शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

अमिता कौंडल की कविता - दादी

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(कुछ माह पूर्व अमिता कौंडल की दादी जी का देहांत हो गया विदेश में होने के कारण वे उनके अंतिम दर्शन न कर पाई. उन्होंने अपनी स्वर्गीय दादी को समर्पित यह कविता लिखी है - श्रद्धांजलि स्वरुप )

दादी तुम थी जादू की पुड़िया
आम की खट्टी मीठी चटनी
या हो अदरक का आचार,
सबमें भरा होता था दादी
तुम्हारा स्नेहल मधुर प्यार,


पापा के बचपन की हों बातें
या भारत के बिभाजन की यादें
बड़े प्यार से सुनती थी तुम
दादी तुम सब जानती थी
समय को पहचानती थी


भारत आयी थी दादी
मैं जब पिछले साल
मिलने आयी थीं मुझसे
तुम भैया को लेकर साथ


धर चेहरा हाथों में मेरा
बोली थी तब तुम दादी
गुडिया, मिल न पायूंगी
मैं तुमको अगली बार


जीवन सफ़र को भोग के
चली गईं तुम प्रभु के द्वार
तुम्हारी स्नेहल यादों को
करती हूँ मैं नम प्रणाम

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5 blogger-facebook:

  1. amita ji aapki kavita aankhin bhiga gai .me aapka darad samajh sakti hoon aapne bahut marmik kavita likhi hai .
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  2. गुडिया मिल न पायूँगी
    मैं तुमको अगली बार ....
    जैसे दादी जानती थी यह बात पहले से ही ....
    .
    दादी के चले जाने का दुःख बता रही है यह कविता !
    अमिता जी आपने बहुत ही मार्मिक कविता लिखी है ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. धर चेहरा हाथों में मेरा /----गुड़िया, मिल न पाऊँगी / मैं तुमको अगली बार । दादी कविता की ये पंक्तियाँ बहुत मार्मिक हैं । अपनों को खोने पर जो तकलीफ़ होती है , वह बहुत व्यथित करती है ।अमिता जी सार्थक और मर्मस्पर्शी रचना के लिए बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेनामी9:00 am

    nice poem such a touching poem for the same subject watch my site www.aloktiwari.org

    उत्तर देंहटाएं
  5. amita kaundal8:54 am

    रचना जी, हरदीप जी, रामेश्वर भाईसाहब व् अलोक जी मेरी दादी जी से वो मेरी प्रत्यक्ष अंतिम मुलाकात थी. उसी को मैं भूल नहीं पाती और कविता के रूप में लिख दिया. व्यथा कुछ कम हुई.
    सादर,
    अमिता

    उत्तर देंहटाएं

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