रविवार, 18 सितंबर 2011

पुरूषोत्तम व्यास की कविता - अपने आपको बेचकर लिखी कविता

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अपने- आपको बेचकर लिखी-कविता,

हर-पल माला पिरोना चाहता,

टूटी-टूटी रह जाती,

ह्दय-व्यथा-ताप से कविता उभर आती।

 

कैसे पाऊं वह-किनारा,

जो ह्दय में – रहता,

प्रणय-ज्योत-जलायें,

सुबह-शाम रहता।

 

मालूम- हो अतिसुंदर-हो

मुस्कानों- से पुष्प खिलाती,

नयनों में प्रेम-भर

हर क्षण-भिगोती।

 

कैसे- कहूँ अपने

मन की बात,

समझ- कुछ न पाता,

तुम्हें देख मौन-सा हो-जाता।

--

झामनानी निवास

डा.फजल के बाजू

क्वेटा कालोनी

नागपुर

--

(चित्र - अमरेन्द्र, फतुहा, पटना की कलाकृति)

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