सोमवार, 12 सितंबर 2011

सत्यप्रसन्न की लघुकथा - छिहत्तर नंबर

वृद्धा को थाने की वो आठ सीढ़ियाँ हिमालय की चढाई से कम नहीं लग रही थीं। दारोगा जी के सामने पहुँचने तक वो बुरी तरह हाँफ रही थी। सीधा खड़ा होना भी उसके लिये मुहाल था। बडी मुश्किल से उसके मुँह से बोल फूटे-" हुज़ूर! मेरा बेटा पिछले एक हफ्ते से घर नहीं लौटा है। काम की तलाश में निकला था, पिछले बुधवार को।"

"क्या नाम है तेरे छोरे का?" निरपेक्ष भाव से पूछा दारोगा ने।

"अमर है हुजूर उसका नाम। 24 साल का है। नीली कमीज और सलेटी रंग की पैंट पहने है। गेंहुँआ रंग है। माथे पर दायीं ओर एक चोट का निशान है। मेरा एक ही बेटा है माई-बाप। उसके सिवा मेरा और कोई नहीं है दुनिया में।"

वृद्धा के प्राण कंठ में आ गये थे इतना कहते-कहते। परन्तु जानती थी, दारोगा बिना तफ़सील पूछे मानेगा नहीं।

हुलिया सुनते ही दारोगा ने अपनी बाँयी ओर बैठे हवलदार भैरोसिंह की तरफ देखा। अपनी दारोगाई काबिलियत की जीत की खुशी उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी।

खल्वाट सिर पर हाथ फेरते हुये बोला-" मैं ना कहता था भैरोंसिंह कि उस 76 नंबर का भी कोई ना कोई दावेदार जरूर आवेगा। देख ये बुढ़िया आ गयी है। ले कर जा इसे 76 नंबर के पास।"

भैरोंसिंह वृद्धा को एक बडे से हाल में लेकर गया। वहाँ तख़्त पर सिर से पाँव तक सफेद चादर ओढ़े कोई लेटा था। भैरोसिंह ने चादर हटाई। तख़्त पर वृद्धा का बेटा पड़ा था, गोलियों से छलनी बना हुआ। एक हफ़्ते पहले फ़र्जी एन्काउन्टर में मारा गया था बेचारा। लाश देखते ही वृद्धा जोर से चीखी और गिर पडी लाश के ऊपर फिर कभी न उठने के लिये। " लो स्साला! एक की बजाए अब दो-दो के कफ़न- दफ़न का इंतजाम करना पडेगा, फ़िज़ूल में।" भुनभुनाया भैरोसिंह।

"सत्यप्रसन्न" raos58@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. हमारे यहां की पुलिस और नक्सलियों में थोड़ा ही अन्तर है.

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  2. सुन्दर रचना आपकी, नए नए आयाम |
    देत बधाई प्रेम से, प्रस्तुति हो अविराम ||

    उत्तर देंहटाएं

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