रविवार, 11 सितंबर 2011

आलोक कुमार सातपुते की 5 लघुकथाएँ

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1 रामराज्य

‘‘हमारे यहाँ औरत मज़ाक की वस्तु है। उसे जब चाहो उपभोग करो, और जब चाहो, लांछन लगाकर घर से निकाल बाहर करो ।’’...और साले दलितों-मलेच्छों की तो ख़ैर नहीं । कोई साला हूं का चूँ नहीं कर सकता हमारे यहाँ...।
तो सीधे-सीधे कहो न कि आपके यहाँ रामराज्य है ।

2 मेरा भारत महान् -2

‘‘मालूम है कि सल्तनत और मुग़लकाल में मुसलमानों ने हिन्दुओं पर भारी अत्याचार किये हैं । तलवार की नोंक पर धर्म परिवर्तन कराये गये । और न जाने क्या-क्या किया गया हिन्दुओं के साथ...।’’
‘अच्छा ! तुम्हें कैसे पता चला...?’
‘‘अजी मैंने विश्वप्रसिद्ध इतिहासकारों की पुस्तकें पढ़ी हैं ।’’
‘...तो फिर तुमने उन्हीं पुस्तकों में यह भी पढ़ा होगा कि, आर्य आक्रमणकारी थे, और वैदिक काल में गोमांस खाया जाता था।’
‘‘मुआफ़ कीजिये...मैंने उन इतिहासकारों द्वारा मध्यकालीन भारत के इतिहास पर लिखी पुस्तकें ही पढ़ीं हैं’।’

3 सार्थक चर्चा

रेलवे प्लेटफार्म में एक सीट पर दो अपरिचित व्यक्ति बैठे हुए हैं । टेªन आने में कुछ समय है । उनके बीच औपचारिक बातचीत का सिलसिला प्रारंभ होता है।
पहला - आप कहाँ सर्विस करते हैं ?
दूसरा - जी मंत्रालय में...शिक्षा मंत्री के यहाँ ।
पहला - अरे वाह ! आप तो बडे़ काम के आदमी हैं। मै शासकीय काॅलेज़ में हिन्दी विभाग का अध्यक्ष हूं...रमाकांत (दुबे गर्व से)
दूसरा - जी मै मंत्रालय में निहायत ही मामूली पद पर हूं। मेरी पहचान एक लेखक के रुप में ही अधिक है।
पहला - किस तरह का लेखन करते हैं आप ? मतलब किस वाद से या विचारधारा से जुडे हुए हैं ?
दुसरा - जी मैं सार्थक लेखन में यकीन करता हूं ।
पहला - मैं भी सार्थक चर्चा में यक़ीन करता हूं । वैसे आपका नाम क्या है ?
दूसरा - जी अशोक ।
पहला - अशोक और आगे ?
दूसरा - अशोक घोरपडे़ ।
पहला - क्या गिर पडे़ ?
दूसरा - जी नहीं , घोरपडे़, जी.एच.ओ.आर....
पहला - अच्छा-अच्छा ठीक है । वैसे आप हैं कहाँ से ?
दूसरा - जी महाराष्ट्र से।
पहला - महाराष्ट्र में तो कई जातियाँ होती हैं...आप ?
दूसरा - मेरी जाति का नाम आपकी समझ में नहीं आयेगा।
पहला - ख़ैर, कोई बात नहीं...आप एस.सी./एस.टी./ओ.बी.सी./ या अन्य, किस में आते हैं ?
दूसरा - जी एस.सी. में ।
पहला (व्यंग्य से)- अच्छा तो आप एस.सी.में आते है...।
(इतने में ट्रेन आ जाती है )
पहला (चलते-चलते)- अच्छी सार्थक चर्चा हुई हमारे बीच। वैसे मंत्रालय में जब भी सेटिंग की ज़रुरत पडे़गी, मैं आपको कष्ट दूंगा।

4 वेताल फिर डाल पर...

सदा की भाँति वेताल ने विक्रम को कहानी सुनाना प्रारंभ किया । आर्यवर्त नामक देश के प्रधानमंत्री के मंत्रिमण्डल में एक मंत्री थे। चुनाव समीप ही थे, कि उनकी सुपुत्री एक हरिजन लड़के के साथ भाग गई। मंत्री महोदय ने अपने पाले हुओं को उन्हे जल्द से जल्द ढूंढ लाने का आदेश दिया। दुम हिलाने की होड़ में लगे उनके पाले हुओं ने एक सप्ताह के भीतर ही उन दोनों को मंत्री महोदय के समक्ष उपस्थित कर दिया। यह पता चलने पर कि दोनों ने ‘कोर्ट’ नामक संस्था में जाकर पंजीकृत विवाह कर लिया है, मंत्री महोदय ने उन्हें पुचकारते हुये कहा-‘तुम लोगों को भला भागने की क्या आवश्यकता थी ? मैं तो तुम दोनों का ब्याह बड़ी ही धूमधाम से करा देता। ख़ैर, अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। मैं तुम दोनों का एक बार फिर से विवाह करूँगा।
चुनाव के कुछ दिनों पूर्व की तिथि निर्धारित कर उन दोनों का विवाह संपन्न कराया गया। मंत्री महोदय के निर्देश पर समधी-भेंट के एक-एक क्षण को ‘कैमरे’ नामक वस्तु में क़ैद किया गया। विवाह संपन्न होते ही मंत्री महोदय अपने स्नानागार की ओर चल पड़े।
वेताल ने कहानी सुनाने के बाद कहा राजन ! इस बार तुम्हें तीन प्रश्नों के उत्तर देने हंै । पहला प्रश्न ये कि कोर्ट नामक संस्था में पंजीकृत विवाह हो जाने के उपरांत भी मंत्री महोदय ने उनका दुबारा विवाह क्यों कराया ? दूसरा प्रश्न समधी-भेंट के एक-एक क्षण को ‘कैमरे’ में क़ैद कराने का क्या औचित्य था ? एवम् तीसरा प्रश्न-विवाह संपन्न होते ही मंत्री महोदय स्नानागार की ओर क्यों चल दिये ? इन प्रश्नों के उत्तर जानकर भी न दोगे, तो तुम्हारे सर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगें।
वेताल, मंत्री महोदय ने समझ लिया था कि चूंकि दोनों ने कोर्ट नामक संस्था में पंजीकृत विवाह कर लिया है, अतः वे उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते हैं। चूँकि चुनाव समीप थे, अतः उन्होने इस घटना से राजनैतिक फ़ायदा उठाने की सोची, और अस्पृश्यता हटाने की दिशा में हीरो के रुप में प्रचारित होने के लिये उन्होने उनका दुबारा विवाह कराया । चँूकि प्रचार-प्रसार हेतु समधी-भेंट के चित्र प्रमुख तत्व थे, अतः उन्होंने समधी-भेंट के एक-एक क्षण को कैमरे में क़ैद कराया, और रहा आख़री प्रश्न तो, मैं आर्यवर्त के लोगों से भली-भाँति परिचित हूँ। बाहर से वे कितने भी प्रगतिवादी बनें, पर उनके मस्तिष्क में जाति और सम्प्रदायवाद का कचरा भरा ही रहता है। इसी कारण मंत्री महोदय अपने हरिजन समधी से छुआ जाने की घटना से उबरने के लिये स्नानागार की ओर चल पड़े। विक्रम ने उत्तर दिया।
बिलकुल ठीक विक्रम! पर तू बोला, इसलिये मुझे जाना ही पडे़गा, कहकर वेताल फिर डाल पर जा लटका।

5 सवर्ण

वह एक दलित प्रोफेसर रहा है। आजकल रिटायर्ड है और शौकिया तौर पर समाजसेवा करता है। उसने अपनी काम वाली बाई के खाने का बर्तन अलग रखा है। गली झाड़ने वाले मेहतर के लिये चाय का फूटा हुआ कप अलग से रखा है। वह दलितों मे सवर्ण है। सारे दलित उसे प्रणाम करते हैं।

6 राख -1


उस सरकारी कार्यालय में गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है। झण्डा-वन्दन हो चुका है। सब लोग प्रफुल्लित हैं। हँसी-मज़ाक कर रहे हैं। जल्द ही लड्डू बाँटे जाने हैं। लड्डू खरीदने की ज़िम्मेदारी एक बांभन को सौंपी गयी है। ये बांभन, चपरासी से प्रमोट होकर क्लर्क बना है। अधिकारियों के घरों में कथा बंाचने के कारण उसे आउट ऑफ टर्न प्रमोशन दिया गया है।
बांभन महाराज लड्डू का डिब्बा उठाये सबके सामने जा रहे हैं, और कह रहे हैं-लीजिये अपने हाथ से लड्डू उठाइये। मेरे पास पंहुचकर वह अपने हाथ से लड्डू उठाकर देता है। ऐसा ही वह मेरे बाजू में खडे एक चमार कर्मचारी को भी हाथ से उठाकर देने लगता है। इसपर वह चमार कर्मचारी अड़ जाता है कि वह डिब्बे में ही हाथ डालकर लड्डू उठायेगा। वह बांभन भी अड़ जाता है। चमार अब बांभन को मां-बहन की गाली देने लगता है। कार्यालय के बॉस, अनुसूचित जाति के दूसरे कर्मचारियों से कह रहे हैं कि बात न बढ़ायी जाये, और उस चमार कर्मचारी को समझाया जाये कि इस बात को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाये।
इसके बाद सभी अनुसूचित जाति के कर्मचारी उस चमार को समझा-बुझाकर शांत कर देते हैं, और समानता-भाईचारा आदि शब्दों की बयानबाजी के साथ गणतंत्र दिवस मना लिया जाता है।
...यह एक ऐसी राख है, जो अन्दर ही अन्दर सुलग़ रही है।

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Alok Kumar Satpute
laghukathakranti.blogspot.com
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(चित्र - अमरेन्द्र, फतुहा, पटना की कलाकृति)

4 blogger-facebook:

  1. कथाऐं दिलचस्प हैं...............आसपास के परिवेश को व्यक्त तो करती हैं पर थोड़ा भावातिरेक है। जिस आसानी से आपने चमार, मलेच्छ और बाभन शब्दों का इस्तेमाल कर लिया है......शायद कोई सवर्ण लेखक ऐसा करने से हिचकता.....आपको नहीं लगता कि सांविधानिक समानता के दौर में आपको इस बात का लाभ है कि ऐसे शब्दों को बिना किसी दबाव या सावधानी के इस्तेमाल कर सकते हैं? फिर भी रचनाऐं बांधतीं हैं.....बधाई

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  2. Praveen6:40 pm

    मुझे नहीं पता की आप मुझसे किस हद तक सहमत होंगे लेकिन मेरा मानना है की जातिगत भेदभाव की भावना वर्तमान में तथाकथित सामान्य जातियों से अधिक आरक्षित वर्ग की जातियों में अधिक है जो जातिगत वैमनस्य को बढ़ावा दे रही है l मुझे आपकी कोई भी कहानी पसंद नहीं आई क्योकि ये सिक्के के एक ही पहलु को उजागर कर रही है l आजकल तथाकथित सामान्य जातियों को कोसना फैशन बन गया है l यह ठीक वेसे ही है जैसे छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी हिन्दू धर्म को कोसते है l में किसी को क्लीन चिट नहीं दे रहा हूँ लेकिन आज के परिद्रश्य में तथाकथित सामान्य जातियों के लिए कोई कुछ भी लिख सकता है और शायद इसके लिए पुरष्कृत भी हो जाये, लेकिन अगर कोई इसके उलट किसी तथाकथित पिछाड़ी जाति के बारे में लिख दे तो उसे निश्चित रूप से जेल में जाना पड़ेगा l

    उत्तर देंहटाएं

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