शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

रवि गोहदपुरी की कविता - शिक्षा

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कविता....शिक्षा

जातिवाद की ये पाठशाला

खुले आम चलती हैं

समाज की गंदी धारा में

शिक्षा निरंतर बिकती है

 

खूब पैसा खर्च किया

तब पायी ये डिग्रियां

खून पसीना बहाया अपार

फिर भी ना समझे दुनिया

 

शिक्षा बिकती बाजारों में

छात्र बने इसके खरीददार

शिक्षक हैं इसको बेचने वाले

पर कौन करे शिक्षा पर प्रतिहार

 

शिक्षा की धांधली को

अब हम कैसे मिटायें

शिक्षा हमारा जीवन है

इसे कैसे आगे बढायें

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रवि गोहदपुरी गोहद

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com , फतुहा पटना की कलाकृति)

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