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प्रेम गुप्ता ‘मानी’ का व्यंग्य - भ्रष्टाचार बनाम काला धन

रात के यही कोई दस-सवा दस बजे रहे होंगे जब मेरे मोबाइल पर भीषण धमाके के साथ गोली चलने की आवाज़ आई। हमारे घर में यह भोजन करने का समय था। जैसा कि आजकल हमारे यहाँ हर चीज़ खा कर पचा जाने का चलन है, वैसा हमारे परिवार में भी था और बहुत ही भीषण तरीके का था।

सभी बड़े मजे में एक-एक चीज़ खाकर पचा जाने में लगे थे कि तभी यह धमाका हुआ। धमाका क्या हुआ कि सभी के प्राण जैसे हलक में अटक गए...। जो कुछ भी पचना था, वह तो पचा नहीं, बाकी भी अधर में लटक गया। साँप-छछूंदर की हालत हो गई। न निगलते बन रहा था, न उगलते...। बस, डर के मारे घिग्घी बँध गई। जिसे जहाँ जगह मिली, वहीं दुबक गया।

गोली मेरे मोबाइल से चली थी, सो बोली भी मेरी ही गई। होश आया तो सब मुझे झिंझोड़ रहे थे और चाचा जी पूरी तरह होश में आने के बाद दहाड़ रहे थे,"यह किस हरामज़ादे की करतूत है जो मोबाइल की शक्ल का रिवाल्वर खरीद लाया...। यह तो कहो कि गोली सही निशाने पर नहीं लगी, वरना अनर्थ ही हो जाता..।"

उनका निशाना अपने समधी पर था, जो अपनी बेटी की शादी का न्यौता देने हमारे घर पधारे थे और लगे हाथ चाचा जी के धन से ही सारी खरीददारी कर रहे थे। चाचा जी बेचारे कुछ बोल भी नहीं सकते थे। चाचा जी की खुद की बेटी जो उनके लायक बेटे से ब्याही थी और उनके परिवार के साथ उनके समधी भी इस राज़ को जानते थे कि बिजली विभाग के एक ऐसे पद पर वे तैनात हैं, जहाँ काटने और जोड़ने का काम धड़ल्ले से होता है और जो भी इस काम में बाधा डालने की कोशिश करता है, उसे काट खाने में चाचाजी ज़रा भी गुरेज नहीं करते। उनकी इसी आदत के चलते चाची जी प्रायः उन्हें कटखना बन्दर कहती हैं और उनके सहकर्मी पीठ पीछे भ्रष्ट, दुराचारी व काले धन पर कुंडली मार कर बैठा काला नाग कहते हैं...। चाचा जी को इससे फ़र्क नहीं पड़ता...फ़र्क पड़ता है तो सिर्फ़ अपने समधी से, जो गाहे-बगाहे उनके (काले) धन का दुरुपयोग करता रहता है।

खैर, मैं विचारों में भटकी कि तभी एक और गोली दगी। अब सब के प्राण हलक से निकल कर अनन्त आकाश में विचरण करने को उद्यत हों कि मैने झट से मोबाइल ऑन कर कान से सटा लिया। किसी को भी पता नहीं था कि मेरे घर आए मेरे नटखट भानजे ने चुपके से कब गोली वाला रिंगटोन मेरे मोबाइल में लगा दिया था। उसने मुझे कई बार सुनाया भी था पर फिर भी हर बार मैं डर जाती। गोली है ही ऐसी चीज़...जो खिलाए वो तो संकट में पड़े ही और जो खाए, वो भी संकट में...।

मैने मोबाइल कान से लगाया ही था कि तभी एक घरघराती आवाज़ ने फिर से मुझे हिला दिया,"बहिन जी, नमस्कार...। कुछ समय पहले मैने आपका भ्रष्टाचार और काले धन पर एक जोरदार लेख पढ़ा था। उस लेख को पढ़ने के बाद से मैं सो नहीं पाया हूँ...। मैने अपने एक बक्से में अपनी घरवाली से छिपा कर कुछ रुपए रखे हैं। यह रुपए मुझे एक आदमी ने दिया था, अपने समधी को पिटवाने के लिए...। अब मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि रुपया लेकर किसी का काम करना और फिर उसे छिपा कर रखना, क्या भ्रष्टाचार और कालेधन की सीमा में आता है...? आपकी बड़ी मेहरबानी होगी अगर आप इसका सही अर्थ मुझे समझा दें...। वरना सच कहता हूँ कि इस रात्रि जागरण के कारण कुछ ही दिनों में मैं अपने प्राण त्याग दूँगा...।"

अब मेरे प्राण संकट में पड़ गए। मुझे याद ही नहीं आ रहा था कि इस खतरनाक विषय पर मैने लेख कब लिखा...? और बिना लिखे वह कब और कहाँ प्रकाशित हुआ...?

मोबाइल पर अब भी फटे बाँस-सी वह आवाज़ तड़तड़ा रही थी,"बहिन जी, बड़ी दया होगी जो आप भ्रष्टाचार व काले धन के बारे में बताएँ...।"

मैं क्या बताती, जबकि मुझे खुद नहीं पता था कि भ्रष्टाचार व काला धन है क्या बला...? मैने उससे इस विषय पर शोध कर बताने के लिए कुछ दिनों का समय माँग कर फोन तो काट दिया, पर अब मेरी नींद उड़ गई थी...ठीक उसी तरह जब आदमियों से भरी एक गोष्ठी में एक महाशय ने गोली की तरह सहसा ही मेरी ओर एक प्रश्न दाग दिया था,"आप कविता और कहानी से क्या समझती हैं...? यह कहाँ से निकलती है...?"

अब मैं ठहरी एक साधारण गृहणी...छिटपुट लेख लिख लेती थी पर इसका मतलब यह तो नहीं था कि मैं सब के निकलने का स्थान याद करती फिरूँ...पर फिर भी अपनी बुद्धिमत्ता दर्शाने के लिए कहा,"जो आत्मा से निकले, वह कविता है...और जो दुनिया से निकले, वह कहानी...।"

सबको साँप सूँघ गया था। हिमालय से गंगा निकलते तो सबने सुना था, पर आत्मा और दुनिया से भी कुछ निकल सकता है...?

मुझे बहुत दुःख हुआ। पूरी दुनिया में इन दो वाक्यों के कारण (?) इतना हाहाकार मचा हुआ है। सारा कामधाम छोड़ कर नेता-कुनेता इसे सुलझाने में लगे हैं और एक मैं हूँ कि अपनी ही दुनिया में सिमट कर सिर्फ़ अपने घर के भीतर पथभ्रष्ट लोगों द्वारा स्थापित किए गए भ्रष्टाचार को ही समझने में लगी हूँ...। छिः, मेरी विद्वता घास चरने कैसे चली गई? अब तो मुझे भ्रष्टाचार व काले धन के मुद्दे को गहराई से समझना होगा...। आखिर यह है क्या बला? क्यों अन्ना हज़ारे इसके पीछे पड़े हैं और इसी पीछे पड़ने के कारण सरकार उनके पीछे पड़ी है और इसी क्रम में अब जनता भी बारी-बारी से आकर पीछे पड़ रही है।

सच में यह जानना ज़रूरी है, पर इस समय उससे भी ज्यादा ज़रूरी हो जाता है कि बिना अध्ययन और जानकारी के यह लेख मैने कब लिखा और यदि नहीं लिखा तो दूसरे के किए का रोना लेकर वह आदमी मेरे पीछे क्यों पड़ गया है?

मेरे घर में जितनी भी किताबें थी, सबकी धूल झाड़ कर एक जगह इकठ्ठा किया, रद्दी से सारे अख़बार फिर से उठा लिए, यह जानने के लिए कि आखिर यह सब क्या हो रहा है अपने देश में? यह क्या बहुत बड़ा मुद्दा है? सब सोच रहे हैं, यहाँ तक कि अपराधी, आम व खास , सभी आदमी सोच रहे हैं तो हमें भी तो सोचना चाहिए न...। हम इक्कीसवीं शताब्दी में हैं...। शताब्दी को हम पर गर्व होना चाहिए न...। सो हम पढ़ कम रहे थे, सोच ज़्यादा रहे थे। नतीज़ा खुद-ब-खुद सामने आ गया, गश के रूप में...। अपने कमरे में बैठे-बैठे ही हम इस कदर गश खा गए कि घरवाले लाद कर अस्पताल ले गए...और वह अस्पताल भी कैसा? बदबू से भरे वार्ड के बिस्तर नम्बर चार पर सड़ी हुई चादर के ऊपर लेटे-लेटे यही सुनते रहे,"सालेऽऽऽ, सब भ्रष्ट हैं...। सरकार की सारी दवाई बेच खाते हैं और मरीज बेचारे को खरीदनी पड़ती है...। अरे, ये दवाई बेच-बेच कर मालामाल हो रहे हैं और मरीजों से भी भारी-भरकम फ़ीस वसूलते हैं...। किसी दिन इनके काले धन पर सरकार व इन्कमटैक्स वालों की नज़र पड़ गई न, तो सालों को नानी याद आ जाएगी...।"

उन्हें नानी याद आए, न आए, पर मुझे नानी की बहुत याद आ रही थी। अस्पताल में कष्ट ही कष्ट था, पर इन सबके बीच कम-से-कम भ्रष्टाचार और काले धन के बारे में जानकारी तो मिली।

इस जानकारी के साथ बाहर आई तो इस मुद्दे पर उठा आन्दोलन इतना तेज़ था कि उसने पूरे देश को हिला दिया और कुछ को तो इतना, कि वे मेरी तरह कमज़ोर होकर हिल भी नहीं पा रहे थे।

चारो तरफ़ बस शोर-ही-शोर था। सुना कि आन्दोलन के अगुवा अन्ना हज़ारे तो शान्त भाव से अनशन पर बैठ गए, पर उनके नाम का आड़ लेकर लोग शान्तिभंग करने लगे...। जगह-जगह भ्रष्टाचार व काले धन के साथ सरकार के पुतले जलाए जाने लगे...। मेरे घर के सामने वाले पार्क में हरियाली के बीच हमारे मुहल्लेवालों ने भी (उसमें से कुछ ऐसे भ्रष्ट थे जो पार्क के नाम पर काफ़ी पैसा खा गए और डकार भी नहीं ली...) तीन पुतले जलाए, जिसमें समझ ही नहीं आ रहा था कि कौन सा पुतला किसका है? सभी घास-फूस से बनाए गए थे और सभी की शक्लें एक जैसी थी...बस उनके सीने पर नाम-पट्टिका लगा दी गई थी...। हर पुतले के दहन पर ज़ोरदार ताली बजती...। यह सब कार्यक्रम चल ही रहा था कि तभी कुछ नंगे बच्चों ने दस सिर वाले पुतले, जिसमें कुछ पटाखे थे, आग लगा दी...। धड़ाम-धड़ाम की आवाज़ के साथ पुतला फटा तो पल भर में हाहाकार मच गया...। भ्रष्टाचार कहीं दूर छिटक गया था और काला धन मुख्य मुद्दा बन गया था...। आखिर इन नंगे बच्चों को रावण का पुतला बनाने के लिए धन किसने दिया था...?

इस मुद्दे का गरमाना था कि इधर सुना है कि योग छोड़ कर बाबा रामदेव भी रामलीला मैदान में बैठ गए...। उनके बैठने से मसला और भी गंभीर हो गया...। एक तरफ़ भ्रष्टाचार तो दूसरी तरफ़ काला धन...बीच में फँसी सरकार...क्या करे...? पहले भ्रष्टाचार मिटाए या काला धन वापस लाए...? खैर, यह सरकार के लिए चिन्ता का विषय है...। हमें तो सिर्फ़ यह सोचना है कि इतने बड़े लोग इस मुद्दे को लेकर इधर-उधर बैठे हैं तो हमें भी अब बैठ ही जाना चाहिए...पर कहाँ...? यह सोचने का विषय है...।

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(प्रेम गुप्ता ‘मानी’)

एम.आई.जी-२९२, कैलाश विहार,

आवास विकास योजना संख्या-एक,

कल्याणपुर, कानपुर-२०८०१७ (उ.प्र)

ईमेल: premgupta.mani.knpr@gmail.com

मोबाइल नं: 09839915525

ब्लॉग: www.manikahashiya.blogspot.com

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परिचय:

नाम- प्रेम गुप्ता "मानी"

शिक्षा- एम.ए (समाजशास्त्र), (अर्थशास्त्र)

जन्म- इलाहाबाद

लेखन- १९८० से लेखन, लगभग सभी विधाओं में रचनाएं प्रकाशित

मुख्य विधा कहानी और कविता, छोटी- बड़ी सभी पत्र-पत्रिकाओं में

ढेरों कहानियाँ प्रकाशित ।

प्रकाशित कॄतियाँ- अनुभूत, दस्तावेज़, मुझे आकाश दो, काथम (संपादित कथा संग्रह)

लाल सूरज ( १७ कहानियों का एकल कथा संग्रह)

शब्द भर नहीं है ज़िन्दगी (कविता संग्रह)

अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो (कविता संग्रह)

सवाल-दर-सवाल (लघुकथा संग्रह)

यह सच डराता है (संस्मरणात्मक संग्रह)

शीघ्र प्रकाश्य- चिड़िया होती माँ( कहानी संग्रह)

कुत्ते से सावधान (हास्य-व्यंग्य संग्रह)

हाशिए पर औरत, (लेख-संग्रह)

आधी दुनिया पर वार (लेख संग्रह)

विशेष- १९८४ में कथा-संस्था "यथार्थ" का गठन व १४ वर्षों तक लगातार

हर माह कहानी-गोष्ठी का सफ़ल आयोजन।

इस संस्था से देश के उभरते व प्रतिष्ठित लेखक पूरी शिद्दत से जुडे रहे।

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सम्पर्क- "प्रेमांगन"

एम.आई.जी-२९२,कैलाश विहार,

आवास विकास योजना सं-एक,

कल्याणपुर, कानपुर-२०८०१७(उ.प्र)

ई-मेल- premgupta.mani.knpr@gmail.com

ब्लॉग - www.manikahashiya.blogspot.com

टिप्पणियाँ

  1. ye to puri ek kahani hai .maja aya padh kar .aapki koliyon vali baat se to pahle mae bhi dar hi gai thi .
    aap ne jo kuchh bhi bharshachar pr likha hai sahi hai aur bahut hi rochak andaj me likha hia
    saader
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्रिय मानी जी ,
    आपके लिखने का अंदाज बहुत निराला है ....भ्रष्टाचार पर कितनी सरल भाषा में आपने कितना बड़ा सच कितनी आसानी से लिख दिया !
    रचना जी की तरह आपकी गोली वाली बात ने मुझे भी डरा दिया था .....खैर .....
    बहुत ही गंभीर मुद्दे पर कलम उठाई है !
    आपकी कलम को नमन !
    हरदीप

    उत्तर देंहटाएं
  3. कहानी बहुत अच्छी है|सवाल भी अच्छे उठाए है|जैसे अन्ना हजारे तो शांत भाव से अनशन पर बैठ गए,पर उनके नाम का आड़ लेकर लोग शांति भंग करने लगे...सरकार क्या करे..पहले भ्रष्टाचार मिटाए या काला धन वापस लाए..लिखने का अंदाज बहुत रोचक है...बधाई|

    उत्तर देंहटाएं
  4. भ्रष्टाचार का दैत्य अपना प्रभाव जमाने में लगा है और आप जन उससे बहुत आहता है । इस देश का दुर्भाग्य देखिए कि इस लूट -खसोट को धिक्करने वाला गुनाहगार की तरह समझा जा रहा हि । मानी जी ने सभी पक्षों को नए ढंग से वाणी दी है , हार्दिक बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  5. मानी जी को पढ़ता रहता हूँ। भ्रष्टाचार को लेकर उन्होंने यह व्यंग्य एक अनौखे अंदाज में लिखा है जो पाठक पर सीधे असर करने में कामयाब रहा है…

    उत्तर देंहटाएं
  6. शानदार व्यंग!! :)

    उत्तर देंहटाएं
  7. रोचक शैली में बेहद मारक व्यंग्य !
    आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  8. आप सभी को मेरा बहुत आभार...।

    मानी

    उत्तर देंहटाएं

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