रविवार, 18 सितंबर 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव के दो नवगीत

 

दो नवगीत‌

[1]

फिर सजा मौसम सुहाना

पेड़ पत्ते डालियों का

मुस्कराना गुनगुनाना

रूप धर बहुरूपिया का

फिर सजा मौसम सुहाना।

 

खेल में अठखेलियों की

धुंध अमराई बनी

बादलों में इंद्रधनुषी

आंख की भौंहें तनी

आम के या नीम के

या पेड़ इमली के तले

दिख रहे हैं दूर से ही

मखमली झूले डले

विघ्न पैदा कर रहा है

बादलों का फनफनाना।

 

तरुणियों पर वार होते

प्रेम की आखेट में

काम बाणों की झड़ी

अंगड़ाइयों की ओट में

दूर पर्वत पर फुहारों की

कतारें नाचती सीं

चोटियों के प्रेम पत्रों की

लिखावट बांचतीं सीं

बादलों की बाहुओं में

बिजलियों का कसमसाना।

 

मनचलों की राजभाषा में

हवायें बोलती हैं

दिल लगाने का ठिकाना

खोज करती डोलती हैं

ताल सरिता निर्झरों के

वस्त्र गीले तर बतर हैं

कर रहे किल्लोल मस्ती

ये वरुण के नाचघर हैं

है सतत जारी धरा का

सांस लेना मुस्कराना।

 

[ 2]

धूप कब की जा चुकी

अब जहां देखो

वहां छाया अंधेरा

धूप कब की

जा चुकी।

 

रोशनी के लेख

सूरज लिख रहा

पर किसे मालूम

है वह बिक रहा

लेख के हर शब्द की

कीमत लगी

आसमानों के फलक ने

दे रखी

फिर बवंडर की

सवारी आ चुकी।

 

आम महुए जाम केले

रोशनी कॊ खल रहे

सोच उनकी, क्यों मधुर फल

डालियों में फल रहे

झोपड़ी कच्चे घरों की

हंसी उनको टीसती है

देखकर इनको,व्यवस्था

दांत अपने पीसती है

सत्य जबड़े में फंसा

ईमान अपना खा चुकी है।

 

पाल को भी भय लगा

नाव कैसे पर हो

अंधड़ों के चंगुलों में

रोज ही मंझधार हो

थे कभी तारण तरण

वे ही डुबाने पर तुले

है सभी कुछ अब प्रमाणित

साक्ष्य सारे मिल चुके

आस्था विश्वास इज्ज्त

खाक में मिलवा चुकी।

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