शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

हिमकर श्याम की कविता - आखिर कब तक?

आखिर कब तक ?

लूट और दमन की इस

संस्‍कृति में अपने संग्रहित

संवेदनशीलता का हम

वहन करना भी चाहें तो

आखिर कब तक ?

 

वायदों की काल-कोठरी में

कीड़े-मकोड़े सी मिल रही

प्रताड़ना को हम

सहन करना भी चाहें तो

आखिर कब तक ?

 

बाढ़ सी बढ़ रही समस्‍याओं

से जूझने के लिए

जलभंवरा बनने का हम

जतन करना भी चाहें तो

आखिर कब तक ?

 

दम तोड़ती इस लोकतांत्रिक

व्‍यवस्‍था के असंख्‍य

कलियुगी रावणों का हम

दहन करना भी चाहें तो

आखिर कब तक ?

 

कब तक सहेंगे दुख

कब तक मरेंगे यूंही

खदबदाती इच्‍छाओं का हम

दमन करना भी चाहें तो

आखिर कब तक ?

 

यह समय है रण का

मर मिटने के प्रण का

प्रतिरोधी भावनाओं को हम

दफन करना भी चाहें तो

आखिर कब तक ?

 

हिमकर श्‍याम

5, टैगोर हिल रोड

मोराबादी, रांचीः 8

3 blogger-facebook:

  1. बहुत अच्छा भैया, एक घुटन के एहसास क़ी प्रभावशाली अभीव्यक्ति.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत खूब. सार्थक प्रस्तुति.

    उत्तर देंहटाएं

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