शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

शंकर लाल कुमावत की व्यंग्य कविता - जनता बड़ी या...

लोकतंत्र: जनता बड़ी या संसद

एक कलयुगी स्टूडेंट ने गजब ढा दिया

शिक्षक दिवस पर, गुरु दक्षिणा की जगह

अपने राजनिति के प्रोफेसर को

लीगल नोटिस थमा दिया

प्रोफेसर को अदालत के कठ्घेरे में खड़ा कर दिया

आरोप लगाया

हजूर,

सर ने मेरे भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है

लोकतंत्र की सही परिभाषा पर जीरो नंबर दिया है|

 

प्रोफेसर ने सिर उठाया

जज को अपना पक्ष समझाया

मी. लोर्ड

इसने सवाल का एकदम गलत जबाब दिया है

संविधान ने लोकतंत्र में

जनता के लिए, जनता के द्वारा

कानून बनाने का हक दिया है

अथार्त लोकतन्त्र में जनता सर्वोपरी होती है

और सबूत के तौर पर संविधान आगे कर दिया |

 

जज को प्रोफेसर का जबाब सही लगा

मगर उसने फैसले से पहले

स्टूडेंट को भी अपनी बात रखने का मौका दिया |

 

स्टूडेंट ने फेसबुक और इंटरनेट का सहारा लिया

एक वीडियो किलिप जारी किया

अखबार का फ्रंट पेज जज के सामने रख दिया

जिसमे मंत्रीजी का वो बयान छापा था

जो उन्होंने संसद में दिया था

“ लोकतंत्र में संसद सर्वोपरी है

जनता की बात सुनना और

मानना कतई जरुरी नहीं है ”

 

सुनकर जज को पसीना आ गया

वो बिन बरसात ही नहा गया

जब देखा की

स्टूडेंट ने भी यही का यही उत्तर दिया था

जिसे प्रोफेसर ने गलत करार दिया था|

 

जज ने कोई फैसला नहीं दिया

क्योकि स्टूडेंट ने लोकतंत्र में

संसद बड़ी या संविधान

ये कठिन सवाल खड़ा कर दिया

जिसके सामने सार ज्ञान बौना पड़ गया |

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शंकर लाल, इंदौर मध्यप्रदेश

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