गुरुवार, 29 सितंबर 2011

राजीव श्रीवास्तवा की कविता - नैनों की भाषा

 

नैनों की भाषा

मरूभूमि सी वीरान कभी
कभी उपवन सी सुंदर दिखती है
कल-कल बहता झरना कभी
कभी चट्टानों सी तपती है
 
कभी ममता की मूरत बन
ये प्रेम सुधा बरसाती है
इसके आँचल की छाँव तले
धरती स्वर्ग बन जाती है
 
कभी खामोशी का रूप धर
हर बात बयाँ कर जाती है
बिन कहे एक भी शब्द
मन की मनसा दर्शाती है
 
जब रुद्र रूप धारण करती
ये अग्नि कुंड बन जाती है
दुश्मन पर तीखे वार कर
ये महाकाल कहलाती है
 
कभी प्रेम रस की वाणी बन
मधुर मिलन करवाती है
इज़हार मोहब्बत कर देती
जब जुबां शिथिल पड़ जाती है
 
कभी लज्जा की चादर ओढ़े
ये मंद मंद मुस्काती है
कुंदन की काया धरी रहे
जब शर्म से ये झुक जाती है
 
यहाँ भाषाओं की भीड़ है
हर मोड़ पे बदल जाती है
हम प्रेम सूत्र में बँधे हैं
क्योंकि नैनों की भाषा होती है

--
 
डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा 

5 blogger-facebook:




  1. रवि रतलामी जी भाई साहब

    आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  2. bahut accha likha hai sir .navratri parv ki badhai sweekar karein....dhanyavaad

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेहतरीन रचना, राजीव जी को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  4. यहाँ भाषाओं की भीड़ है,
    हर मोड पे बदलजाती है |
    हम प्रेम सूत्र में बंधे हैं
    क्योंकि नैनों की भाषा होती है|----
    ---यह तो इस भारत की अनेकता में एकता की विशेषता है ...क्या आप को कोई ओब्जेक्शन है ...क्या कहना चाहते हैं स्पष्ट नहीं है ..
    ----नैन या नयन स्वयं ही बहुबचन है ...य

    उत्तर देंहटाएं

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