हिमकर श्याम की कविता - मंदी

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खत्म हुआ वह दौर

जो था मनभावन

अर्थतंत्र हुआ बेजार

थम गयी रूला कर

यायावर पूंजी की

अतिरंजित रफ्तार

कैपिटलिस्ट चितेरों

की तिलस्मी उड़ानें

 

शेयरों की पगुराहट

संसेक्स की जादूगरी

कितनी ही कश्तियाँ

डूबा गयीं बरसाती

नदी की उफानें

 

छा गये संसेक्स पर

मंदी के बादल घनेरे

रोटियों पर तलवारें

फटी-फटी हैं आांखें

 

भूखा कितनों का पेट

डूबेंगे कितने अरबपति

लुटेंगे कितने पूंजीपति

टूटेगी बाजारी मदहोशी।

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हिमकर श्याम

, टैगोर हिल रोड

मोराबादी, रांचीः ८

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चित्र - अमरेन्द्र, फतुहा, पटना की कलाकृति

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2 टिप्पणियाँ "हिमकर श्याम की कविता - मंदी"

  1. श्याम जी ,
    मन में सामाजिक व्यवस्था के प्रति व्यथा की अभिव्यक्ति सुन्दर है,
    अगर हो सके तो रांची में कुछ लोगों का समूह बने जो कुछ प्रासंगिक विषयों पर चर्चा कर सके..

    रवि प्रताप शाही
    डोरंडा , रांची ..९४३१११४३४५

    उत्तर देंहटाएं
  2. रवि प्रताप जी,
    नेक विचार है. ऐसा कोई मंच होना ही चाहिए.
    प्रतिक्रिया के लिए आभार.

    उत्तर देंहटाएं

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