संजय दानी की ग़ज़ल - पैसों के आगे बेबस है इंसां, हाट में बिकने सारे खड़े हैं...

सदियों से मुंह में ताले लगे हैं,
अहम की छत पर पाले पड़े हैं।

सुर्ख हैं अब फ़साने वफ़ा के,
बेवफ़ाई के क़िस्से हरे हैं।

इश्क़ का कारवां गमजदा है,
बेरहम हुस्न वाले बड़े हैं।

है न विश्वास खुद पे तभी तो,
हर गली में शिवाले खड़े हैं।

आशिक़ी का सफ़र बे-अता है,
आंसुओं को संभाले चले हैं।

सब्र ही इश्क़ का गहना है पर,
सब हवस के दुशाले धरे हैं।

पैसों के आगे बेबस है इंसां,
हाट में बिकने सारे खड़े हैं।

जानता ही नहीं झुकना इंसां,
अहम के तंबू गाड़े हुवे हैं।

हुस्न को क़त्ल का शौक दानी
इश्क़ भी दिल निकाले रखे हैं।

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3 टिप्पणियाँ "संजय दानी की ग़ज़ल - पैसों के आगे बेबस है इंसां, हाट में बिकने सारे खड़े हैं..."

  1. वास्तव में पैसे आगे बेबस है इंसान इसी लिए तो बाज़ार में बिकने को खड़ा है , मौके की तलाश में है कि कब ख़रीदा जाये उसे
    अच्छी रचना

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  2. bahut achchi prastuti vyang ka put liye hue.

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  3. अजय जी व राजेश कुमारी जी को शुक्रिया।

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