दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़ल

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ग़ज़ल 63

रहा न कोई शिकवा बाकी अब मतलब के यारों से।

एक एक कर काम पड़ा जब अपने रिश्‍तेदारों से॥

 

किसी का चूल्‍हा ठण्‍डा करके जिन्‍हे चुरा ले आयें हैं,

जल जाओेगे हाथ सेंकने वालों इन अंगारों से।

 

कई डोलियां और अर्थियां इस आंगन से विदा हुई,

कब कब सच्‍चे आँसू आये पूछो इन दीवारों से।

 

दौलत,रुतबा, हुस्न,जवानी साथ उम्र भर कब देते,

आज सिसकियों में बदली जो आती सदा मजारों से।

 

कहते क्‍या हैं करते कुछ है क्‍या इनके मंसूबे हैं,

हमसे ज्‍यादा कौन हैं वाकिफ इन सब साहूकारों से।

 

हमको सच्‍चा समझ के पढ़ने वाले क्‍या क्‍या सोचेंगे,

पूछ रही हैं आज किताबें छुप छुप कर किरदारों से ।

 

लबादा ओढ़ के खैरख्‍वाह का स्‍वार्थ सामने आयेंगे,

हरगिज बच के रहना 'जांगिड'इन सब रंगे सियारों से।

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दामोदर लाल जांगिड

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(अमरेन्द्र, फतुहा, पटना की कलाकृति)

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