मंगलवार, 20 सितंबर 2011

कहानी संग्रह मुक्‍त होती औरत पर परिचर्चा संपन्‍न

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क हानी जिन्‍दगी का तर्जुमा है, डॉ․ विजयबहादुर सिंह

कहानी संग्रह मुक्‍त होती औरत पर परिचर्चा संपन्‍न

प्रमोद भार्गव की कहानियां, सामाजिक जटिलताओं की कहानियां हैं। उनकी कहानियां एक बैचेनी पैदा करती हैं। सोचने को मजबूर ! उनके कहानी संग्रह मुक्‍त होती औरत में स्‍त्री के कई रूप सामने निकलकर आते हैं। उक्‍त विचार कथाकार महेश कटारे ने म․प्र․ प्रगतिशील लेख संघ, इकाई शिवपुरी द्वारा आयोजित कथाकार, पत्रकार प्रमोद भार्गव के नए कहानी संग्रह मुक्‍त होती औरत पर आयोजित परिचर्चा में अध्‍यक्ष की हैसियत से व्‍यक्‍त किए। ‘आनंद सागर कथाक्रम सम्‍मान' और ‘शमशेर सम्‍मान' से सम्‍मानित कथाकार महेश कटारे ने पौराणिक ग्रंथ महाभारत में द्रौपदी के हवाले से कहा ‘‘स्‍त्री यदि पीडि़त है, तो ईश्‍वर नहीं।''

स्‍थानीय कर्मचारी भवन के सभागार में ‘मुक्‍त होती औरत‘ और समकालीन हिंदी कहानी में स्‍त्री' विषय पर आयोजित इस परिचर्चा में मुख्‍य वक्‍ता की हैसियत से पधारे डॉ․ विजयबहादुर सिंह ने अपने सारगर्भित वक्‍तव्‍य में कहा कहानी, जिंदगी का तर्जुमा है और वह कहानी में सही तरह से आना चाहिए। संग्रह की कहानी दहशत का खास तौर से जिक्र करते हुए उन्‍होंने कहा यह कहानी हमारे लोकतंत्र पर एक क्रिटिक है। कहानी में अटलपुर गांव का जो लोकल है, वह हर जगह की वास्‍तविकता है। यह कहानी सचेत करती है कि हमें नागरिक जीवन में कैसे व्‍यवहार करना चाहिए। अपनी समालोचना के लिए पूरे देश में अलग से पहचाने जाने वाले डॉ सिंह ने आगे कहा मौजूदा दौर की सबसे बड़ी चुनौती अपने मनुष्‍य को जिंदा रखना है। प्रमोद भार्गव की कुछ कहानियां हमें टैक्‍नोलॉजी से आगाह करती हैं। क्‍योंकि, आज टेक्‍नोलॉजी मनुष्‍य के पक्ष में कम, उसके विरोध में ज्‍यादा जा रही है।

कार्यक्रम की शुरूआत प्रगतिशील लेखक संघ शिवपुरी इकाई के सचिव, लेखक-पत्रकार जाहिद खान के स्‍वागत भाषण के साथ हुई। जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में हिंदी के प्राध्‍यापक, युवा आलोचक-पत्रकार वैभव सिंह ने कहा हमारे यहां जो स्‍त्री विमर्श आया है, वह यूरोपीय स्‍त्री विमर्श से प्रेरित है। हिंदी साहित्‍य में स्‍त्री का वास्‍तविक चित्रण, जो स्‍त्री की कसौटी पर खरा उतरे, वह 1980 के बाद मुखर हुआ। कहानी संग्रह पर बात करते हुए उन्‍होंने कहा प्रमोद भार्गव की कहानियां सिर्फ समय या काल बोध की कहानियां नहीं हैं बल्‍कि ये परिवेश बोध की कहानियां हैं। इनमें अपने आस-पास का परिवेश काफी मुखर होकर सामने आया है। ग्रामीण परिवेश और कस्‍बाई जिंदगी पर उनकी अच्‍छी पकड़ है। उन्‍होंने कहा महान कृतियां अपने काल बोध के साथ-साथ परिवेश बोध की भी कृतियां होती हैंं। शिवपुरी इकाई की अध्‍यक्ष कथाकार डॉ․ पद्‌मा शर्मा ने कहानी संग्रह पर अपनी समीक्षा पढ़ते हुए कहा प्रमोद भार्गव की कहानियों में नारी मुक्‍ति की कामना दैहिक स्‍तर पर ही नहीं बल्‍कि कई स्‍तरों पर है। विशेषकर आर्थिक स्‍तर पर। उनकी कहानियों में नारी की मुक्‍ति स्‍वयं उसके द्वारा होती है।

कथाकार ए․ असफल ने संग्रह की शीर्षक कहानी मुक्‍त होती औरत पर बात करते हुए कहा कहानी का मुख्‍य किरदार मुक्‍ता, कहानी के अंत में धर्म की सारी वर्जनाओं को तोड़ देती है। समकालीन हिंदी कहानी में स्‍त्री विमर्श के नाम पर जो यौन को गुदगुदाने का काम चल रहा है, वह मुक्‍त होती औरत में नहीं है। कहानी में एक सार्थक चर्चा है। संग्रह की नक्‍टू व दहशत आदि कहानियां भी बहुत अच्‍छी हैं। समालोचक डॉ․ परशुराम शुक्‍ल विरही ने कहा नारी उन सारे बंधनों से मुक्‍त होना चाहती है, जो उसकी मानवीयता को बांधे हैं। मुख्‍य बात आर्थिक मुक्‍ति की है। समकालीन हिंदी कहानी में स्‍त्री के जितने स्‍वरूप हमें देखने को मिलते हैं, वे सब प्रमोद भार्गव के इस कहानी संग्रह में देखने को मिलते हैं।

कार्यक्रम को सूत्र दर सूत्र जोड़ने का काम संचालक डॉ․ पुनीत कुमार ने किया। अंत में नगर के सभी साहित्‍यानुरागियों और बाहर से आए अतिथियों का आभार प्रकट करते हुए कथाकार प्रमोद भार्गव ने कहा परिचर्चा में मेरी कहानियों पर जो बेशकीमती सुझाव आए हैं, मैं आईंदा उन पर अमल करने की कोशिश करूंगा।

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