शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

मालिनी गौतम का गीत - स्याह अमा की रातों में

स्याह अमा की रातों में

प्रिय, स्याह अमा की रातों में

तुम लक्ष्य तलक चलते ही रहो,

मैं ज्योत्स्ना बन न सकूँ तो क्या?

बस, दीपक बन जलती ही रहूँ !

 

इस राग-द्वेष की दुनियाँ में

तुम निर्मल बन बढ़ते ही रहो

मैं सागर बन न सकूँ तो क्या?

बस, सरिता बन बहती ही रहूँ !

 

प्रिय, बाट जोहती आँखों में

तुम बन उपवन फलते ही रहो

मैं मंजरी बन न सकूँ तो क्या?

बन पीत-पात झरती ही रहूँ !

 

इस सूखी-बंजर धरती पर

तुम पावस बन झरते ही रहो

मैं बदली बन न सकूँ तो क्या?

बस चातक बन तकती ही रहूँ !

 

हर शोकाकुल आहत मन में

तुम बंसी बन बजते ही रहो

मैं राधा बन न सकूँ तो क्या?

बन स्वर-लहरी बहती ही रहूँ !

 

डॉ. मालिनी गौतम

1 blogger-facebook:

  1. rahultiwari131985@gmail.com4:34 pm

    hi malini ji kya kavita likhi hai aapne bahut badhai lagta hai jis vishaywastu par aapne kavita likhi hai bahut gahrai se anubhaw kia hai kyuki ki uske bina itna dard mumkin nahi hai

    उत्तर देंहटाएं

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