रविवार, 18 सितंबर 2011

अजय कुमार तिवारी की कविता - पराजय निश्चित है....

पराजय निश्चित है !

शहर से हत्‍यारा एक
भाग आया है ,
  ढेरों हथियार लिए  ,
   हमारे गाँधीवादी गाँव में
    फिर ।

भाँप लेता हूँ मैं इच्‍छाएँ
उसकी ,
  भेड़िए-सी लाल आंखें ,
   लपलपाती जीभ देख ,
    करेगा हत्‍याएँ ,
     यहाँ की आदिवासी बानी की ,
      करेगा हत्‍याएँ ,
       सिनेमाई गानों से ,
        हमारी कोमल मासूम युवतियों के ,
         संकोच और लाज की ,

करेगा हत्‍याएँ ,
हमारे ग्रामीण लिबास की ,
  फैशनेबल कम तन ढकने वाले वस्‍त्रों से ,
   करेगा हत्‍याएँ ,
    काले धुएँ उगलने वाली चिमनी के ,
     कारखाने लगाकर ,
      हमारे शांत सौम्‍य निर्मल वातावरण की ,
       करेगा हत्‍याएँ ,
        सोंधी सुगंध वाली मिट्‌टी के घरों की ,
         आलीशान इमारतें बनाकर ।

बेघर होंगे ,
फिर कई ,
  बापू के सिद्‌धांतों के अंधभक्‍तों की ,
   करेगा हत्‍याएँ ,
    सीधे सादे गँवहियों के विश्वासों की ,
     घर ,अस्‍पताल,पोस्‍टआफिस ,
      पुलिस थानों तथा
       श्मशान घाट बनाने का ,
        मक्‍कारी भरा वायदा कर ।

लगता है ,
चेताकर कह दूँ ,
  सावधान आदिवासी भाइयों !
   गैर आदिवासी भाइयों !
    तैयार हो जाओ ,
     विषबुझे तीर-धनुष से लैस होकर
      मैं दुंदुभि बजाता हूँ ।

पर ,
नहीं होगा लाभ कुछ ,
   हथियार उठाकर ,
    मारे जाएँगे यही बेगुनाह ,
     क्‍योंकि शहरी हैं ,
      अणु और परमाणु शक्तियों से युक्‍त ,
       क्‍योंकि ,
        उनके सर पर हाथ हैं ,
         दुर्योधन का ,
          क्‍योंकि
           उनके साथ हैं भीष्म ,कर्ण ,
             द्रोण जयद्रथ आदि कुचक्र की शक्ति से लैस ,
              सातों महारथी ।
               कब तक घुमाता रहेगा ,
                रथ का पहिया अभिमन्‍यु ,
                 पराजय निश्चित है ।

                 मैं क्‍या करुँ हाय !

                  फिर एक गाँव
                    शहर हो जाएगा।

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