शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

नन्दलाल भारती की कविताएँ

वर दे दे....

याद है बचपन के वो सूनी आंखों सपने

मां-बाप की आंखों के खाली पन्‍ने ।

क्‍या खता थी तूने नफरत किये,विष बीज बोये

नाम - काम तेरा विजय

तूने दीन के सपनों को मौत दिये ।

क्‍या माफ करेंगे रिसते आंसू

किया-कराया कत्‍ल कल का

तुझको क्‍या सजा दूं ।

 

खैर मैं सजा क्‍या दूंगा......परवर निगार देगा

मेरी बद्‌दुआ तूझे बस इतनी वक्‍त ना माफ करेगा ।

तेरे भेद ने बदनसीब बना दिया मुझे

मेरे कल की अर्थी मेरे कंधों पर डाल दिया तूने ।

क्‍या दीन-दरिद्र या चौथे दर्जे का होना कसूर था,

पेट में भूख आंखों में सपने,लेकर जीना कसूर था ।

 

गुनाहगार तू जन्‍मजन्‍मान्‍तर का रहेगा

वक्‍त ना माफ करेगा

कातिल है तू बूढी आखों के सपनों का

तूने ऐसी चाल चली अमानुष ना बना पाया

खुली आंखों के सपनों को अपना ।

जाम टकराया बदनाम कर सपनों का खून किया

अरे अमानुष कैसी सजा, तूने बेगुनाह को दिया ।

 

क्‍या हाशिये के आदमी को हक नही

पूरी आंख सपने देखो और तरक्‍की करे

सब हक तुम्‍हें अमानुष नफरत में बौराये

शोषित के तालीम और योग्‍यता का वध कर दे ।

हम क्‍या थूकेंगे दुनिया थूक रही

वो भी थूक रहे जो तेरे संग जाम टकराये थे

मरे सपनों का मोल यही प्रभु

मेहनतकश हाशिये के आदमी को तरक्‍की का वर दे ।

 

आंखों बरसे जीवन भर अमानुष विजय के नाम

हक छिनने,दमन करने वाले की ,

तेरे विधान में पुर्नजन्‍म है तो

अमानुष को जन्‍मजन्‍मान्‍तर सूकर कर दे

हे विधाता ऐसा वर दे दे....................

 

 

मैं हारता चला गया

मैं हारता चला गया

चला राह ईमान,फर्ज सेवा काम की

तबाह होती गयी मंजिलें

उम्‍मीदों का खून होता चला गया

मैं हारता चला गया..................

 

हार के बाद जीत की नइर् आशा

लहूलुहान संभलता चला गया

नया जोश नई उमंगें

घाव सहलाता चला गया

मैं हारता चला गया..................

 

हार के बाद जीत की आशा

रूठ- लूट सी गयी

योग्‍यता बेबस लगने लगी

रिसते घाव पर सन्‍तोष का

मलहम लगाता गया

मैं हारता चला गया..................

 

जवान जोश संग होश भी

बूढ़ी उम्‍मीदें सफेद होती जटा

चक्षुओं पर मोटा ऐनक डंटा

मरता आज कल को फांसी की सजा

जहां मे हक छला गया

मैं हारता चला गया..................

 

उम्‍मीदें मौत की शैया पर पड़ी

सद्‌काम-नाम बेनूर हो रहा

मृत शैया पर पड़े भविष्‍य के सहारे

मरते सपने की शव यात्रा

विष पीता मरता चला गया

मैं हारता चला गया..................

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अभिमन्‍यु की मौत

सब्र की खोती उम्‍मीदों की बदली

सूखने लगे सोते

वज्रपात कल का डरा रहा विरान

जहर पीकर कैसे जीये कैसे सींये

भेद-भरे जहां में बड़े दर्द पाये है

दर्द में जीना आंसू पीना

नसीब बन गया है ।

 

तकलीफों के दंगल में

तालीम से मंगल की उम्‍मीद थी

वह भी छली गयी

श्रेष्‍ठता के दंगल में छल-बल के सहारे

अदना क्‍या जमाये जोर

जीना और आगे बढने का जनून

मौन गिर-गिर उठता कर्म के सहारे ।

 

नही मिलता भरे जहां में कोई

आंसू का मोल समझने वाला

पकड़ा राह सधा-श्रम,सपनों की आशा

खड़ी भौंहें कुचल जाती अभिलाषा

ऐसा जहां है ये प्‍यारे

स्‍वहित में पराई आंखों के सपने जाते हैं

बे-मौत मारे ।

 

ईसा,बुद्ध और भी पूज्‍य हुए इंसान

कारण वही जो आज है जवान

भेदभाव दुख-दरिद्रता,जीव दया,मानवहित

परपीड़ा से उपजे दर्द को खुद का माना

किये काम महान

दुनिया मानती उन्‍हें भगवान ।

वक्‍त का डर्रा वही बदल गया इंसान

कमजोर के दमन में देख रहा

सुनहरा स्‍व-हित आज इंसान

दबंग के हाथों कमजोर के सपनों का कत्‍ल

अभिमन्‍यु के मौत समान

 

आओ खायें कसम ना बनेंगे शैतान

ना बोएंगे विष ना कमजोर का हक छीनेंगे

मानवहित-राष्‍ट्रहित को समर्पित होगा जीवन

बनकर दिखायेंगे परमार्थ में सच्‍चा इंसान......................

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नन्‍दलाल भारती

कवि,कहानीकार,उपन्‍यासकार चलितवार्ता-09753081066

एम.ए. । समाजशास्‍त्र । एल.एल.बी. । आनर्स । दूरभाष-0731-4057553

पी.जी.डिप.एच.आर.डी.

आजाद दीप, 15-एम-वीणा नगर ,इंदौर ।म.प्र।दूरभाष-0731-4057553/चलितवार्ता-09753081066

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