गुरुवार, 15 सितंबर 2011

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़ल

image

ग़ज़ल 63

रहा न कोई शिकवा बाकी अब मतलब के यारों से।

एक एक कर काम पड़ा जब अपने रिश्‍तेदारों से॥

 

किसी का चूल्‍हा ठण्‍डा करके जिन्‍हे चुरा ले आयें हैं,

जल जाओेगे हाथ सेंकने वालों इन अंगारों से।

 

कई डोलियां और अर्थियां इस आंगन से विदा हुई,

कब कब सच्‍चे आँसू आये पूछो इन दीवारों से।

 

दौलत,रुतबा, हुस्न,जवानी साथ उम्र भर कब देते,

आज सिसकियों में बदली जो आती सदा मजारों से।

 

कहते क्‍या हैं करते कुछ है क्‍या इनके मंसूबे हैं,

हमसे ज्‍यादा कौन हैं वाकिफ इन सब साहूकारों से।

 

हमको सच्‍चा समझ के पढ़ने वाले क्‍या क्‍या सोचेंगे,

पूछ रही हैं आज किताबें छुप छुप कर किरदारों से ।

 

लबादा ओढ़ के खैरख्‍वाह का स्‍वार्थ सामने आयेंगे,

हरगिज बच के रहना 'जांगिड'इन सब रंगे सियारों से।

---

दामोदर लाल जांगिड

--

(अमरेन्द्र, फतुहा, पटना की कलाकृति)

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------