गुरुवार, 15 सितंबर 2011

सत्यप्रसन्न की दो कविताएँ - बेटियाँ और दरमियान

बेटियाँ


वक़्त के आँगन में
ख़्वाबों के हसीन पंख लगा
प्यार के खुशगवार फूलों पर
इतराती फिरती हैं,
झिलमिल तितलियों सी,
बेटियाँ जब,
देखा है मैने तब,
रुकते कदम फरिश्तों के,
और देखी है
झरती दुआएँ अनगिनत
उनके ओठों से।

देखा है मैने यह भी कि
बेटियों ने जब भी
उतारी है अपनी काग़ज की कश्ती
दरिया की मौजों में,
वो दूर तलक गई है
तैरती, हर मौज से
लड़ती, टकराती
दरिया की पूरी लंबाई को नापती।

बेटियाँ बुहारती हैं,
आँगन जब भी,
देखा है मैंने तब
हवा को गहरी साँस लेकर,
वो सारा गुबार
अपने फेफड़ों में भरते,
ताकि,
खूँटे से बँधी बकरी
और तुलसी का बिरवा भी
ले सके साँस,
साफ हवा में।

माँजकर बरतन और
धोकर कपड़े
मिलकर माँ के साथ,
घर भर का खाना बनाने के बाद,
उठाई है किताब बेटियों ने
जब भी,
मैंने देखा है, अक्षरों को
उनकी हमजोलियाँ बनते
और उनकी कलम को
अनथक, अबाध तैरते।

घुप्प अँधेरे कमरे से
उठाकर लाती हैं, जब बेटियाँ,
पापा का चश्मा,
माँ के सिन्दूर की डिबिया
और भैया की कमीज़ भी,
तब मैंने देखा है;
बरसा है उनके चेहरे से
एक नूर,
और नुमाया होती गई है
हर एक चीज।

बेटियों ने,
सहलाया है माथा,
अपनी शबनमी उँगलियों के
स्पर्श से जब भी,
देखा है मैंने तब,
घनीभूत पीड़ा को
पिघलते और पूरे तन को
जलतरंग की स्वर लहरियों से
तरंगित होते।

लेकिन,
जब-जब भी,
आँसू का एक कतरा भी
डबडबाया है आँखों में,
या, उदासी के अशआर
लिखे दिखे हैं;
चेहरे पर बेटियों के,
तब-तब देखा है मैंने
ग़मगीन होते पूरी कायनात को।

गोया, साँझी हों
दोनों के जज्बात
और
मन दोनों का।
----


दरमियान


पूरी तरह से खारिज़
कर दिये जाने से पहले,
महसूस करना चाहता हूँ
अपने हाथों से उगाये
गुलाब की खुशबू
और
तुम्हारे हाथों से बनी
बिना दूध की
चाय क स्वाद।

गोकि, जानता हूँ मैं
कि, अब मुमकिन नहीं रहा
तुम्हारे लिये भी,
उसी आजादी के साथ
मेरे लिये कुछ करना।

ठीक वैसे ही
जैसे कि नहीं रहा मुमकिन
मेरे लिये;
उस गुलाब को मेरा कहना।

क्योंकि;
नकार दिये जने का भय,
तिरस्कृत करती दृष्टि,
तथा उलाहनों, नसीहतों
और हिदायतों के रूप में
खड़ी है एक पूरी की पूरी पीढ़ी
मेरे गुलाब और तुम्हारी
चाय के दरमियान।


---
"सत्यप्रसन्न"
कोरबा (छ.ग.)

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