बुधवार, 28 सितंबर 2011

सृजन के तत्वावधान में हिन्‍दी व्‍यंग्‍य साहित्‍य चर्चा

srijan (Custom)

हिन्‍दी साहित्‍य, संस्‍कृति एवं रंगमंच को समर्पित संस्‍था सृजन ने आज डाबा गार्डेन्‍स के पवन एनक्‍लेव मे हिन्‍दी व्‍यंग्‍य साहित्‍य चर्चा का आयोजन किया। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव ने किया जबकि अध्‍यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने कार्यक्रम का संचालन किया।

स्‍वागत भाषण देते हुए डॉ टी महादेव राव ने व्‍यंग्‍य साहित्‍य चर्चा कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्‍होंने कहा कि व्‍यंग्‍य को साहित्‍य में विधा के रूप में मान्‍यता नहीं मिली जबकि वह हिन्‍दी साहित्‍य में भारतेन्‍दु हरिश्‍चंद्र के समय से आज तक पूरी शिद्दत के साथ विद्यमान है। नीरव कुमार वर्मा ने कहा जिनके लिये लिखा गया है, व्‍यंग्‍य उन पर परोक्ष रूप से आघात करता है। हास्‍य और व्‍यंग्‍य के बीच एक महीन सीमा रेखा होती है। लेखकों को इस पर विशेष ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है।

सबसे पहले सीमा वर्मा ने अपनी कविता ‘ जीवन का सत्‍य और व्‍यंग्‍य’ में जिंदगी के हर पहलू में व्‍याप्‍त व्‍यंग्‍य पर अपने विचार व्‍यक्‍त किये। श्‍वेता कुमारी ने अपनी रचना ‘ फेस बुक ’ के माध्‍यम से आज के मानव की बदलती व्‍यस्‍तता और प्राथमिकताओं पर व्‍यंग्‍य कसा। लेख ‘ हिन्‍दी साहित्‍य में हास्‍य व्‍यंग्‍य ’ में डॉ जी वी वी रामनारायणा ने उदाहरण सहित विश्‍लेषण प्रस्‍तुत किया।

सीमा शेखर ने अपने लेख ‘ लूट सके तो लूट ’ में भ्रष्‍टाचार की अनंत व्‍यापकता पर सूक्ष्‍म मगर प्रभावी विश्‍लेषण प्रस्‍तुत किया। श्रीमती मीना गुप्‍ता ने लेख ‘ जब मैं इन्‍विजिलेशन में गई ’ द्वारा परीक्षा केंद्रों में व्‍याप्‍त घपले, अनैतिकता पर करारा व्‍यंग्‍य किया। ‘ मेरा भारत महान ‘ व्‍यंग्‍य कहानी प्रस्‍तुत की बी एस मूर्ति ने जिसमें आम आदमी की भ्रष्‍टाचार के कारण परेशानी को रेखांकित किया गया। अपनी व्‍यंग्‍य कविताएं ‘पति- पत्‍नी ’, ‘ मतदाता और नेता ‘ के माध्‍यम से सामाजिक व्‍यंग्‍य प्रस्‍तुत किया लक्ष्‍मीनारायणा दोदका ने। बैंक अधिकारी के जीवन में आई व्‍यस्‍तता के कारण बिगड़ते सामाजिक संबंधों पर बीरेंद्र राय ने व्‍यंग्‍य लेख ‘मेरा पेशा ‘ पढा। जी एस एन मूर्ति ने अफसर, पति–पत्‍नी विषयों पर व्‍यंग्‍य कविताएं प्रस्‍तुत की।

‘ कवि की व्‍यथा ‘ और ‘ अभी भी समय है’ शीर्षक की दो कविताओं के माध्‍यम से शकुन्‍तला बेहुरा प्रस्‍तुत हुईं। ‘ शर्म तुम कहां हो ‘ शीर्षक अपने व्‍यंग्‍य में निर्लज्‍ज होते मनुष्‍यों की प्रवृत्‍ति पर करारा कटाक्ष किया डॉ टी महादेव राव ने । डॉ एम सुर्यकुमारी ने अपने व्‍यंग्‍य लेख ‘सर पर बाल न होने पर भी’ में वृद्धावस्‍था में भी यौवन के सपने देखते वृद्ध व्‍यक्‍तियों पर व्यंग्य कसा। नीरव कुमार वर्मा की कहानी ‘ एम एन सी में सी टी सी ‘ में आज की युवा पीढी और बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों पर व्‍यंग्‍य था।

सभी रचनाओं पर विश्‍लेषणात्‍मक चर्चा की गई। सृजन संस्‍था द्वारा आयोजित ऐसे कार्यक्रमों से लेखकों में लिखने की लगन बढ़ रही है ऐसा सभी का मत था। इस कार्यक्रम में साहित्‍य अकादमी बाल साहित्‍य पुरस्‍कार विजेता श्रीमती पुण्‍यप्रभा देवी, डी सी शारदा, रामप्रसाद यादव, डॉ जी रामनारायण, मीनाक्षी देवी, विजय कुमार राजगोपाल, सीएच ईश्‍वर राव सहित कई अन्‍य भी सक्रिय रूप से सम्‍मिलित हुए। सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव के धन्‍यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम समाप्‍त हुआ।

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------