शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

नज़ीर अकबराबादी की हास्य कविता - पैसे की फ़िलासफ़ी

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पैसे की फ़िलासफ़ी


पैसे ही का अमीर के दिल में खयाल है
पैसे ही का फ़कीर भी करता सवाल है

पैसा ही फौज पैसा ही जाहो जलाल है
पैसे ही का तमाम ये तंगो दवाल है

पैसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है
पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है

पैसा जो होवे पास तो कुन्दन के हैं डले
पैसे बगैर मिट्टी के उस से डले भले

पैसे से चुन्नी लाख की इक लाल दे के ले
पैसा न हो तो कौड़ी को मोती कोई न ले

पैसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है
पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है

पैसा जो हो तो देव की गर्दन को बाँध लाए
पैसा न हो तो मकड़ी के जाले से खौफ खाए

पैसे से लाला भैया जी और चौधरी कहाए
बिन पैसे साहूकार भी इक चोर-सा दिखाए

पसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है
पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है

पैसा ही जस दिलाता है इन्साँ के हात को
पैसा ही जेब देता है ब्याह और बरात को

भाई सगा भी आन के पूछे न बात को
बिन पैसे यारो दूल्हा बने आधी रात को

पैसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है
पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है

पैसे ने जिस मकाँ में बिछाया है अपना जाल
फंसते हैं उस मकां में फरिश्तों के पर ओ बाल

पैसे के आगे क्या है ये महबूब खुश जमाल
पैसा परी को लाए परिस्तान से निकाल

पैसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है
पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है

दुनिया में दीनदार कहाना भी नाम है
पैसा जहाँ के बीच वो कायम मुकाम है

पैसा ही जिस्मोजान है पैसा ही काम है
पैसे ही का नजीर ये आदम गुलाम है

पैसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है
पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है
-----.

(चित्र - अमरेन्द्र, फतुहा, पटना की कलाकृति)

2 blogger-facebook:

  1. बहुत बढ़िया, वाकई पैसे का ही कमाल है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. नज़ीर साब से पहले भी और उनके बाद भी पैसे का ही खेल चल रहा है। बहुत अच्छी रचना प्रस्तुत की आपने।

    उत्तर देंहटाएं

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