कान्ति प्रकाश त्यागी की हास्य व्यंग्य कविता : स्वर्ग-नर्क

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स्वर्ग- नर्क

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एक लड़की साधु के पास आई

चरण छूकर, यह व्यथा सुनाई,

बाबा! मुझे नींद नहीं आती

कोई भी चीज़, नहीं सुहाती।

 

न भूख़ लगती है,

न प्यास लगती है।

घर वाले दबाब डाल रहे हैं,

मैं शादी अवश्य करूं।

मैं समझ नहीं पा रही ,

शादी करूं या ना करूं।

 

शादी शुदा भी दुखी हैं ,

बगैर शादी शुदा दुखी हैं।

आदमी शादी करता क्यूं है ?.

फिर करके पछताता क्यूं है ?.I

 

बाबा! , मैं हूँ बहुत परेशान ,

आप ही निकालिए समाधान।

बच्चा! शादी एक लड्डू है ,

प्रत्येक के मन में फूटता है।

 

हो जाय तो भी ना हो भी ,

हर तरह से मन टूटता है।

जो खाय, वह पछताय ,

जो न खाय, वह पछताय।

 

कभी यह सख़्त हो जाता है ,

क्भी यह नरम हो जाता है।

फिर भी तुम शादी कर लो ,

मन के अरमान पूरे कर लो।

 

शादी के बाद जब मृत्यु लोक जाओगी ,

तब ही इसका मतलब समझ पाओगी।

स्वर्ग मिलेगा, तो अच्छा लगेगा।

नरक मिला, तो घर जैसा लगेगा।

 
 
 
Dr.K.P.Tyagi
Prof.& HOD. Mech.Engg.Dept.
Krishna।nstitute of Engineering and Technology
13 KM. Stone, Ghaziabad-Meerut Road, 201206, Ghaziabad, UP

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(चित्र - अमरेन्द्र {aryanartist@gmail.com } - फतुहा, पटना  की कलाकृति.)

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