शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

शशांक मिश्र भारती की हास्य व्यंग्य कविता - गधों की सभा

गधों की सभा

मैंने देखा-

आज शहर के सर्वाधिक व्‍यस्‍त चौराहे पर

गधों को सभा करते

ढेंचू-ढेंचू से अपने बन्‍धु-बान्‍धवों

की जिज्ञासा शान्‍त करते,

पहुंचकर मैंने जब पूछा-

अरे भाईयों, क्‍या हो रहा है-

 

किस तरह का आप सबका

यहां जमाबाड़ा चल रहा है,

सभा तो ऐसी मनुष्‍यों की होती,

परन्‍तु-

स्‍वर ढेंचू का ही मेरे कानों मे पड़ रहा है

क्‍या अड़कर दुलत्‍ती भी मार दे रहे हैं

आप अपने बन्‍धु-बान्‍धवों को।

 

सुनते ही मेरे मुंह से इतना

बोल पड़ा, उनमें से एक बूढ़ा गधा

जनाब जुबान को लगाम दीजिए-

हम बात वाले हैं, बाप रखते हैं

दुलत्‍ती और ढेंचू का नाम मत लीजिये

ये तो हमारी जाति के गौरव का नमूना है

जिससे प्रभावित होकर अनेक

आप जैसे मेरी जाति में सम्‍मिलित हैं होते,

हम तो पीछे से ही मारते हैं,

वह चारों ओर से मरते हैं और गधाश्री की उपाधि पाते हैं,

तो कभी मूर्ख गधा भी बन जाते हैं।

 

हम सभी ढेंचू ही करते

कभी अपने मालिक को धोखा नहीं देते

और फिर हम केवल शरीर से गधे हैं

न कि मस्‍तिष्‍क से।

लेकिन-

आपने तो मेरे बच्‍चों का जीना ही मुश्‍किल किया है

जब निकले- तो कोई न कोई उंगली उठाता

और है कहता-रे, गधे के बच्‍चे देख

वो सामने गधा खड़ा है।

 

शर्म आती है बार-बार

इस तरह अपना नाम सुनकर,

फिर आप मे से कई लोगों ने

गधा बनना मान लिया है

दुलत्‍ती मारना मालिक को

स्‍वकर्तव्य ठान लिया है।

 

यह युग है प्रजातंत्र का

आपकी सभा हो या सदन में,

दुलत्‍ती ही नहीं दुहत्‍था भी मारते हैं,

प्रसन्‍न होती विदेशी प्रतिनिधियों की मण्‍डलियां

हम सब तो गधे हैं केवल जाति के

आप से मनुष्‍यता से पतित हो

तन और मन से गधा बन गए हैं

आपकी गधेयित मुझे शर्म ला रही है

अपने आपको गधा कहूं या और

श्रीमानजी समझिए-

यही है आज की इस सभा का विषय भी।

--

हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 उ.प्र. दूरवाणी-9410985048

ईमेलः- shashank.misra73@rediffmail.com

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