गुरुवार, 22 सितंबर 2011

प्रमोद भार्गव का आलेख - सामंतों की भूमि का हो अधिग्रहण?

देश में भूमि अधिग्रहण का मुद्‌दा गरम है। राजनीति में किसी हद तक जन-सरोकारों से जुड़े मुद्‌दों के पैरोकार केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ‘राष्‍ट्रीय भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास एवं पुनर्स्‍थापन विधेयक 2011' को केबीनेट से पारित कराकर लोकसभा में पेश भी कर चुके हैं। ऐसा माना जा रहा है कि इस विधेयक का प्रारूप पूर्व में तैयार किए गए सभी विधेयकों की तुलना में किसान मजदूरों के ज्‍यादा हित में है। क्‍योंकि इसमें भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को अंजाम देने के साथ विस्‍थापितों के पुनर्वास व अजीविका की भी चिंता परिलक्षित हो रही है। इसके बावजूद प्रस्‍तावित विधेयक की सीमा कृषि भूमि के अधिग्रहण तक ही सीमित है। नगरीय क्षेत्रों में विद्यायल, महाविद्यायल, अस्‍पताल और अन्‍य बुनियादी जरूरतों से जुड़ी सुविधाओं के लिए जमीन हासिल करना एक मुश्‍किल समस्‍या बनी हुई है। इस समस्‍या के चलते अनेक नगरों में बुनियादी संरचना से जुड़े विकास संबंधी कार्य अर्से से लंबित हैं। ऐसा नहीं है कि देश के सभी नगरों में भूमि का अभाव है। अतीत का हिस्‍सा बन चुके सामंतों जमींदारों और नवधनाढ्‌यों की ऐसी हजारों एकड़ भूमि नगर पालिकाओं और नगर निगमों की परिधि में है, जिसे अधिग्रहण किए जाने के प्रावधान इस विधेयक में शामिल कर दिए जाएं तो बड़ी संख्‍या में बुनियादी जरूरतों की आपूर्ति बिना किसी विस्‍थापन व पुनर्वास समस्‍या का सामना किए हो सकती है। लेकिन इस मंतव्‍य की साध के लिए दृढ़ राजनीतिक व प्रशासनिक इच्‍छा शक्‍ति की दरकार है।

हमारे कानूनविदों और समाजशास्‍त्रियों के पास शास्‍त्र सम्‍मत ज्ञान तो है, लेकिन समाज से संपर्क और व्‍यवस्‍था से दूरी होने के कारण उनकी निगाह वहां नहीं जाती, जहां भूमि अधिग्रहण आसानी से किया जा सकता है। देश की आजादी के वक्‍त 562 रियासतों का विलय विभिन्‍न प्रदेशों में किया गया था। इन राजे-रजवाड़ों का राज्‍यों में विलय सुविधाजनक हो इस नजरिए से इनके सुचारू जीवन यापन के लिए इन्‍हें तमाम महल और अराजियां (भूमियां) इनके हित में छोड़ दी गईं थीं। इनके गुजारे के लिए बतौर आर्थिक मद्‌द प्रीविपर्स का भी प्रावधान था, जो लाखों में था। इसे इंदिरा गांधी ने राष्‍ट्रीय मुद्रा की फिजूलखर्ची मानते हुए 1969 में एक झटके में खत्‍म कर दिया था। प्रीविपर्स, आजीविका के लिए एक तरह की पेंशन थी। इसका निर्धारण रियासतों की सालाना आमदनी के आधार पर किया गया था। बड़े राजा-महाराजाओं को करोड़ों रूपए का भुगतान भारत सरकार को करना पड़ता था। जबकि ये पूर्व सामंत आय के अनेक स्‍त्रोतों से जुड़े हुए थे। संपत्ति से किराया इन्‍हें मिल ही रहा था, जो कृषि भूमि इनके हित में छोड़ी गई थी, वह भी इनकी आय का बड़ा स्‍त्रोत तब भी थी और आज भी है। बड़े राजघरानें तो मंहगे होटल, शिपिंग कार्पोरेशन, बैंकिंग, औद्योगिक घरानों में हिस्‍सेदारी और शेयर बाजार से भी जुड़े हुए थे। कई प्राचीन व प्रमुख मंदिर भी इनकी आय का स्‍त्रोत थे, जो आज भी बदस्‍तूर हैं। राजघरानों के संग्रहालय भी सामंतों के वंशजों की आय का जरिया हैं। अपनी विरासत के इस विशाल साम्राज्‍य (संपत्ति) को बड़ी कुटिल चतुराई से इन लोगों ने लोक कल्‍याणकारी न्‍यास बनाकर सुरक्षित किया हुआ है। इनके लोक कल्‍याण मानव कल्‍याण के लिए कितने लाभकारी है यह इनके यहां पुश्‍तैनी रूप से काम कर रहे लोगों से रूबरू होने पर पता चलता है। इनकी हैसियत बंधुआ मजदूरों से भी बद्‌तर है। ज्‍यादातर कामगारों को एक हजार रूपए प्रतिमाह से ज्‍यादा वेतन नहीं मिलता। अन्‍य किसी प्रकार की आर्थिक सुरक्षा से ये महरूम हैं। लोक कल्‍याण की यह हकीकत जाहिर करती है कि न्‍यासों पर स्‍वामित्‍व और लाभ व्‍यक्‍तिगत बना हुआ हैं।

आपातकाल तक ज्‍यादातर पूर्व राजा-महाराजा और इनके बारिश अपने दड़वों में किसी तरह दिन पूरे गिनने में लगे थे। सत्ता मद से वंचित हो जाने का अहंकार भी इन्‍हें आहत किए हुए था। लिहाजा जनता से इनकी दूरी बनी हुई थी, जो प्रजातांत्रिक मूल्‍यों की दृष्‍टि से एक बेहतर स्‍थिति थी। किंतु आपातकाल के बरक्‍श इंदिरा गांधी के पतन के बाद फिर केंद्र व राज्‍यों में आई गैर कांग्रेसी सरकारों के वजूद में आने के बाद जिस तरह से नेतृत्‍व की अक्षमता और परस्‍पर लंगड़ी लगाने के जो हालात निर्मित हुए उससे ये सरकारें जल्‍दी औंधे मुंह गिर गईं और जनता का भी इन से मोहभंग हो गया।

मोहभंग के इस वातावरण को इंदिरा गांधी और उनके नटखट बेटे संजय गांधी ने बड़ी कुटिल चतुराई से भुनाने की राजनीतिक बिसात बिछा दी। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी को इंदिरा कांग्रेस के नए चेहरे में बदलकर एक नई ऊर्जा का संचार व नए राजनीतिक नेतृत्‍व का सूत्रपात किया। जिसकी कमान संजय गांधी के हाथ में थी। संजय ने अपने वंश को सत्ता में पुनस्‍र्थापित करने की दृष्‍टि से उन राजवंशों के नुमाइंदों को भी दड़वों से बाहर निकालकर कांगे्रस में शामिल कर राजनीतिक पुनर्वास दे दिया जो महत्‍वहीन होकर हाशिए का हिस्‍सा भी नहीं रह गए थे। इनमें से अनेक तो पैतृक धरोहरों की अमूल्‍य संपत्तियों को बेचकर किसी तरह से अपना गुजारा करने में लगे थे। इन लोगों को सांसद और विधायकोंं के टिकिट मिले। इंदिरा-लहर के चलते ये विजयी भी हुए। यहां से कांग्रेस में एक ऐसा बुनियादी परिवर्तन आया, जिसके चलते कांग्रेस अपनी मूल विचारधारा और गरीब के हित साधक चरित्र से दूर होती चली गई। इस पुनर्वास के बाद सत्ता की ताकत फिर से हासिल करके इन सामंतों ने एक और चालाकी बरती, रियासतों के विलय के बाद जो भूमियां व भवन सरकारी मिल्‍कियत हो गए थे उनकों हड़पने का सिलसिला शुरू कर दिया। राजस्‍व दफ्‍तरों की फाइलों से वे दस्‍तावेज गायब कराना शुरू कर दिया जो सामंतों की भूमि के हुए बंटबारे को रेखांकित करते थे। भू-प्रबंधन और भू-दस्‍तावेज आज भी हमारे यहां धूल-धूसरित अक्‍श व नक्‍शों, हस्‍तलिखित भूमि अभिलेखों और खसरा-खतौनी से संचालित होता है। करोड़ों-अरबों रूपए कंप्‍यूटरीकरण में खर्च करने के बावजूद पटवारी का कोई ठोस विकल्‍प सामने नहीं आ पाया है। राजनीतिक प्रभाव के चलते इन सामंती प्रतिनिधियों नेे हजारों एकड़ भूमि और सैंकड़ों भवन दस्‍तावेजों में हेराफेरी कराकर फिर से हड़प लिए कुछ जगह तो आजादी के बाद से अब तक जिन भवनों में कलेक्‍टर व कमिश्‍नर कार्यालय लगते चले आ रहे थे, उन पर इन सामंतों की मिल्‍कियत की शुरूआत भी हो गई है।

भूमण्‍डलीकरण का दौर तो थोड़ा बाद में आया इसके पहले ही सत्ता में आए इन सामंतों की पुनस्‍र्थापना ने भारतीय राज्‍य के लोकतांत्रिक व लोककल्‍याणकारी चरित्र के चेहरे को सामंती मूल्‍यों की कुरूरता में बदलने का सिलसिला शुरू कर दिया था। रही-सही कोर-कसर नवउदारवाद के अमेरिकी अवतार ने पूरी कर दी। फलस्‍वरूप आधुनिक लोककल्‍याणकारी राज्‍य के वर्तमान संकटों में जो भूमिअधिग्रहण जैसी बड़ी समस्‍याएं हैं उसकी पृष्‍ठभूमि में पूंजीवाद तो है ही, जनप्रतिनिधियों की मानसिकता में सामंती चरित्र का प्रभाव भी है। लिहाजा सामाजिक संरचना के चरित्र को समावेशी बनाए रखने की बजाए पिछले ढाई-तीन दशक के भीतर नीतियों को ऐसा रूप दिया जाता रहा है, जिसके तईं कथित विकास के आर्दश व मापदण्‍ड एक रेखीय होते चले जाएं। इस विकास पर जरा भी आंच आती है तो सकल घरेलू उत्‍पाद और औद्योगिक विकास दर प्रभावित होने का रोना प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी रोने लग जाते हैं। औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की गति धीमी पड़ जाने का भय दिखाया जाता है। अण्‍णा हजारे के जन हितैषी आंदोलन को पूंजी निवेश के खतरों से जोड़कर देखा जाता है। उद्योगपतियों का देश छोड़ कर चले जाने का काल्‍पनिक हल्‍ला मचाया जाता है। कुशल तकनीकियों का रोजगार छिन जाने की चिंता जताई जाती है। और इन सब कृत्रिम आपदाओं के बहाने उद्योगपतियों को छह लाख करोड़ की छूट देकर उनके आर्थिक हितों को बाला-बाला संरक्षण दिया जाता है। जबकि जिस पूंजीवाद के रास्‍ते उदारीकरण भारत आया, उसकी जरूरी शर्त है कि प्रतिस्‍पर्धा के नियम सरल व पारदर्शी हों और हर संभावनाशील, महत्‍वाकांक्षी व नवोदित उद्यमी को उपनी कौशल-दक्षता दिखाने का समान अवसर मिले। परंतु हुआ इसके विपरीत उद्योग लगाने के जटिल कानून और भारी-भरकम पूंजी निवेश के चलते तकनीकी कुशलता के धनी-मानी युवा देशी-विदेशी कंपनियों के मोटी तनखा पाने वाले बंधुआ बनकर रह गए।

इसीलिए भूमि अधिग्रहण कानून का जो नया प्रारूप सामने आया है उसका उद्योग जगत तो विरोध कर ही रहा है, सामंती और व्‍यापारिक सोच के अनेक मंत्री व सांसदों ने भी असहमति जताई है। क्‍योंकि मयौदा किसान व खेती के प्रति संवेदनशील है। सिंचित कृषि भूमि के अधिग्रहण पर पूरी तरह रोक का प्रस्‍ताव है। इस स्‍थिति से सवाल उठता है कि हमारे नेता समाज के किस तबके के पैरोकार हैं और किनके हितों के संरक्षण में लगे हुए हैं। यही कारण है कि गरीब व वंचित की आजीविका के बहाने अब तक दलित, आदिवासी व हरिजनों को जितने भी पट्‌टे दिए गए हैं, उनमें से ज्‍यादातर के हिस्‍से बंजर व विवादित भूमि आई है। ये हालात भूमि सुधार योजनाओं की हकीकत से भी रूबरू कराते हैं। बहरहाल यदि केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार कृषि व किसान के प्रति थोड़ी भी संजीदा है तो उसे भूमि अधिग्रहण के इस प्रारूप में पूर्व सामंतों व जमींदारों की व्‍यर्थ पड़ी भूमि को अधिग्रहण किए जाने का प्रस्‍ताव भी जोड़ना चाहिए। किसान की भूमि अधिग्रहण से पहले पूर्व सामंतों, पूंजीपतियों और राजनीतिक के भूमि व भवन उद्योग लगाने व स्‍कूल-कॉलेज व अस्‍पताल खोलने के लिए उपलब्‍ध हैं तो पहले इनका अधिग्रहण किया जाए ? इससे न पूनर्वास की समस्‍या पैदा होगी और न ही किसी की आजीविका छिनेगी ? ऐसी स्‍थिति पैदा होती है तो इससे यह भी पता चलेगा कि इन सामंतों के चेहरे कितने लोक कल्‍याणकारी हैं और कितने सामंती ?

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (म.प्र.)-473-551

pramod.bhargava15@gmail.com

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है ।

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  1. विकास के नाम पर ज़मीनों पर कब्जा फिर बड़ी बड़ी इमारते खड़ी करना फिर लोन पर मकान देना फिर मासिक वसूली किराये से ज्यादा अदा करना फिर कभी किश्त जमा न कर सको तो गुंडों से पीटना फिर तनाव फिर झगडे आत्महत्या .............

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