मंगलवार, 20 सितंबर 2011

संजय दानी की ग़ज़ल - मिल गया काम उस दिन ही दीवाली है, वरना त्योहारों में दिखना क्या छिपना क्या।

दिल के मारों का अब जीना क्या मरना क्या,
बेवफ़ा लोगों से मिलना क्या डरना क्या।

इश्क़ की झोपड़ी दर से महरूम है,
तल्ख झोंकों का आना क्या जाना क्या।

बच्चे फुटपाथ पर जाने क्या ढूंढते हैं,
कूड़े करकट में कुछ खोना क्या पाना क्या।

हुस्न की कश्ती लहरों की जानिब चली,
साहिले शौक से लेना क्या देना क्या।

मिल गया काम उस दिन ही दीवाली है,
वरना त्योहारों में दिखना क्या छिपना क्या।

तेरी आंखों के सागर में दिल क़ैद है,
बेरहम पलकों का उठना क्या गिरना क्या।

वादों के बाग में फ़ंस गया दिल मेरा,
हिज्र के फूलों का सड़ना क्या खिलना क्या।

झूठ के घर में महफ़ूज़ है उनका खत,
खुदगरज़ रिश्तों का घटना क्या बढना क्या।

शमअ के नूर का दानी कायल रहा,
क़ल्बे परवानों का बुझना क्या जलना क्या।

6 blogger-facebook:

  1. हरेन्दर जी व सतीश भाई का आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सर जी आपकी गजल की धारा में हम तो बह गए
    बहुत खूब ....................

    उत्तर देंहटाएं
  3. अनुपमा जी व संजय-सरोज जी का आभार।

    उत्तर देंहटाएं

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