गुरुवार, 15 सितंबर 2011

संजय दानी की ग़ज़ल - पैसों के आगे बेबस है इंसां, हाट में बिकने सारे खड़े हैं...

सदियों से मुंह में ताले लगे हैं,
अहम की छत पर पाले पड़े हैं।

सुर्ख हैं अब फ़साने वफ़ा के,
बेवफ़ाई के क़िस्से हरे हैं।

इश्क़ का कारवां गमजदा है,
बेरहम हुस्न वाले बड़े हैं।

है न विश्वास खुद पे तभी तो,
हर गली में शिवाले खड़े हैं।

आशिक़ी का सफ़र बे-अता है,
आंसुओं को संभाले चले हैं।

सब्र ही इश्क़ का गहना है पर,
सब हवस के दुशाले धरे हैं।

पैसों के आगे बेबस है इंसां,
हाट में बिकने सारे खड़े हैं।

जानता ही नहीं झुकना इंसां,
अहम के तंबू गाड़े हुवे हैं।

हुस्न को क़त्ल का शौक दानी
इश्क़ भी दिल निकाले रखे हैं।

3 blogger-facebook:

  1. वास्तव में पैसे आगे बेबस है इंसान इसी लिए तो बाज़ार में बिकने को खड़ा है , मौके की तलाश में है कि कब ख़रीदा जाये उसे
    अच्छी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. bahut achchi prastuti vyang ka put liye hue.

    उत्तर देंहटाएं
  3. अजय जी व राजेश कुमारी जी को शुक्रिया।

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------