके सम्‍मुख सारे वैभव ठुकरा दिये। ‘आयी समझ में‘।''

      मैं मुस्‍कराया , '' दंतकथाओं द्वारा महिमा मंडन से  किसी वस्‍तु की बुराई खत्‍म नहीं होती। किसी ने कहा है -
''मेहर गयी, मोहब्‍बत गयी, गयी आन और बान।               
धुएं से मुंह झुलसा कर, विदा किया मेहमान॥    

ठेपी कहां मानने वाले थे। अपनी विदृता झाड़ते बोले, '' दंत कथा छोड़ो । मैं तुम्‍हें देवभाषा में एक श्‍लोक सुनाता हूँ-
'' क्‍वचित्‍धुक्‍का, क्‍वचित्‍थुक्‍का, क्‍वचत्‍नासाग्रवर्तिनी।
अहा, त्रिपथगा तमालम्‌ , गंगा पुनाति भुवन त्रयम्‌॥



('' अहा․․․․․․․․ हा․․․․․․․․․․․․․त्रिपथगामिनी तम्‍बाकू, कभी गुड़गुडाहट, कभी थूकने  और कभी सूंघने से गंगा की भांति त्रिलोक को पवित्र बनाये हुए है। )
     मैं कम नहीं था। बोला, '' मित्र, अब मैं तुम्‍हें भी एक श्‍लोक सुनाता हूँ। '' मैंने अपनी डायरी पलटी -
'' रूधिरंच पपातोर्ष्‍या त्रीणी वस्‍तुनि चाभवान।
कर्णेभ्‍यशच तमालंच पुच्‍छाद्‌गोभी बभू वह ॥ ''



     अर्थात्‌ देवराज की गौशाला की गायों को गरूड ने घायल कर दिया था। तब पृथ्‍वीलोक पर उनके तीन अंश गिरे। गायों के रक्‍त से मेहंदी, कानों से तमाल, तथा पूंछ से गोभी पैदा हुई। जरा सोचो ठेपी भाई हिन्‍दुओं हेतु तो यह तीनों पदार्थ तयाज्‍य ही हुए। ऋषि याज्ञवल्‍क्‍य ने भी आठ प्रकार की मदिरा का वर्णन किया है, उनमें तमाल भी एक पदार्थ है। और तुम इसे गंगा के समान, त्रिभुवन को पावन करने वाली बता रहे हो। ''

     ठेपी चुप रहे। पानमसाला का एक पाउच फाड़ने और फांकने में तल्‍लीन थे।

     मैं आगे बोला, ''वैज्ञानिक प्रयोग में निकोटिन की एक बूंद ने एक कुत्‍ते को मार डाला। दूसरे प्रयोग में इसके धुएं से बनाये गये काजल का लेप चूहों पर किया  तो कुछ ही दिन में वे भी अल्‍लाह को प्‍यारे हो गये। ''

     अब ठेपी को मुद्‌दा मिल गया था। वाशबेसिन में पीक थूककर कहने लगे, ''बड़े भोले हो दोस्‍त। कुत्‍तों -चूहों की तुलना इंसान से कर रहे हो। गुटका तो बंदर भी खा रहा है, भिलाई का एक बंदर इसका प्रमाण है और आदमी तो ''साइनाइड'' तक को पचा गया। रामचन्‍द्र पठानिया का नाम सुना है कैसे सुनोगें? अपनी सोच के संकुचित दायरे से तो बाहर निकलो। देखो मानव क्‍या-क्‍या खा रहा है। सांप, टिड्‌डे, छिपकली, ट्रक, साईकिल, कंकड, मिट्‌टी, गोबर, रसोईगैस, कांच-कील कीटनाशक युक्‍त सब्‍जियां और न जाने क्‍या क्‍या? देखो शहरी वायु में कितना जहर है? और तुम निकोटिन का रोना रो रहे हो।''

      ''मित्र, तम्‍बाकू में मात्र निकोटिन ही नहीं और भी विष तथा गैस हैं। कोलीडीन, कार्बोलिक एसिड, परफेरोल, अमोनिया, एजालिन, सायनोजन, कार्बन मोनोक्‍साइड, मार्श इत्‍यादि। ये सभी शरीर के समूचे तंत्र को कहीं न कहीं प्रभावित करती हैं।'' मैंने प्रतिवाद किया।

     पर, ठेपी चिकने घड़े थे। मेरी बात से अप्रभावित रहकर, एक सिगरेट सुलगा ली। कश मारकर बोले, '' यार! तुम हर नशे से दूर हो। चाय तक नहीं पीते। और आये दिन बीमार रहते हो। कभी सर दुखता है, कभी पेट। कभी सर्दी-जुकाम से ग्रस्‍त मिलते हो। हमें देखो इतने जहरी हैं कि जहर भी हमसे घबरा जाये। मजाल जो कभी बुखार आया हो। अरे, हमें छूकर वायरस क्‍या पायेगा? मच्‍छर काटे तो उसे भी नशा छा जाये ।'' ठेपी ने धुंए का गुबार छत की ओर छोड़ा।

     मित्रवर सत्‍य फरमा रहे थे। मुझे जब देखो तब  कोई न कोई मर्ज घेरे रहता था। मेरी खामोशी  देख ठेपी ने ठहाका लगाया। वह ठहाका कुछ लम्‍बा हो गया।  यकायक मित्र को खांसी उठी। उन्‍होंने पेट थाम लिया। एक बलगम का लोथड़ा फर्श पर आ गिरा। मुझे उसमें रक्‍त का थक्‍का नजर आया, पूछा , '' यह क्‍या? ''
    खांसी थम गई थी। ठेपी लाल सफाई देने लगे, '' बलगम में गुटखे का रंग होगा; आयी समझ में।''
     मगर, मैं इतना भोला भी नहीं था। ठेपी  को जबरन डॉक्‍टर के पास ले गया। चिकित्‍सक ने परीक्षण करके बताया कि इन्‍हें टी․बी․ हो गई है। दवाई पूर्णरूप से लेंगे और परहेज करेंगे तो स्‍थिति काबू में आ जायेगी।''
     अब, ठेपीलाल मायूस और खामोश थे।

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भागो․․․रे ․․भागो․․․!

      ताजा आंकड़े तो विदित नहीं, परन्‍तु प्राचीन रिकार्ड के अनुसार देवों और देवियों की संख्‍या तैंतीस करोड़ है। यह पौराणिक आंकड़ा उस समय का है, जब पृथ्‍वी पर मानवों की संख्‍या कम थी। इंसानों से अधिसंख्‍य होने के बावजूद देवगण आपस में, शायद ही झगड़े हों? इनके सारे फ़साद, आदमों और दानवों से हुए।
   
कदाचित, इसी वजह से देवियों और देवताओं ने अपने वाहनों के तौर पर पशुओं तथा पक्षियों का वरण किया। साथ ही उन्‍हें अपने अंगों पर अंगीकार भी किया। मगर, मुआ मानुष, प्रण-प्राण से जप- तप करने के पश्‍चात्‌ भी उतनी नजदीकी नहीं पा सका। जबकि, मानवाधिकार जैसा पंगा भी उन दिनों नहीं था। अलबत्‍ता, एक बार राजा नहुष्‍ ने इन्‍द्रासन हासिल करने पश्‍चात्‌ मानवी ऋष्‍यिों को पालकी में जोतने का हौसला जुटाया था, तो उसे भी श्रापवश इन्‍द्रासन से च्‍युत होना पड़ा था। बहरहाल, देवताओं के  सभी वाहन  ' इको-फ्रेंड ' यानि प्रदूषण रहित हैं। यह भी विस्‍मयपूर्ण है कि प्रकृतितः शत्रु अर्थात्‌ खाद्य-श्रृंखलाबद्ध पशु-पक्षी भी देवों- देवियों के सानिध्‍य में मित्र-भाव से रहे।

    और इसका पुख्‍ता प्रमाण हैं, ' शिव -परिवार ' के वाहन। इस परिवार के मुखिया महेश्‍वर ने वृषभ पर सवारी गांठी और कंठ पर सर्पधारण किया। देवि दुर्गा, शेर पर आसीन हुई। गणेशजी, मूषक पर मोहित हुए तथा कार्तिकेय का मन मयूर पर आ गया। सिंह ने नंदी का भक्षण नहीं किया तथा विषधर ने कभी चूहे को नहीं हड़पा और मोर ने सर्प पर चंचु -प्रहार कदापि नहीं किया।

    शिव परिवार की विशिष्‍टताएं और भी हैं। भोलेनाथ, शमशान की भस्‍म रमाकर, भांग- धतूरा एवं आंक के सेवन में निमग्‍न हैं। मातेश्‍वरी को फल-फूल के साथ मदिरा और रक्‍त भी अर्पित होते हैं। गजानन लड्‌डुओं पर लट्‌टू हैं। किन्‍तु कार्तिकेय की कोई विशेष पंसद नहीं। जैसा भोग मिले उसी में सन्‍तुष्‍ट हैं। गणों और प्रेतों से घिरा, भगीरथी की पावनता तथा चन्‍द्रमा की शीतलता सहेजे और  कैलाश शिखर पर विराजित, शिव परिवार इतनी विचित्रताओं के बावजूद अलमस्‍त और प्रसन्‍न प्रतीत होता हैै। इस खुशहाली का एक राज ' हम दो- हमारे दो ' में भी निहित है अर्थात्‌ आदर्श नियोजित परिवार। यहां तक कि बुद्धि के देव गणेशजी ने दो पत्‍नियों के बावजूद, एक एक पुत्र यानि लाभ और शुभ उत्‍पन्‍न किये।
   
अब, एक देव-त्रयी पर विचार करते हैं। यह तिकड़ी है, ब्रहा्र-विष्‍णु- महेश की। इनके पास संसार के संचालन का चार्ज है। यह तीन विभागों द्वारा संचालित होता है। सृष्‍टि के प्रभारी ब्रहा्रजी हैं। विष्‍णुजी, सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण महकमे, पोषाहार के इंचार्ज हैं। ये बड़े मायावान हैं। इन्‍होंने मृत्‍युलोक में सर्वाधिक अवतार लेकर लीलाएं रचाईं। लक्ष्‍मीजी इनके चरण दबाती हैं। यूं भी रसद विभाग वालों पर लक्ष्‍मीजी की कृपा सदैव बनी रहती है। शंकरजी संहार विभाग के प्रमुख हैं। भूत-प्रेत उनके दरबारी हैं।
   
बहरहाल, दीगर बात यह कि महकमों  के महत्‍व अथवा उनके बंटवारे को लेकर तीनों देवों में कभी कोई असंतोष या  विवाद नहीं उपजा अपितु इन्‍होंने सदा एक दूसरे का जयघोष ही किया।  सामंजस्‍य और समझ की बेहतर मिसाल इस त्रयी ने  प्रस्‍तुत की हैः- जिसने जन्‍म लिया, उसका पालन- पोषण अवश्‍य होगा और उसे मृत्‍यु भी जरूर मिलेगी । जैसा भाग्‍यांकन ब्रहा्राजी करेंगे, शेष दोनों देव, यथा संभव,  उस प्राणी को अपनी अनुकंपा प्रदान करेंगे। दूसरे महकमे के मुखिया द्वारा अधिकारों के अतिक्रमण पर भी ये देवगण खुश ही रहते हैं। यथा- विष्‍णुजी किसी जीव का 'सुर्दशन' से संहार करें तो शंकरजी नाराज नहीं होंगे और भोलेनाथ अपने किसी भक्‍त को समृद्ध कर दें तो विष्‍णु भगवान को कोई एतराज नहीं होगा।
   
ब्रहा्राजी ने हंस को वाहन के रूप में चुना, साथ ही जीवात्‍मा को हंस की भांति उज्‍जवल और निर्मल काया प्रदान की। किन्‍तु मानव ने प्रायः उसे कलुषित ही किया। विष्‍णुजी के पास अत्‍यत्‍न वेगवान गरूड है। यह संकटमोचन हेतु तत्‍क्षण घटना स्‍थल पर पहुंचा देने में समर्थ है। ऐसे पालनहारा के होते हुए भी मनुष्‍य की बुभुक्षा निरत बढती रही।
   
सर्वस्‍व भस्‍म कर देने की क्षमता, त्रिपुरांतक में है। इनके पास इहलोक से तार देने वाली गंगा मां भी हैं। वीतरागी नांदिया उनका वाहन है। नाश्‍वान जगत की प्रतीति होते हुए भी, इंसान नंदी जैसा विरागी भाव नहीं पा सका बल्‍कि कोल्‍हू के बैल की भांति माया-मोह के फेरे में फिरा करता  है। हंस, गरूड, शेषनाग और वृषभ ने परस्‍पर वैमनस्‍य कभी नहीं पाला जबकि मानव इन प्रवृतियों का पालतू हो गया।
   
एक विख्‍यात त्रयी और है- गणेश-लक्ष्‍मी-सरस्‍वती की। यह बुद्धि, वैभव और विद्या की दाता है। लेकिन इनके विभाग स्‍वतंत्र हैं। प्रायः एक दूसरे के कार्यो में दखलंदाजी नहीं देते। प्राणी को अपनी मर्जी से 'वर' देते है, किसी को अल्‍प और किसी को बेतहाशा। लुब्‍बेलुबाब, यह कि जिसके पास बुद्धि हो उसका धनवान होना आवश्‍यक नहीं और हरेक धनपति का विद्वान होना जरूरी नहीं है। बिरले व्‍यक्‍ति ही ऐसे हैं, जिन पर गणेश लक्ष्‍मी और सरस्‍वती की त्रयी ने संयुक्‍ततः  निवेश किया हो।
   
चुनांचे , इनके वाहनों पर दृष्‍टि डालें। महाकाय गजानन ने नन्‍हें मूषक का वरण किया। सौंदर्यवती महालक्ष्‍मी ने कुरूप उल्‍लू को चुना। वीणावादिनी को हंस भा गया। तात्‍पर्य यह कि बुद्धि को स्‍थूल और भोथरा नहीं होना चाहिए। वह चूहे की भांति सूक्ष्‍म तथा तीक्ष्‍ण हो ताकि अज्ञान के आवरण को भेद कर प्रविष्‍ट हो सके। उलूक की भांति निवड़ अंधकार में लक्ष्‍य को देख सकने वाला उद्यमी ही लक्ष्‍मीवान हो सकता है । 'रातोंरात मालामाल हो जाना ', कहावत का निहितार्थ भी कदाचित यही है। ज्ञान की कांति हंस की माफिक धवल है। सरस्‍वती का कृपापात्र, इसी दीप्‍ति से प्रदीप्‍त हो उठता है।

    किन्‍तु, कतिपय गणपित भक्‍तों ने मौके-बे-मौके प्‍लेग के चूहों की भांति उत्‍पात मचाया और दहशत फैलायी। लक्ष्‍मी पुत्रों ने ‘हर शाख पर उल्‍लू बैठा है‘ को चरितार्थ किया और सरस्‍वती साधकों ने पद तथा पुरस्‍कार की लोलुपता में अवनति को अपनाया। और अगर ऐसी  प्रवृतियां बढती रहीं तो देवगण एक दिन चीख पड़ेंगे, ‘भागो रे भागो, मानुष आया।

        प्रशासनिक कार्यालय : एक प्रश्‍नोत्‍तरी

प्रश्‍न-    '' नौकरी न कीजै चाहे घ्‍ाास खोद खाइये '' अथवा '' नौकरी करे आवे चोट, उससे भले भीख के रोट'' इन लोकोक्‍तियों का तात्‍पर्य स्‍पष्‍ट करें तथा इस पर अपने विचार व्‍यक्‍त करें।

उत्‍तर -    उपरोक्‍त उक्‍तियों में नौकरी को अत्‍यन्‍त निकृष्‍ट कर्म बताया गया है। नौकरी करने की अपेक्षा घास खोदना श्रेष्‍ठकर है। नौकरी में नुकसान की गुंजाईशें हैं, अतः उससे हितकर तो भीख मांगना माना गया है। लेकिन, हमारा विचार इससे भिन्‍न है। अगर, इन जनश्रुतियों का जन्‍मदाता प्रशासनिक कार्यालयों का हाल देखता अथवा वहां नौकरी कर रहा होता तो महसूस करता कि नौकरी के क्‍या मजे हैं, और कितने  रूतबे हैं?

प्रश्‍न-    प्रशासनिक कार्यालय क्‍या होता हैं? इसके महत्‍व पर प्रकाश डालें?

उत्‍तर-    अधीनस्‍थ विभागों के पर्यवेक्षण तथा नियन्‍त्रण हेतु प्रशासनिक कार्यालयों को स्‍थापित किया जाता है। जिस भांति, दूध की मलाई उसके ऊपर छायी रहती है, उसी प्रकार अधीनस्‍थ कार्यालयों पर प्रशासनिक कार्यालय, आच्‍छादित रहते हैं।

प्रश्‍न-    प्रशासनिक कार्यालय की पहचान के बिन्‍दु बताईये?

उत्‍तर -    प्रशासनिक कार्यालय को निम्‍न बिन्‍दुओं के आधार पर आसानी से पहचाना जा सकता है-

(अ) जिस कार्यालय में कार्यारंभ का समय हो जाने के उपरान्‍त भी कर्मचारीगण निश्‍चिंतता पूर्वक आ रहे हों या प्रांगण की गुनगुनी धूप में धूम्रपान, गुटखा-जर्दा के सेवन मेें जुटे हों। अथवा कानाफूसियों, चुहलबाजियों, तथा मोबाइल पर वार्ता में लीन हों।
    (ब) जिस कार्यालय के अधिकांश आसान रिक्‍त हों और जलपान गृह सदा  भरा हुआ हो।
    (स) जिस कार्यालय में प्रकरणों का निबटान आसान न हो बल्‍कि उसे अधिक उलझा दिया जाए। किसी मुद्‌दे पर निरर्थक बहस कर, राई का पहाड़ बनाया जा रहा हो।
    (द) जिस कार्यालय के कर्मचारी के व्‍यवहार में आगंतुक के प्रति सद्‌भाव का अभाव हो। मुख-मुद्रा रूखी प्रतीत हो और वाणी में कर्कशता का आभास हो।

प्रश्‍न-    कथन है कि प्रशासनिक कार्यालयों की हवा ही कुछ और होती है। क्‍या यह कथन सत्‍य है? उदाहरण सहित समझाएं।

उत्‍तर -    यह कटु सत्‍य है। प्रशासकीय कार्यालयों का  आलम अलग ही होता है। कहा जाता है कि अधीनस्‍थ कार्यालय का चूहा भी कुछ दिन वहां रहकर, उस आबो-हवा का सेवन कर ले, तो शेर की मानिंद दहाड़ने लगे।
    अब, एक नवयुवक लिपिक का उदाहरण प्रस्‍तुत किया जाता है ः- उसकी प्रारंभिक नियुक्‍ति एक अधीनस्‍थ विभाग में की गई थी। किन्‍तु कुछ माह पश्‍चात्‌ उसे प्रशासकीय कार्यालय में स्‍थानान्‍तरित कर दिया गया। वह, अत्‍यन्‍त अनिच्‍छा पूर्वक वहां गया। कोई एक माह पश्‍चात्‌ अधीनस्‍थ कार्यालय द्वारा भेजे गये पत्रों, प्रस्‍तावों, मसविदों पर तल्‍ख टिप्‍पणियां आने लगीं। अधीनस्‍थ कार्यालय का बड़ा अधिकारी हैरान था। यकायक यह तब्‍दीली कैसी? वह एक दिन अधीनस्‍थ कार्यालय का अधिकारी प्रशासनिक कार्यालय गया और पूछताछ की तो पता चला कि नया बाबू जिसे जबरन अधीनस्‍थ कार्यालय से ठेला गया था, सारी कारगुजारी  उसकी ही थी।

प्रश्‍न-    प्रशासकीय कार्यालय की कार्यशैली का एक उदाहरण और दीजिये।

उत्‍तर-    प्रशासकीय कार्यालय की काम अटकाऊ शैली का एक नमूना पेश है- मामला अधीनस्‍थ विभाग में कार्यरत्‌ एक अधिकारी के अवकाश का है। पूर्व में वह अधिकारी, ''क'' नामके प्रशासकीय कार्यालय के नियंत्रण में काम करता था। अनेक अड़चनें डालने के उपरांत, उसका अवकाश स्‍वीकृत हुआ। किन्‍तु, उस हतभागे अधिकारी के छुटि्‌टयों पर प्रस्‍थान से पूर्व ही विभाग का नियंत्रण बदल कर ''ख'' प्रशासकीय कार्यालय के अंतर्गत हो गया। जब उस अधिकारी ने एवजी अधिकारी की प्रतिनियुक्‍ति हेतु ''ख'' नामके प्रशासनिक कार्यालय से सम्‍पर्क किया तो वहां से टका सा जवाब मिला कि आपका अवकाश ''क'' प्रशासनिक कार्यालय से स्‍वीकृत हुआ था, अतः यह मामला, हमसे संबंधित नहीं है। परेशान हाल अधिकारी ने पुनः ''क'' को दूरभाष किया तो उत्‍तर मिला, '' हम आपकी भार मुक्‍ति हेतु  अधिकारी क्‍यों भेजें? हमने तो आपका अवकाश स्‍वीकृत कर दिया था। अब आप''ख'' के नियंत्रण में अतः  एवजी अधिकारी हमारे द्वारा नहीं भेजा जाएगा। चूंकि, यह आपके और ''ख'' के बीच का मामला है, अतः इसे आप स्‍वयं ही सुलझाएं।

प्रश्‍न-    प्रशासकीय कार्यालय सदा अड़चनें ही नहीं डालते बल्‍कि मददगार भी सिद्व होते हैं। क्‍या यह कथन सत्‍य है। यदि हां तो उदाहरण दीजिये।

उत्‍तर -    प्रशासनिक कार्यालय सहयोगी भाव भी रखते हैं, सिर्फ उनसे जिनके प्रति उनका सौहार्द रहता है। इसका एक उदाहरण प्रस्‍तुत है- एक प्रशासकीय कार्यालय को किराये पर जीप का अनुबंध करना था। नियमानुसार तीन वाहन मालिकों से प्रस्‍ताव आमंत्रित किये गये। एक पूर्व निश्‍चित वाहन मालिक को अनुबंधित किया गया।

    अब, वह वाहन स्‍वामी  यह भी चाहता था कि उसका अनुबंधित वाहन हमेशा, उसके घर पर ही रहे और जब कार्यालय को जरूरत हो तो मंगवा लिया करे। किन्‍तु विभागीय नियम यह था कि अनुबंधित वाहन सदा कार्यालय में उपलब्‍ध रहेगा। प्रशासनिक कार्यालय का आला अधिकारी उस जीप मालिक के प्रति कृपालु था। अतः, उसने यह मामला अकांउटेंट को सौंपा। उस समस्‍या का समाधान चतुर लेखाकार महोदय ने कुछ इस तरह की टिप्‍पणी लिखकर कियाः- '' कार्यालय में जीप की मौजूदगी के लिए 'गैराज' की व्‍यवस्‍था करनी होगी। चूंकि, कार्यालय में 'गैराज‘ उपलबध नहीं है। अतः 'गैराज‘ किराये पर लेना होगा । इससे कार्यालय पर अतिरिक्‍त व्‍यय भार भी पड़ेगा। अतः वाहन मालिक को अनुबंधित जीप उसके निवास पर रखने की अनुशंसा की जाती है।''

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करजा लेकर मरजा

         मुंशी प्रेमचन्‍द ने एक जगह लिखा है कि कर्ज़ वह मेहमान है जो एक बार आकर, जाने का नाम नहीं लेता। पुरानी लोकोक्‍ति में भी करजे को पहाड़ से भारी माना गया है।  उस जमाने में इंसान उऋण होने के लिए उतावला हुआ करता था। वह इहलोक का समूचा कर्ज़ उतार देना चाहता था ताकि परलोक में सुकून से जी सके। प्राचीन चिंतक चार्वाक ने भौतिकवाद का बहुत ढोल पीटा- ''यावंज्‍जीवेत्‌ सुखं जीवेत, ऋण कृत्‍वा घृतं पिबेत, भस्‍मी भूतस्‍य देहस्‍य पुनरागमनम्‌ कुतः।'' मगर उस बेचारे की दुनियां ने नहीं सुनी। परलोक बिगड़ने का डर जो था। इसी मुद्‌दे का लाभ, उधार वसूल करने वाला भी उठाता था।

वह मसल हाजिर है -     एक दीढ़ उधारिये ने अनेक तकाजों के उपरान्‍त उधार नहीं चुकाया तो साहूकार ने तैश में आकर, ऋणी का लिखा रूक्‍का यह कहकर फाड़ दिया कि तुझे कर्ज़ नहीं चुकाना है तो मत चुका। मरने के बाद भगवान के घर हिसाब- किताब कर लेंगे। ईश्‍वर के सम्‍मुख जवाबदेही से खौफ खाकर, उस उधारिये ने फौरन उधार चुकता कर दिया।

इसी तरह , मुस्‍लिम हदीस का फ़लसफ़ा भी कहता है कि कोई अल्‍लाह की राह में शहीद हो तो वह जन्‍नत में उस वक्‍त तक दाखिल ना होगा, जब तक उसका कर्ज़ अदा न कर दिया जाए, दूसरी हदीस में भी लिखा है कि ऐसे शख्‍स के सारे गुनाह माफ होंगे सिवा कर्ज़ के। जापान के एक सज्‍जन हैं, अकीरा हरेरूया। वे अपनी उधारी चुकाने के लिए सड़क पर कई वर्षो से पिट रहे हैं। अकीरा को एक बार पीटने का शुल्‍क है, एक हजार येन। वे पेशे से इलेक्‍ट्रिशयन है, लेकिन कर्ज़ की अदायगी हेतु अतिरिक्‍त आमदनी के लिए ऐसा कर रहे है। किन्‍तु ऐसे भद्र पुरूष बिरले ही मिलेंगे। 

    क्‍योंकि अब सोच बदल गयी हैं आज वसूलने वाला कर्ज़दारी के कागजात भूले से भी नष्‍ट कर दे तो ऋणी की बांछें खिल जायें। अब तो जिसने उधार दिया है, वह इस तरह गुनगुनाता है - ''हमने उनकी याद में जिन्‍दगी गुजार दी, मगर वो नहीं आये जिन्‍हें उधार दी। '' राजस्‍थानी कहावत है, ' घी खा रे घी खा, पगड़ी राख घी खा। ' यानि पगड़ी को गिरवी रखकर भी घी खा। ज्‍योतिष शास्‍त्र में लिखा है कि छठे भाव के स्‍वामी के साथ मंगल की युति या दृष्‍टि संबंध हो अथवा बुध नीच-भाव का हो तो ऐसी कुंडली वाला व्‍यक्‍ति कर्ज़दार हो जाता है। जब शुभ भाव में गुरू होगा तभी तो कर्ज़ चुकेगा। अब बताये कि इसमें बेचारे कर्ज़दार का क्‍या दोष ? सब ग्रहों का हेर-फेर है।

    वस्‍तुतः, कर्ज़ अदायगी का युग अब गया। कवि सत्‍यपाल नगिया के अनुसार  ‘कज़र् लिए चल खाता चल, सबका माल पचाता चल। कज़ार् जो भी वापस मांगे, गाली उसे सुनाता चल' का अफ़साना विकसित हो चला है। अर्थात्‌ उधार लेना, आन-बान-शान का प्रतीक है। फ़ाकामस्‍त मिर्जा गालिब को कर्ज़ पर मदिरा मुश्‍किल से ही मयस्‍सर हुआ करती थी किन्‍तु, अब कर्ज़ पर शराब ही नहीं, नाना  प्रकार की उपभोक्‍ता सामग्री उपलब्‍ध हैं मनचाही चीज खरीदिये। उपभोग कीजिये। किश्‍तें चुका सकें तो चुकाइये अन्‍यथा फाका मस्‍त हो रहिए।     
यह किश्‍तों का मामला भी बड़े गुल-गपाड़े वाला है। 'थोड़ा सा नकद चुकावें, शेष आसान किश्‍तों में ' जैसे जुमले ने बाजार जमा दिया है। और ये किश्‍तें आसान किसके लिए रहेंगी? चुकाने वाले के लिए या वसूलिये के लिए ? अलबत्‍ता, जिसे आसान नहीं होगा, वह ही भुगतेगा।    

 हाल के वर्षो में उधारवादी मानसिकता के ऊंट ने बड़ी तेजी से करवट बदली है। इस संस्‍कृति के चलते आलम यह है कि क्रेडिट कार्डधारी शख्‍स अपने आगे अन्‍य को तुच्‍छ मानते हैं। क्रेडिट-कार्ड पर से खरीद फरोक्‍त करना प्रतिष्‍ठा पूर्ण हो गया है। एक नहीं चार चार क्रेडिट कार्ड के मालिक हैं, भाई लोग।    
फिलवक्‍त, भोगियों के अनुभव बताते हैं कि नकद क्रेता सदा पछताता है और उधार खरीद करने वाला मजे मारता है। नकद खरीदारी, वह तोता है जो क्रेता के हाथों से फुर्र हो गया। खरीदे सामान में कोई खामी निकल आयी तो खरीदार, विक्रेता के सामने गिड़गिड़ाने के अलावा कुछ नहीं कर सकता। मर्जी है दुकानदार की। वह उस शिकायत पर तवज्‍जा दे अथवा नहीं। दूसरी ओर, कर्ज़ के जरिये क्रय करने वाला, वस्‍तु की छोटी से छोटी खामी को बढा चढा कर बतायेगा । और अगली किश्‍त रोक देने रौब भी दिखा देखा। फलतः ऐसे खरीदार को विक्रेता, रिरियाकर संतुष्‍ट करने का प्रयास करेगा।     

मेरे मित्र हैं, ठेपीलाल। ऋण -संस्‍कृति के खासे दुश्‍मन और नकद खदीदारी के पक्‍के पक्षधर। उधार को प्रेम की कैंची समझते हैं और इस विषय पर चर्चा चलते ही शेक्‍सपियर की यह उक्‍ति दोहराया करते हैं -'न उधार लो न दो, क्‍योंकि उधार से अक्‍सर पैसा और मित्र दोनों खो जाते हैं और उधार से भी किफायतशारी कुंठित हो जाती है। '    

सदा पैदल चलने और स्‍वस्‍थ रहने की नसीहत पर अमल करने वाले ठेपी भाई को मैंने एक दिन मोटरसाईकिल चलाते देखा। मैं कहीं सपना तो नहीं देख रहा। चिकोटी काटकर यकीन किया कि वह यथार्थ ही है। सोचा कि शौकिया तौर पर चला रहे होंगे? दूसरे दिन मोटर साईकिल पर सवार होकर मेरे घर आ धमके तो मैंने पूछा । वे गर्वपूर्वक बोले, ''बेचनेवाले को धन की आवश्‍यकता थी। और सस्‍ती बेच रहा था अतः मैंने नकद भुगतान कर खरीद ली। सिर्फ छः महीने पुरानी है।'' ठेपी भाई प्रसन्‍न थे। हमने भी हर्ष जताया।  
  
दो माह बाद ठेपीलाल बैंक में आये। थोड़े से व्‍यथित लगे। बोले, '' जिनसे मैंने मोटरसाईकिल ली है, उन्‍होंने बैंक से ऋण लिया था, क्‍या यह सही है? ''    

मैंने पूछा ,''खरीदते वक्‍त कागज नहीं लिये थे क्‍या? ''    

ठेपीलाल बोले, '' उसने कहा था कि कागज बाद में दूंगा। ''    

मैंने विक्रेता का नाम पूछकर खाता तलाशा। बात सच थी । बैंक-कज़र् से खरीदी गयी मोटरसाईकिल की एक किश्‍त भी नहीं चुकायी थी उस सज्‍जन ने। मैंने मित्र को बताया कि ऋणी को नोटिस दिये जा चुके हैं और इस गाड़ी को बैंक कभी भी जब्‍त कर सकती है।
    
ठेपीलाल की नींद हराम हो गयी। उसने बेचने वाले पर अनेक प्रकार के दबाव डाले। किन्‍तु वह कान में तेल दिये बैठा रहा। सच है, सीधे का मुंह कुत्‍ता चाटे। दरअसल, बैंजामिन फ्रैकलिन की यह उक्‍ति भी अब बेमानी हो गई है कि जो कर्ज़ आप पर है उसे चुका दें फिर आपको पता चलेगा कि आपके पास अपना क्‍या है?     

इसी तरह विदेशी कथन है कि देने और लेने में कलाई के घुमाव का ही अंतर है- ''डिफरेंस बिटवीन ए बैगर एण्‍ड ए  गिवर, इज इन द टि्‌वस्‍ट ऑफ द रिस्‍ट '' भारतीय दर्शन भी कहता है कि देने वाले का हाथ सर्वदा ऊपर रहता है। और लेने वाले का नीचे। आज, यर्थाथ में यह हो भी रहा है। देने वाले का हाथ सदा ऊपर ही रहता है। जब लेने वाला चुकाने की जगह, गुर्राकर धमकाता है ,तो  वस्‍तुतः देने वाले के दोनों हाथ ऊपर हो जाते हैं।

शायद, इसीलिए हास्‍यावतार काका हाथरसी कह गये-
''जप तप तीरथ व्‍यर्थ है, व्‍यर्थ यज्ञ और योग।
कर्जा लेकर खाइये, नित्‍य प्रति मोहन भोग॥
नित्‍य प्रति मोहन भोग, करो काया की पूजा।
आत्‍म यज्ञ से बढकर यज्ञ नहीं है दूजा॥
कह काका कविराय नाम कुछ रोशन करजा।
अरे! मरना तो निश्‍चित है, करजा लेकर मरजा॥ ''
 

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    चलती किसी की जीभ किसी का जूता चलता

               
   
    एक कहावत है, ''जूते दो, चिंता सौ‘‘। अमूमन एक आम आदमी के पास एक जोड़ी जूते अथवा चप्‍पल बमुश्‍किल होते हैं। परन्‍तु इन पगरखियों के प्रति उसकी चिंताएं सौ होती हैं। मंदिर में, दावत में, अदावत में, सफर में, वह कहीं भी निष्‍फ्रिक नहीं हो पाता। उसका मन तो जूतों-चप्‍पलों की सुरक्षार्थ ही अटका रहता है।

    अरे, भले मानुस! तुम्‍हारे इन िघसे-पिटे, जीर्ण-शीर्ण जूतों-चप्‍पलों को भला, चोर क्‍यों चुरायेगा, ? उसे चाहिए, उसके नाप के उम्‍दा किस्‍म के, ब्रांडेड कम्‍पनी के जूते। लेकिन फिक्रमंदी, पीछा ही नहीं छोड़ती। रेल के सफर के दौरान ऊपर की बर्थ पर सोते वक्‍त, आम आदमी अपने उन चरण सेवकों को अपने सर पर चढा लेता है।

    आदि मानव इन चिंताओं से मुक्‍त था। पुराण काल के प्रारंभ में भी संभवतया इनका अस्‍तित्‍व नहीं था। तभी तो भृगु ऋषि को विष्‍णु भगवान पर पद-प्रहार करना पड़ा था। अन्‍यथा जूता या चप्‍पल ही फेंक मारते। इस तरह कम-अज-कम उनका गुण-बल तो बच जाता। कदाचित इसी भय से बाद में ऋषि-मुनियों ने 'खड़ाऊं‘ का वरण किया। कालांतर मं,े इस खांटी खड़ाऊं ने बड़ा महत्‍व पाया। रामचंद्रजी की खड़ाऊं चौदह वर्ष तक अयोध्‍या में सिंहासीन रहीं। एक आख्‍यान के हवाले से पता चलता है कि राजसी नारियां उन दिनों जूतियां पहनती थीं।  एक अवसर पर योगीराज कृष्‍ण को द्रौपदी की जूतियां उठानी पड़ी थीं। जूतों का ऐतिहासिक संदर्भ देखें तो इसका प्रथम प्रमाण नवप्रस्‍तर काल में स्‍विट्‌जरलैंड में मिला है। सीरिया के भित्ति चित्रों के मुताबिक ईसा से दो हजार वर्ष पूर्व भी मानव द्वारा पदत्राण उपयोग में लाने का चित्रण है।

    वर्तमान काल में सियासतदाओं के इर्द-गिर्द मंडराते, सर्राते इन जूतों ने पहले भी कम सितम नहीं ढाये। ‘मैं तुझे जूते की नोंक पर रखता हूं' यह एक कहावत है। कदाचित यही वजह थी कि नुकीली नोंक के जूतों का चलन चला। पंद्रहवीं शती में तो यूरोप के शाही खानदानों में लम्‍बी नोंक के जूतों का प्रचलन काफी हद तक बढ गया था। इन्‍हें 'पोलेंस‘ कहा गया। प्रतिस्‍पर्धा के फलस्‍वरूप इनकी नोंकें लम्‍बी होती गयीं। शनैः शनैः ये दो फीट तक हो गयीं और इन नोकों को जंजीर की मदद से घुटनों के साथ बांधा जाने लगा। जूतों की नोकों को सलामत रखने की फिक्र में रईसजादे ठुमकते-बलखाते-इतराते नाज़नीनों की भांति चलने लगे थे। तब, ब्रिटेन के बादशाह ने जूते की नोंक को दो इंच तक सीमित रखने का आदेश निकाला था।

    सोलहवीं शताब्‍दी से बीसवीं शती तक  जूता उद्योग ने पर्याप्‍त  विकास पाया। 'पैटनूस', 'चोपाहन्‍स', 'चैकबूट', वेलिंगटनबूट्‌स' के क्रम में चमड़ा, कपड़ा, रबर, प्‍लास्‍टिक और अन्‍य सिंथेटिक पदार्थों से बने जूते-जूतियां बाजार में आते चले गये। अंग्रेजों के जमाने में डासन का जूता भी विख्‍यात हुआ था। भारत में इसे मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरू पहना करते थे। उस जूते की ख्‍याति से प्रभावित होकर अकबर इलाहाबादी ने लिखा-

बूट डासन ने बनाया, मैंने इक मज़मूं लिखा।
मेरा मज़मूं चल न पाया, डासन का जूता चल गया॥



    इसी मौजूं पर जगदीश्‍वर नाथ विमल लिखते हैः-

सच पूछो तो दुनियां में सब कुछ चलता।
खरे माल को धक्‍का दे खोटा चलता॥
बिजनिस के ठेले पर टोटा चलता।
चलती किसी की जीभ किसी का जूता चलता॥



तदुपरांत, बाटा और बीएससी कम्‍पनियों ने बड़ा नाम और नामा कमाया। आगरा और कानपुर का देशी जूता उद्योग खूब चला। कोल्‍हापुरी चप्‍पलें चल गयीं। 'बूट-पालिश‘ फिल्‍म ने धूम मचायी। जूते चुराने के विवाह गीत-'जूते ले लो․․․पैसे दे दो‘ ने दर्शकों का दिल चुराया।

इसके अलावा जूतों के कुछ इतर उपयोग का वर्णन करना भी उचित होगा- यथा, इनकी माला पहनाना, इन्‍हें पैक करके भेंट करना, जूतम-पैजार के दौरान एक दूसरे पर पांच-दस तड़का देना, बोर कवि पर जूते-चप्‍पल फेंक मारना। आदि इत्‍यादि। इधर, सियासी शख्‍सों पर जूते-चप्‍पल फेंकने के मामले भी बड़ा गुल-गपाड़ा मचा रहे हैं।

इस मामले में हमारे पुरखे अत्‍यंत समझदार और दूरदर्शी थे। सार्वजनिक आयोजनों के दौरान पगतरियों को बाहर उतार देने की परम्‍परा उन्‍होंने पहले ही डाल दी थी। हमारे बहुतेरे ग्रामीण बंधु, अब भी कार्यालयों में प्रवेश से पूर्व अपनी पगरखियों को बाहर ही उतार देते हैं। न साथ रहेगा, जूता और न चलेगा। कहिए क्‍या ख्‍याल है, आपका?

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आह! हमारी अंतर्यात्रा․․․․․

   
    कुछ दिनों पूर्व मैंने ‘जीवन जीने की कला' नामक एक लघु पुस्‍तिका पढी। पुस्‍तिका का एक नुस्‍खा मुझे बड़ा पसंद आया। लिखा था कि कभी अंतर्यात्रा पर जाओ और ‘स्‍व' को खोजो, खुद को जानो और अपने लाइफ-स्‍टाइल में आमूल परिवर्तन कर डालो।

     बात पते की थी तथा मुझे जम गयी। पेशे और परिवार की अनेक परेशानियों के चलते, सैर-सपाटे पर तो कभी जा नहीं सका था तो क्‍यों नहीं, ऐसी अंतर्यात्रा ही कर लूं? अतः एक सुबह जल्‍दी जागा। पुस्‍तक के मुताबिक मुझे हवादार कमरे को चुनना था। मेरे छोटे से दड़बानुमा घर में सिर्फ एक कमरा तनिक हवादार था, जिसकी खिड़कियां वहां जमे सामानों से जाम थीं। उन दो खिड़कियों को खोलने के लिए सामानों को इधर-उधर करने की मशक्‍कत में ही, वह सुबह खर्च हो गयी। खिड़कियों को खोलने की कसरत में बीवी की झिड़कियां भी सुननी पड़ी कि इन्‍हें भी बैठे-ठाले जाने क्‍या क्‍या सूझता रहता है।

    दूसरी सुबह, सबको ताकीद किया कि मुझे एक घंटे तक डिस्‍टर्ब नहीं करें क्‍योंकि मैं अंतर्यात्रा पर जा रहा हूं। मैं आसन बिछा कर बैठ गया और ध्‍यान लगाने की चेष्‍टा करने लगा। बंधुओं! बड़ा कठिन कार्य है, यह। मुआ मन, उस शरारती बालक जैसा है कि उसे जब जब पकड़ो, वह चंगुल से निकल भागता है। छकाये जाता है, छकाये जाता है। बहरहाल, आधा घंटा की मशक्‍कत के बाद मन की चंचलता कुछ कम होती प्रतीत हुई।

    किताबी गुरू ने लिखा था कि अपने चित को वनांचलों, पर्वतों की वादियों, सागर के तटों आदि इत्‍यादि स्‍थानों की ओर ले जाओ। मैंने मन को रणथंभोर के जंगलों की ओर धकेला। रे मन! चल टाइगर प्रोजेक्‍ट में और वहां स्‍वछंद विचरते चीतों को देख। मेरा चित उस प्रलोभन में आ गया और एक बाघ वहां नजर भी आया। उसे पास जाकर देखने का मन हुआ, लेकिन  यह क्‍या? बाघ का चेहरा तो बॉस से मिल रहा था। दहाड़ती-डपटती मुख मुद्रा। मेरा मन वहां से दुम दबाकर भाग छूटा।

    चित को पुनः स्‍थिर किया तो कुलांचे भरते हिरन दिखाई दिए। हां, यह ठीक है, इन मासूमों से कैसा भय? सहसा कोई शोर सा सुनाई दिया। उसने जंगल की नीरवता को भंग कर दिया। अरे! दूधवाला, उसकी भैंस और मेरी बीवी यहां कहां से आ टपकी?

    ओह! यह तो दूधिये और पत्‍नी की नोंक-झोंक है। दूध में पानी मिलाने की वही पुरानी किच-किच। दूधवालों की यह कला भी शाश्‍वत है और जो शाश्‍वत है वह ईश्‍वर है। जो नश्‍वर है वह संसार है। तब तो इस समस्‍या को परम पिता भी नहीं सुलझा सकते। लो, चित फिर बहक गया।

    मैंने मन को कहा, ''यार, तू भी किस पचड़े में जा पड़ा? चल, इस बाह्य यात्रा को त्‍यागकर पुनः अंतर्यात्रा पर चलें।‘‘ चपल चित को यह भी समझाया कि अब आकाश में उड़ेंगे। जमीं के सारे झंझटों से दूर-सुदूर। किताब में लिखा था कि मन को पक्षियों की भांति उन्‍मुक्‍त कर दें। आसमान में कलरव गान करें। मेरे मन में गीत गूंजा-''पंछी बनूं उड़ के चलूं नील गगन में, आज में आजाद हूं दुनियां के चमन में।‘‘

    लिहाजा, प्रसन्‍नचित चित को मैं ले उड़ा। यत्र-तत्र-सर्वत्र। कोई बंधन नहीं, कोई बाधा नहीं। थोड़े प्रयास के पश्‍चात्‌ पक्षियों की चहचहाहट भी सुनाई देने लगी। सफलता के सोपान पर पहुंच कर, मैं विस्‍मय विभोर था। शनैः शनैः उस कलरव गान की तीव्रता बढने लगी। लगा कि पंछी मेरे नजदीक आते जा रहे हैं। बस, कुछ देर में ही मेरे चारों ओर पक्षी ही पक्षी होंगे, मन अति मुदित था।

     तभी बेटी ने कमरे का दरवाजा भड़भड़ाया, ‘‘डैड! आपका फोन।'' मैंने चक्षु खोले। मेरे सेलफोन से कलरव गान गूंज रहा था। कदाचित, कल रात बिटिया रानी ने मेरे मोबाइल की रिंग-टोन बदल दी थी।
  
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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)
prabhashankarupadhyay@gmail.com

ऊँट भी खरगोश था

व्‍यंग्‍य - संग्रह

-प्रभाशंकर उपाध्‍याय

( पिछले अंक से जारी...)

जमानत पर छूटे विश्‍वगुरू की प्रेस काँफ्रेंस

    जमानत पर रिहा स्‍वामी प्रचंड प्रभुजी महाराज की प्रेस काफ्रेंस का आयोजन था। ऊंचे और भव्‍य आसन पर संतजी विराजे थे। पचासों चेले-चेलियां यत्र-तत्र चुलबुला रहे थे। सैंकड़ों उल्‍लासित भक्‍त, अनवरत जय जयकार से धरती-आसमां को थर्रा देने हेतु यत्‍नशील थे।

    मीडिया के कैमरे की जद में आने वाला एक सुनहरा बैनर, महाराज जी के ठीक पीछे टंगा हुआ था। और उस बैनर पर लिखा था-‘‘ श्री श्री 108, पूज्‍यपाद, प्रातः स्‍मरणीय, मठाधिपति, विश्‍वगुरू, स्‍वामी प्रचंड प्रभु जी महाराजधिराज․․․․․․․․․․।''

    सामने प्रेस की कुर्सियां थीं। वहां, इलेक्‍ट्रोनिक तथा प्रि्रंट मीडिया के हिन्‍दी और अंग्र्रेजी पत्रकारों का खासा हुजूम नजर आ रहा था। और वहां कुछ ‘एंगल-जर्नलिस्‍ट भी मौजूद थे।;आधुनिक पत्रकारिता की एक विधा को ‘एंगल-जर्नलिज्‍म‘ कहा जाता हैद्ध। मेरे बगल में बैठे एक 'एंगल-जर्नलिस्‍ट' ने बैनर की ओर इंगित करते हुए पूछा- ''इन बाबाओं के नाम के साथ 108 बार श्री शब्‍द क्‍यों लगाया जाता है, जानते हो?''

    मेरी जिज्ञासु दृष्‍टि को देखकर, ‘एंगल जर्नलिस्‍ट‘ बोला, 'श्री' के व्‍यापक तात्‍पर्य हैं, जैसे लक्ष्‍मी, सौंदर्य, शान-शौकत, प्रभा, कीर्ति तथा त्रिवर्ग अर्थात्‌ अर्थ, धर्म, काम इत्‍यादि। इनमें श्रीदेवी या भाग्‍यश्री का शुमार भी हो तो कहने ही क्‍या? दरअसल, आज के साधु- संतों की 'एग-मार्क ' हैं ये निधियां। ''

    भई वाह! क्‍या ‘एंगल‘ था उस ‘एंगल-जर्नलिस्‍ट‘ का ? बहरहाल, प्रेस काँफ्रेंस प्रारंभ हुई। उस काँफ्रेंस की रपट, जस की तस लिखी जा रही है। भविष्‍य में कोई खंडन प्राप्‍त हुआ तो उसे भी क्षमा याचना सहित प्रकाशित कर दिया जायेगा। काँफ्रेंस में संवाद में रहे पत्रकारों के सम्‍मुख संख्‍या लिखी गयीं हैं। चूंकि, अधिकांश उत्‍तर गुरूजी के शिष्‍यों- शिष्‍याओं ने दिये, अतः उनके आगे भी संख्‍या उल्‍लेख है। चुनांचे प्रस्‍तुत है, रपट-

    पत्रकार -1 '' स्‍वामीजी! सुना गया है कि आप माफी मांग कर जेल से छूटे हैं। हैरत है, इतने नामी और चमत्‍कारी संत को माफीनामा लिखना पड़ा। ''

    शिष्‍य -1 '' यह मीडिया की बकवास है। आप लोग तीन-चार माह से गुरूजी के विरूद्ध विष वमन कर रहे हैं। सच तो यह है कि पूज्‍यपाद के प्रताप के सम्‍मुख कानून किंकर्त्‍तव्‍यविमूढ हो गया था। ''

    पत्रकार - 2 '' आप सारा दोष मीडिया पर नहीं थोप सकते। मीडिया ने स्‍वामीजी द्वारा धौंस देने तथा हत्‍या करवाने के सबूत पेश किये हैं?''

    शिष्‍य -1 '' यह तो अच्‍छा है कि हमारे गुरूजी धमकाते ही हैं, श्राप नहीं देते, जैसा दुर्वासा ऋषि आये दिन दिया करते थे। 'श्राप' जन्‍म-जन्‍मातर तक पीछा करता है और उसका परिहार भी 'श्राप' देने वाले के पास ही होता है। रही हत्‍या की बात। साधु किसी का वध नहीं करते बल्‍कि भस्‍म कर देते हैं। हमारे गुरूजी भी हत्‍या क्‍यों करेंगे। जिसे चाहें भस्‍म कर दें और उसकी राख को गंगाजी में प्रवाहित कर दें। ''

    ''इस तरह सबूत भी नहीं रहे और मृतात्‍मा भी सीधी स्‍वर्ग में जाये। वस्‍तुतः श्राप देना और भस्‍म कर डालना, साधु -संतों का विशेषाधिकार है। इसे कानूनी सीमा में नहीं बांधा जा सकता। इसके अनेकानेक उदाहरण हैं, यथा-

    ''कपिल मुनि ने राजा सगर के सौ पुत्रों को भस्‍म कर डाला। क्‍या कपिल मुनि को गिरफ्‍तार किया गया ? ब्रम्‍हर्षि परशुराम ने इक्‍कीस बार क्षत्रिय वध किया, उनमें कितने ही राजा- महाराजा भी थे। क्‍या उन पर कोई मुकदमा चला? हमें तो शासकों को भी दण्‍ड देने का हक है। इन्‍द्र के पद पर पहुंचे, राजा नहुष को ऋषि अगस्‍त्‍य ने एक पल में पृथ्‍वी पर रेंगने वाला सर्प बना दिया था। ''

    पत्रकार - 3 '' आप लोग साधक हैं। अपने शरीर को भांति भांति के कष्‍ट देकर, तप करते हैं। कोई कठोर शीत में नंगे बदन रहता है तो कोई भीषण गर्मी में भी चारों ओर धूनी लगाकर समाधि में रमता है। लेकिन, जब पुलिस थोड़ी भी सख्‍ती बरतती है तो आप लोग इतनी जल्‍दी कैसे टूट जाते हैं। उस समय, आपका तप -बल और इच्‍छा- शक्‍ति कहां लुप्‍त हो जाती है?''

    काँफ्रेंस में कुछ क्षण के लिए खामोशी छा जाती है, तत्‍पश्‍चात्‌ चेला नं․ 1 बोलता है।
 
    शिष्‍य - 1 '' स्‍वामी जी की साधना पृथ्‍वी लोक के व्‍यवहारों के प्रतिरोध हेतु नहीं हैं, अपितु पूज्‍यपाद तो परम लक्ष्‍य के साधक हैं। ''

    पत्रकार - 3 '' वह परमलक्ष्‍य क्‍या है? सम्‍पत्‍ति, सुंदरी या सत्‍ता की नजदीकी? आज, स्‍वामियों के पास क्‍या नहीं है? अकूत संपत्‍ति। आधुनिक सुख- सुविधायुक्‍त आश्रम। एन․आर․आई․ चेले-चेलियां। सियासत और हालीवुड-वालीवुड की हस्‍तियों से ताल्‍लुकात। एक मेले में डेरा डाले एक साधु के कैम्‍प में आग लगने से, 20 लाख रूपये नष्‍ट हो गये और साधु ने रो रो कर बुरा हाल कर दिया। आखिर क्‍या है, आप लोगों का परम लक्ष्‍य ?''

    घनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए, प्रचंड प्रभु की अंगुलियां थम गयी थीं। वे पहली बार मुखरित हुए-
    प्रचंड प्रभु उवाच - ''रे शठ! क्‍या इन्‍हें हम संचित करते हैं? वे स्‍वयंमेव आती हैं और शताब्‍दियों से आ रही हैं। राजे- महाराजे, अपना आसन देकर हमारा पद- प्रक्षालन किया करते थे। अनेक राजाओं ने अपनी राजकुमारियां, तपस्‍वियों के साथ ब्‍याह दीं। महात्‍मा दीर्घतमा तो अंधे थे किन्‍तु उनके प्रताप से अभिभूत हुए राजा बलि ने अपनी रानियों को दीर्घतमा से पुत्र प्राप्‍ति हेतु भेज दिया था। ''

    आंग्‍ल पत्रकार - ‘‘ वेरीगुड विल यू गिव अस मोर एक्‍जॉम्‍पल?''
    विश्‍वगुरू की अंग्रेजी किंचित कमजोर थी, अतः उन्‍होंने इस हेतु एक अंग्रेजीदां शिष्‍या की सहायता ली। लिहाजा वह वार्ता प्रस्‍तुत है -
    शिष्‍या -'' राजा हरिशचन्‍द्रा डोनेटेड हिज स्‍टेट टू मुनि विश्‍वमिट्र एण्‍ड वेन्‍ट टू एब्रॉड विद हिज फैमिली। ''

    - ''इंटर कोर्स एक्‍टिविटीज बॉइ अ सेंट कांट बी क्‍लासिफाइड एज 'रेप', बिकॉज दैट, अप-लिफ्‍ट सोशियल स्‍टेट्‌स ऑव वीमन। व्‍हाइल द सेंट रिमेन्‍ड ऑनली सेंट। जस्‍ट लुक सम एक्‍जॉम्‍पल्‍स -‘‘द ऑकरेंस ऑव मुनि पाराशर, ए दीवर (धीवर ) गर्ल, गेव अस व्‍यासजी, हू वाज ए ब्रिलिएंट पुराण-रॉइटर। मेनका डिमोलिश्‍ड मेडीटेशन ऑव विश्‍वामिट्र्‌ एण्‍ड वी गोट ए ग्रेट इंडियन किंग, कॉल्‍ड बरत (भरत)। ममता वाज एन ऑर्डीनरी लेडी, बट विद कॉइशन ऑव डेवगुरू बिरस्‍पटि (देवगुरू बृहस्‍पतिद्ध शी हैड बिकम गुरू वॉइफ (गुरू पत्‍नी )।''

    अंग्रेजी पत्रकार -'बट दिस इज नॉट ए करेक्‍ट वे टू अपलिफ्‍ट  करेक्‍टर ऑफ साधुज। ''

    शिष्‍या (तैश से ) - ''व्‍हाई आर यू अगेंस्‍ट सनातन धर्मा? इन अघोर-तंत्रा, नो डिवोशन इज पॉसिबिल विद आउट वीमन। ए बौद्धिस्‍ट वाज अरेस्‍टेड, व्‍हेन ही वॉज बारगेनिंग विद, सम कॉल-गर्ल्‍स। वन टाइम चर्चस्‌ ऑव योरोप वर डीनोटेड एज फोर्ट ऑव एन्‍जायमेंट। एज वेल एज मुल्‍ला'ज एण्‍ड मौलवी'ज वर नॉट सेव्‍ड फ्रॉम वूमन। ''

    हिन्‍दी पत्रकार - '' महाराज जी! माना कि आप प्रचंड प्रतापी हैं। शासकों में आपकी पैठ है। तो ऐसे क्‍या कारण रहे कि एक महिला शासक ने आपको महीनों जेल में रखा और आपको, उसे महामाया महादेवी का अवतार कहना पड़ा?''

    प्रंचड प्रभु (प्रचंड क्रोध से फुंफकार कर ) -'' लंपट!  'यत्र नार्यस्‍तु पूज्‍यते, तत्र रमंति देवताः।' हमने नारी को देवी कहा तो देवता हमारी मदद को आ गये और जेल के द्वार खुल गये । हां, नारी की जगह पुरूष शासक होता तो हम, उसे अवश्‍य ही भस्‍म कर देते। तुझे भी छोड़ रहे हैं। और अब, ऐसे अनर्गल प्रश्‍न मत पूछना। ''

    यह कहकर प्रचंड प्रभु तत्‍क्षण ही प्रेस काँफ्रेंस से उठकर चल दिये। पीछे पीछे उनकी मंडली भी, जय․․․․․जय․․․․․ का घोष करती हुई, अनुगमन कर गई।

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काग के भाग बड़े

    आसमां की ओर इंगित कर, कवि विनोद पदरज ने कहा, ''सायं हुई और कौवे, कांव․․․․कांव․․․․ करते हुए सरकारी भवनों की ओर उड़ चले। ये, वहां के दरख्‍तों पर रैन बसेरा करेंगे। इन कागों को सरकारी प्रांगण क्‍यों रास आया? एक व्‍यंग्‍यकार के तईं कभी सोचा है तुमने?''

    उस दिन के बाद, सांझ होते ही घर की छत पर, नित्‍य चढता हूं क्‍योंकि छत से कार्यालयों का परिसर, भवनों का आंशिक भाग और वृक्ष नजर आते हैं। साथ ही आशियानों की ओर लौटते कौओं के झुंड दर झुंड भी उतरते हुए दीख पड़ते हैं। वहां, व्‍याप्‍त कांव․․․․कांव․․․की काकारूत भी यहां किंचित सुनाई देती है। ''

    व्‍यंग्‍यकार शरद जोशी ने कभी लिखा था कि बगुले, भैसों के पास क्‍यों जाते हैं? और अब कवि विनोद पदरज, विनोद पूर्वक पूछते हैं कि काक, सरकारी परिसर में ही रैन बसेरा क्‍यों करते हैं? आज, इस बिन्‍दु पर विचार किया तो पाया कि कागों के स्‍वभाव तथा क्रियाकलाप में आदमजाद सरीखी समरूपताएं समाहित हैं, नेता-गणों से तो यह रिश्‍ता काफी नजदीकी प्रतीत होता है।

    - चुनांचे, कैसे विलक्ष्‍ाण हैं काग-
    - जरूरत होने (श्राद्ध पक्ष और ऋषि पंचमी ) पर गलाफाड़ पुकार तथा मीठी मनुहार के उपरांत भी बड़े नाज-नखरे दर्शाता हुआ आता है और बीच बीच में परों को फड़फड़ाकर अथवा यत्र-तत्र, कुदक-फुदक कर उड़न छू हो जाने का आभास कराता रहता है।

    - खुद काला कलूटा और उदंड प्रवृति का है किन्‍तु खूबसूरतों तथा शरीफों के साथ छेड़छाड़ से बाज नहीं आता। सुंदर चिडि़याओं की पूंछ पकड़ लेता है। सीधी सादी गायों के कान खींच देता है। खाना पकाती गृहिणी के पास से रोटी ले भागेगा या नाश्‍ता करते बालक को भयाक्रांत कर टोस्‍ट ले उड़ेगा।

    - मान्‍यता है कि दो नयनों के बावजूद यह सबको एक आंख देखता है। दर असल, यह अपनी मुंडी इतनी अधिक बार घुमाता हैं कि इसके समदृष्‍टि होने का भ्रम पैदा हो गया है। किन्‍तु इतनी सर्तकता के बाद भी कलकंठी कोयल, इस छलिये को चतुरता से छल लेती है। वह अपने अंडे इसके घोंसले में रख देती है और यह धोखे से उन्‍हें 'से' देता है लिहाजा कागा मिठभाषी चाटुकारों के स्‍वार्थ को भांप नहीं पाता।

    - यह अपने बच्‍चों की देखभाल तो जतन पूर्वक करता है, लेकिन दूसरे के बच्‍चों को नहीं छोड़ता । यहां तक कि मुर्गीखानों से चूजे चुरा लेता है। लेकिन, पक्षी जब इसकी करतूतों से तंग आकर एकजुट हो जाते हैं, तब घिरे हुए कौवे की दयनीय दशा देखते ही बनती है।

    - काक का भावनाएं जताने का तरीका भी प्रभावशाली है। असंतोष, चेतावनी तथा क्रोध व्‍यक्‍त करने की कला में कौआ निष्‍णात है। मौका मिलने पर, यह अपनी जमात को एकत्र करने का बूता भी रखता है। और हवाबाज़ भी गज़7ब का होता है ऊपर-नीचे, दायें-बायें, आड़े-तिरछे कैसे भी उड़कर निकल लेता है। सुना है कि 'बाज' भी इसे पकड़ नहीं पाता।

    - जितनी गंदगी उतने काग। शाक हो या मांस, जिंदा हो या मुर्दा सबको हथियाकर, नोंचकर, मुंडी हिला-हिलाकर, उचक-मचक कर, मजे से हड़प करता है। इसे बदहजमी की कोई शिकायत नहीं होती ।

    - यह इतने कुकृत्‍य, धूर्तता, अनाचार के बावजूद सम्‍मान पाता है। वर्ष भर मुंडेरों से दुत्‍कारे जाने के बावजूद इसकी आव भगत करनी ही पड़ती है। डाक और दूरभाषिक युग से पूर्व प्रिय के आगमन के प्रति प्रतीक्षातुर विरहणी नायिका को काक की कर्कश वाणी भी मधुर प्रतीत होती थी और वह आल्‍हादित होकर, उसे पसंदीदा भोजन कराने अथवा उसकी चोंच सोने से मंढवा देने का वचन देती थी। तभी तो बड़भागी काक के बारे में 'रसखान' ने भी कहा - '' काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।'' और अब कवि संजय आचार्य लिखते हैं कि तोता, चिडि़या, मुर्गी छोड़ो, नया दौर है, कौव्‍वे पालो। ''

     कदाचित, इन्‍हीं खासियतों की वजह से अग्‍निपुराण में शासकों को कौवे की भांति चाक-चौबंद रहने की राय दी गई है।
 
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              व्‍यंग्‍य सर्वेः अगर तुम मिल जाओ․․․․․!


       फ्रांस का एक नगर है, वर्सेल्‌स और उस शहर में स्‍थित है, सत्रहवीं सदी के बने शाही महल। इन महलों में पेटिट ट्रिनान तो बेहद विख्‍यात है। लोकश्रुति है कि इस महल में घुसने पर कभी कभार भूतकाल के प्रत्‍यक्ष दर्शन हो जाते हैं। यहां सशरीर अतीत की सैर के अनेकानेक किस्‍से सुने गये हैं। इस तरह के तीन वाकियात प्रस्‍तुत हैं -

    10 अगस्‍त 1901 की बात है उस समय लंदन की दो महिलाओं शार्लोट और एलिना ने पेटिट ट्रिनान में प्रवेश किया। उनका सामना 18वीं शती की वेशभूषा पहने कुछ व्‍यक्‍तियों से हुआ। उनमें उस काल के स्‍त्री-पुरूष और बच्‍चे थे। उन्‍हें, उस समय की घोड़ा गाडि़याँ भी दिखाई दी थीं।

    सन्‌ 1928 में मिस क्‍लारा एवं ऐन लम्‍बार्ट को इस महल में तकरीबन सौ वर्ष पूर्व का लिबास पहने एक गायक दल दिखाई दिया। उस काल के वाद्य यंत्रों  पर वह दल एक पुरानी धुन बजा रहा था।

    अक्‍टूबर 1979 में फ्रांस के मांटेलबार के नजदीक एक प्राचीन होटल में सिम्‍पसन दम्‍पति ठहरे। रात का खाना खाया और दूसरी सुबह का नाश्‍ता किया। भोज्‍य सामग्री  प्राचीन पद्धति द्वारा बनायी हुई थी। भोजन बेहद लजीज और उसका बिल अत्‍यन्‍त सस्‍ता था।
सर्वे और परिणाम -
 
    अतीत को पुनः पाने और भावी जीवन की जिज्ञासा का एक अलग रोमांच है। अगर ऐसा मोबाइल-सेट बने और वह आपको भूत, भविष्‍य तथा वर्तमान कालों में मोबाइल कराने में समर्थ हो अर्थात्‌ सेट का एक बटन दबाएं तो सन्‍न से भूतकाल में जा पहुंचें। दूसरा दबाएं तो दन्‍न से भविष्‍य में छलांग लगा  जाएं और तीसरा दबाएं तो बैक-टू-पैवेलियन यानि वर्तमान में लौट आएं।

    इन तीनों काल में से आप किस काल में 'फील-गुड' करेंगे ?  एक व्‍यंग्‍य सर्वेक्षण के दौरान यह प्रश्‍न देश के हजारों स्‍त्री-पुरूषों से पूछा गया। सर्वे का परिणाम निम्‍नवत्‌ हैः-

    52 प्रतिशत ने भूतकाल को पसंद किया। ऐसी चाहना करने वालों में वालियां (नारियां) अधिक थीं, जो बासी कढी में उफान की माफिक युवावस्‍था की ओर लौट जाना चाहती थीं। 24 प्रतिशत लोगों ने भविष्‍य में जाने की आकांक्षा जतायी। ग्‍यारह प्रतिशत दो घोड़ों पर सवार रहे अर्थात्‌ उनकी पसंद भूत-भविष्‍य, भूत-वर्तमान अथवा भविष्‍य-वर्तमान थी। 9 प्रतिशत व्‍यक्‍ति त्रिकाल को अपनी मुट्‌टी में कैद करना चाहते थे। शेष 4 प्रतिशत ने तटस्‍थ भाव दर्शाया यानि उनकी पसंद वर्तमान थी।

रायशुमारी -
    सर्वे के दौरान एक सवाल और पूछा गया। प्रश्‍न था - ''यदि सशरीर सैर कराने वाले मोबाइल को आपके हाथ में दे दिया जाए। तो उसका उपयोग आप अपने किस कार्य के लिए करेंगे ?''
    इस सवाल के बड़े दिलचस्‍प जवाब मिले, उनमें से चुनिंदा पेश किये जा रहे हैं। लीजिये, लुत्‍फ उठाइये उन उत्‍तरों का -
 
    एक नौकर पेशा -''प्रत्‍येक माह के वेतन वितरण वाले दिन मे जाऊंगा तथा पूरी तनख्‍वाह प्राप्‍त कर, उधार वसूल करने वालों से बचता हुआ, छुट्‌टीवाले दिन में चला जाऊंगा।''

    एक सास - ''हुंह ․․․․․․․․․ यह दहेज दिया है, मुए लड़की वालों ने। ऊंट के मुंह में जीरा है, जीरा ․․․․․․․․․․․․․। मन कह रहा है कि फूंक ही डालूं ऐसी दरिद्रन को। लेकिन भाईसाहब ․․․․․․․․․․․․․․․․․क्‍या यह मोबाइल मुझे बता देगा कि मैं बाइज्‍जत बरी हो जाऊंगी ? मेरे बेटे की दूसरी शादी में कोई दिक्‍कत तो नहीं आयेगी? नयी बहू खूब सारा दहेज लेकर आयेगी․․․․ ना ․․․․․․?''

    चुनावी प्रत्‍याशी - महाराज! नमस्‍कार․․․प्रणाम․․․․․दण्‍डवत․․․․․। किधर है आपका मोबाइल ? जल्‍दी लाओ हुजूर ,चुनाव घोषित हो गये हैं। क्‍या, यह मोबाइल मुझे पार्टी का टिकट दिला देगा? मैं, पहले भविष्‍य में जाऊंगा और अपना चुनाव परिणाम देखूंगा। जीता तो वाह !, हारा तो वर्तमान में लौटकर, विरोधी से मोटी रकम ऐंठकर, नाम वापस ले लूंगा․․․ ही․․․․․ही․․․․․․ही․․․․․। ''

    राजस्‍थानी व्‍यापारी -‘‘ रे भाया! इक जमाणो हो जद रूपिया रा हवा हेर (सवा सेर ) घी मिलतो हो। थारे रिमोट रे आसरे तो म्‍है वणी जमाणा में ही जाणो चावूंगो। पाछे लिछमीजी री दया सूं लाखों रो माल खरीद लूंगो।  फेर भविष्‍य रा सबसूं महंगो काल में जाई, सबरो माल बेच दूंगो। अरबों- खरबों रो मुनाफो म्‍हारी अंटी में होवेलो․․․․․․․․हें․․․․․․․․․हें․․․․․․․․हें ․। ''

    एक गृहिणी - ․․․मैं तो आपके मोबाइल का पूरा उपयोग करके ही वापस करूंगी, भाई साहब! सच्‍ची बात तो ये है कि मेरी पड़ोसन कई दिनों से अपने पति के लिए एक स्‍वेटर बुन रही है। उसका डिजाइन मुझे पता नही लग रहा है। मैं, सबसे पहले मोबाइल का भविष्‍यवाला बटन दबाऊंगी और उस काल में चली जाऊंगी, जहां उसका पति स्‍वेटर पहनकर बाहर निकल रहा होगा, तब उसका डिजाइन नोट कर लूंगी। उसके बाद में भूतकाल में जाऊंगी और उसी डिजाइन का स्‍वेटर बना लूंगी। फिर वर्तमान में लौटकर पड़ोसन से भी पहले अपने पति को वैसा ही स्‍वेटर पहनाकर चक्‍कर में डाल दूंगी। सच्‍च ․․․․․․․․․․․․․․․․बहुत मजा आयेगा। ''

    एक कवि - '' कमाल की कल्‍पना है भगवन्‌! काल को कब्‍जे में करने वाला यंत्र अहा․․․․।

भई इसी तर्ज पर मेरी ताजा कविता हाजिर है -

‘ले जाए चाहे, भविष्‍य में या भूत में यंत्र।
एक कवि को चाहिए नोट, मंच और तंत्र॥
नोट, मंच ओ‘तंत्र, मिले श्रोता सुनने को।
जीवनभर का माल मिले, खाने भरने को॥
   हे मोबाइल महाराज! ले चलो मुझे वहां पर।
    परम सुंदरी एक कवयित्री भी हो जहां पर॥‘

    एक पत्‍नी - '' हाय ․․․․․हाय ․․․․․मेरे नसीब में ही बदा था, यह टटपूंजियां कलम घसीट पति! अरे इससे तो अच्‍छा था वह डॉक्‍टर जिसे मैंने इसलिए रिजेक्‍ट कर दिया था कि मैं इस साहित्‍यकार के प्‍यार में अंधी हो गई थी। हाय ․․․․․ अब क्‍या रूतबे हैं डॉक्‍टर साहब के ? दो-दो कोठियां और चार-चार कार हैं। गुर्दे चोरी के धंधे में करोड़ों कमाए हैं उसने। उसी कुँवारेपन की ओर वापस जाना चाहूंगी ताकि गलती सुधारने का एक मौका तो मिले। ''

    एक पति- '' बहुत दुखी हूं․․․ सर। मुझे वह मोबाइल अवश्‍य दीजिये। मेरी सास जब देखो तब यहां आ धमकती है और अपनी पुत्री की प्रशंसा के गीत गाकर मुझे बहुत बोर करती है। उसके उपदेशों से  मुझे एलर्जी हो गयी है। मैं इस सेलफोन से सासूजी के आने की सभी संभावित तिथियां डायरी में नोट कर लूंगा जी, फिर उन्‍हीं दिनों का ऑफिसियल-ट्‌यूर बना कर उड़न छू हो जाया करूंगा। ''

    एक स्‍टिंग पत्रकार - '' अब तक तो अफसरों- नेताओं के अतीत और वर्तमान के कारनामों की बखिया उधेड़ा करता था। अगर, रिमोट मिल जाये तो स्‍टिंग जर्नलिज्‍म का मजा ही आ जायेगा। भविष्‍य में घटित होने वाली घटनाओं के मस्‍त-मस्‍त ''स्‍कूप'' मिलेंगे। स्‍कैंडलों का भंडाफोड़ करती, सनसनी खेज कवर-स्‍टोरी बनेंगी। बन्‍धु, वह मोबाइल मुझे ही देना। ध्‍यान रखिये कहीं हमारा प्रतिद्वंदी चैनल न ले उड़े, उसे। ''

    छात्र- '' अरे ․․․․अंकल! भविष्‍य में जाने से क्‍या फायदा? नौकरी तो मिलेगी ही नहीं। बेरोजगारी पल्‍ले पड़ेगी। इतना पढ़ने के बाद भूतकाल में जाना भी बेकार है। अपन तो स्‍टूडेंट -लाइफ में तो मस्‍त हैं। और हमेशा इसी लाइफ में रहना चाहेंगे। ''

    एक खिलाड़ी - '' इस मोबाइल से हमारा खेल आर-पार का हो जायेगा। मैच की हार-जीत का पता पहले ही लगा लेंगे। जीते तो पौ बारह! हारे तो बुकिज से हाथ मिलाकर पहले ही मैच फिक्‍सिंग कर लेंगे। ''

    रिमिक्‍स सिंगर - '' ओए अपनी तो बल्‍ले․․बल्‍ले ․․․ हो जाएगी․․․उ․․․उ․․․ रू․․․रू․․। अब आयेगा, स्‍टेज प्रोग्राम के साथ कबूतर उड़ाने का․․․मजा। ब्रदर आप हमें मोबाइल देंगे तो हम आपके एक दो कबूतर फ्री उड़ा देंगे। ''

 


वाह! चाय

    चाय भी अजब शै है। यह, इंसान को प्रारम्‍भ से ही अपना रक़ीक़  बना देती है। यकीन न हो तो, एक बालक के सम्‍मुख, चाय तथा दूध का प्‍याला, संग संग रखकर देखो । वह बालक चाय के प्‍याले की ओर ही लपकेगा। उसके हाथ में चाय का प्‍याला थमाइए और देखिए कि वह कितने मजे से सुड़कता है। यूं भी चाय, विश्‍व में पानी के बाद सर्वाधिक पिया जाने वाला पेय पदार्थ एक सर्वे द्वारा सिद्ध हो गया है।

    चुनांचे, चाय की खोज को दुनिया के महानतम आविष्‍कार का दर्जा दिया जाना चाहिए। उसके जनक योगीराज 'धर्म' को धन्‍यवाद देना होगा। यदि साधना के दौरान उन्‍हें नींद न आती और मारे क्रोध के उन्‍होंने अपनी पलकें काटकर जमीन पर नहीं फेंकी होतीं तो, ठेंगा पीते आप चाय। कहा जाता है कि साधक 'धर्म' की उन्‍हीं पपोटों से पैदा हुआ था चाय का पौधा । ऐसा पौधा, जो आज असंख्‍य उनींदी पलकों की नींद उड़ाए दे रहा है। बिना चाय के बिस्‍तर नहीं त्‍यागते भाई लोग।

    गर चाय नहीं होती तो, बीवी बेड-टी कैसे पेश करती? इसी बूते पर, वह आपको जगाती है, 'उठिए जी, चाय तैयार है।' गरज यह कि चाय न होती तो आप उस सुरीले स्‍वर को तरस जाते, जनाब। दिन भर के किच-किच भरे माहौल में, एक वही वाक्‍य तो आनन्‍दमय है।

    लिहाजा, चाय की चाह किसे नहीं है? यह अमीर-गरीब सभी तबकों में समान रूप से प्रिय है। गृहस्‍थों को तो लुभाती ही है, साथ ही संन्‍यासियों को भी मोहती है। नतीजन, जीवन में चाय की पैठ काफी गहरी है। कहावत है कि झूठ बोलने और चाय पीने का कोई समय नहीं होता ।

    सत्रहवीं सदी में 'वालर' ने चाय की अनुशंसा में एक कविता लिख मारी थी। उन्‍होंने चाय को पादप जगत की महारानी का खिताब अता किया था। उस जमाने में चाय को पिया नहीं, बल्‍कि चाबाया जाता था। इसकी उबली पत्‍तियों को नमक  तथा मक्‍खन मिलाकर खाया जाता था।

    अरे वाह! चाय की पत्‍तियों के सेवन की बात पर याद आ गया, बाड़मेर का एक गधा। चाय- वाले द्वारा फेंकी गई पत्‍तियों को खाकर इतना आदी हो गया था कि बिना उन्‍हें खाए, उसका मूड बोझा ढोने का बनता नहीं था।

    लिहाजा अब, नौकर- पेशाओं को ही लीजिए। अधिकांश का काम करने का मूड बगैर चाय के बनेगा ही नहीं। दस बजे दफ्‍तर में घुसे। हाजिरी दर्ज की और  लपक लिए कैंटीन की ओर।  आधा-पौना घंटा वहां बैठकर, इधर-उधर की करेंगे।

    चाय की गर्मागर्म चुस्‍कियों के संग बाबू लोग, बॉस की निंदा का रस भी सेवन करेंगे। कुछ शेयर-बाजार की,  कुछ राजनीतिक माहौल की चर्चा करेंगे। देश के रसातल की ओर जाने का गम सभी को सालेगा। कभी बेवजह ठहाके लगाए जाएंगे।

    उधर, चतुर बॉस, घोंचू से दिखने वाले, कैंटीन के छोकरे को पांच रूपया थमाकर सारी खबर ले लेगा किस- किसने उसके खिलाफ जहर उगला।

    अतः प्रत्‍येक ऑफिस के पास चाय का खोखा होना परमावश्‍यक हो गया है। किसी कार्यालय का भवन बाद में बनेगा। नींव डलते ही, चायवाला वहां पहले स्‍थापित हो जाएगा। आखिर, इमारत बनाने वालों को भी तो चाय चाहिए।

    ऑफिस में आनेवाला समझदार आगंतुक, सर्वप्रथम चाय की दुकान पर जाकर चाय पहुंचाने का आदेश देता है, तत्‍पश्‍चात्‌ दफ्‍तर में दाखिल होता है। ऐसे सज्‍जन का काम कौन नहीं करेगा? गोया, चाय सरीखा सुलभ, सस्‍ता और प्रभावशाली सुविधा-शुल्‍क दूसरा नहीं है।

    आपकी किचन के एक कोने में बेपरवाह पड़ी रहने वाली चाय की ताकत का गुमान आपको नहीं होगा। हद से हद चाय के प्‍याले में तूफान आने का अंदाज लगा सकेंगे। इससे अधिक अनुमान तो अमरीकावासियों को भी नहीं था। यदि चाय नहीं होती तो अमरीका पता नहीं कितने वर्ष गुलामी में, और काटता? ब्रितानी सरकार ने चाय पर कर लगाया, आक्रोश स्‍वरूप अमरीकियों में आजादी के अंकुर फूटे।

    चाय का प्‍याला सुड़कते सुड़कते, शोधकर्ताओं ने चाय में 127 तत्‍व खोज निकाले। उनके अनुसार चाय, हृदयरोग, मोतियाबिन्‍द, खाज-खुजली और कैंसर से बचाव करती है। चीनी डाक्‍टरों ने इसमें विटामिन्‍स तक ढूंढ लिये। एक चीनी कवि ने चाय की महिमा का गुणगान कुछ इस प्रकार किया है -''इसका पहला प्‍याला मेरे गले को तरावट से भरता है, दूसरा तन्‍हाई को खत्‍म करता है। तीसरा पीने के बाद आत्‍मा का अहसास होता है, चौथे प्‍याले से मेरे दुख समाप्‍त हो जाते हैं। चाय का छठा प्‍याला पीते ही, मैं अमरता के बारे में सोचने लगता हूं और सातवां प्‍याला पीने के पश्‍चात्‌ ताजी हवाओं के झोंके मेरे तन-बदन को सुकून पहुंचाते हैं।''
    
    देर क्‍यों? गुरू, हो जाओ शुरू।

--

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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