शनिवार, 17 सितंबर 2011

शंकर लाल कुमावत की दो कविताएँ

 

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इंसान क्यों नहीं बनते हो ?

समझो इंसानियत को तुम अब

खून बहाना मासूमों का

नहीं कोई धर्म है

सोच के देखो ये तो

शैतानों का कर्म है।

 

देख लो चाहे इतिहास खोलकर

अन्त बुरे को बुरा मिला है

पा जाओगे जन्नत खून बहाकर

यह तुम्हारा कोरा भ्रम है

 

मरने पर जन्नत तो क्या

हर जुल्मी को जीते जी ही

नर्क मिला है

देख लो चाहे इतिहास खोलकर

अन्त बुरे को बुरा मिला है।

लाशों के ढेरों पर बैठ कर

आजतक किसको सकून मिला है

 

तुम बात करते तो जन्नत की

खून से खेलने वाले शैतानों को

आजतक कफन भी नहीं मिला है

लाशों के ढेरों पर बैठ कर

आजतक किसको सकून मिला है।

 

दूसरों की आँख में

आंसू तो कोई भी दे सकता है

मगर, इन्हे अपनी पलकों से उठा ले

वो सच्चा इंसान होता है

याद रख हमेशा मारने वाले से

बचाने वाला महान होता है।

 

मिटा सकोगे क्या तुम

हिला सकोगे क्या तुम

जहां आतंक पर भारी

इंसानी जज्बात होता है।

 

अपने आप को पाक कहने वाले

पूरी जिंदगी कायरों की तरह

यहाँ से वहाँ छुपते फिरते हो

इस सब से तुम क्या हासिल करते हो?

छोड़ कर ये खून-खराबा

इंसान क्यों नहीं बनते हो ?

 

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कलयुग के बच्चे

सतयुग ने पूंछा कलयुग से

कहो, क्या सोचते हो

तुम्हारे बच्चे कैसे होंगे ?

 

वो इठलाता हुआ बोला

मेरे बच्चे, तुम्हारे बच्चो की तरह

भोले नहीं

बल्कि बड़े शातिर होंगे

बचपन में दूध नहीं

चिप्स और कुरकुरे के लिए रोयेंगे

जवानी में पानी नहीं

शराब से मुहँ धोयेंगे |

 

मेरे बच्चे, तुम्हारे बच्चो की तरह

गीता और कुरान में नहीं

FTV और MMS में विश्वास करेगे |

 

मेरे बच्चे दादा-नानी की

कहानी सुनकर नहीं

शीला और मल्लिका का

डांस देखकर सोयेंगे |

मेरे बच्चे ,तुम्हारे बच्चों की तरह

सच्चाई के आदर्श में

दुःख सह कर

किसी की सेवा नहीं करेंगे

बल्कि लोगो का गला काटकर

अपनी जेब भरेंगे

जिस थाली में खायेंगे

उसी में छेद करेंगे |

 

वो शादी करके घर में नहीं

लिव–इन रिलेशन से

होटल में रहेंगे

और

पैसे के लिए तो

माँ-बाप की हत्या से भी

परहेज नहीं करेंगे |

 

सुनो सतयुग भैया

तुम्हारे बच्चे पढ़ेंगे-लिखेंगे

तरक्की के लिए जी-जाना लगा देंगे

और मेरे बच्चे चोरी-डकैती रिश्वतखोरी से

सब कुछ हासिल कर ऐश करेंगे

क्योंकि मेरे बच्चे ......

 

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शंकर लाल इंदौर, मध्यप्रदेश Date :14.09.2011

Email: shankar_kumawat@rediffmail.com

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