शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

विजय वर्मा की कविता - एक कतरा दुख

विजय वर्मा

एक  कतरा दुःख

एक कतरा ही तो था 

दुःख का,

फैला कर जिसे फलक कर दिया ,

पलक झपक भर तो थी 

वेदना उपेक्षाओं की,

अधैर्य ने जिसे अपलक कर दिया.

दो कटु बोल ही तो थे,

विष  का प्याला तो ना था .

गुजरने देता बिन-स्पर्श ,

नभ में फैलता कोई ज्वाला तो ना था.

रे मन अधम!

एक छोटे दुःख को 

क्यों टुकड़ा -टुकड़ा,

क्यों शत -शत कर दिया.

बंद था जो अंतर्मन के दूर  किसी कोने में 

क्यों कासदन उसे जगत कर दिया.

[ शब्दों से स्वर्ग बनता है,

शब्द ही नरक बनाते है,

शब्दों की है महिमा बड़ी,

गला मिलाते है,गला कटवाते हैं  ] 

.....................................................

कासदन=जानबूझ कर 

--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

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