यशवंत कोठारी का व्यंग्य - लाशों पर उगे प्रश्न


शायर का कलम है कि मेरे कातिल हैं मेरी लाश पर रोने वाले, आज यह मिसरा क्योंकर याद आ रहा है ? कारण साफ है मित्रों चारों तरफ लोग मर रहे हैं सरकार मुआवजा दे रही है, सरकार का प्रमुख काम मुआवजा देना हो गया है, वैसे सरकार को इसमें भी फायदा ही है क्योंकि मुआवजा बांट देने से ही सरकार की खाल बच जाती है .वो किसानों को भी मुआवजा देती है, वो बम से मरने वालों को भी देती है, जांचें चलती रहती है, मुआवजा बंटता रहता है, सरकार चलती रहती है . सरकार को भला और क्या चाहिए.

लेकिन लाशों के ऊपर कई प्रश्न उग आते हैं .ये प्रश्न हर एक से जवाब मांगते हैं, मगर कोई जवाब नहीं देता, जिस का बेटा गया वो जवाब चाहती है जिस बेवा का शौहर गया वो जवाब चाहती है लेकिन सरकार व्यवस्था के पास इस का कोई जवाब नहीं है, सरकार केवल मुआवजा बाँटने वाली दुकान बन कर रह गई है जनता को मुआवजा नहीं अपने प्रश्नों के जवाब चाहिये, लेकिन व्यवस्था चुपचाप हंस क़र चेक देने की प्रक्रिया शुरू क़र देती है, इस प्रक्रिया में भी सरकार का फायदा है, एक सरकारी कारिंदे ने मुआवजा मांगने वाले से सत्रह प्रमाण पत्र मांगे, वो गरीब इन प्रमाण पत्रों के मायाजाल में ऐसा फंसा की भोलाराम का जीव बन क़र रह गया.


आतंकवाद के हमले बार बार क्यों होते हैं, सरकारी तंत्र क्या करता है ? केंद्र राज्य को दोष देता है और राज्य केंद्र को .. यह मिळत की नूर कुश्ती कब तक चलेंगे, इस प्रश्न का जवाब कौन और कब देगा.


इमानदार प्रश्नों के बेईमान उत्तर कब तक मिलते रहेंगे? कब तक मासूम, निर्दोष लाशें मुआवजा मांगती रहेगी. लोग मरते कराहते हैं, मगर सरकार को कोई फर्क क्यों नहीं पड़ रहा. मन में प्रवेश की जगह ही नहीं मिलती है. प्रश्नों से भरा चित्त उद्विग्न हो जाता है, जवाब की वास्तविक तलाश हो तो वह हमारे मन के भीतर से ही मिल सकता है कोई दूसरा जवाब दे भी नहीं सकता है. मरे हुए आदमी को कौन पूछता है इस देश में जिन्दा आदमी भी केवल एक वोट है जो पांच साल में एक बार काम आता है बस बाकी वो मरे या जिए क्या फरक पड़ता है .हर तरफ हर समय कोई न कोई मरता ही रहता है किस किस की चिंता करें ?प्रश्न बहुत हों तो जवाब की चिंता करें..


इस देश में लोग प्रश्न बहुत करते हैं. कुछ भी नया उनके लिए बड़ा अजूबा लगता है. यहाँ अभी तक यह कथन प्रचलित है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे. प्रश्नों से ही प्रतिप्रश्न बनजाते हैं प्रति प्रश्नों से पहेली बन जाती है लाशें चीखती रहती है मरे हुए लोग जांदे उठा लेते हैं . लाशें राजघाट पर जमा होकर जनपथ पर आ जाती हैं लाशें प्रश्नों के साथ राज पथ पर आकर नारे लगाने लग जाती है लाशों पर ऊगे प्रश्न बार बार हवा में उछलने लग जाते हैं . लाशों को कफ़न या मुआवजे से ढंकने से कुछ नहीं होने वाला है, किसानों को आत्महत्या के प्रश्नों का जवाब चाहिये, बम से बनी लाशों को जवाब चाहिए, प्रश्नों के इस जंगले में सब जवाब मांगते घूम रहे हैं, शायर फिर याद आ रहा है --मेरे कातिल हैं मेरी लाश पर रोनेवाले.. आप क्या सोचते हैं ?

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यशवंत कोठारी, ८६,लक्ष्मी नगर,ब्रह्मपुरी बाहर,जयपुर -मो.-9414461207

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3 टिप्पणियाँ "यशवंत कोठारी का व्यंग्य - लाशों पर उगे प्रश्न"

  1. राजनीति बडी खराब हो गयी है।

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  2. मैं तो कहता हूं कि सरकार हर घर में एक अनडेटेड चेक भिजवा दे. और रेट फिक्स कर दे. दुर्घटना में इतने, प्राकृतिक आपदा में इतने, बम धमाके में इतने...

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  3. bilkul sahi kaha , " mere katil hi meri lassh pe rone wale hai"

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