शनिवार, 17 सितंबर 2011

धनंजय कुमार उपाध्याय की कविता

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दरिद्र

मंदिर की सीढ़ियों पर

वह पड़ा

हाथ में कटोरा

जस्‍ते का जड़ा

हर व्‍यक्‍ति पर

एक ही नजर

कोई दे दे चवन्‍नी या

रोटी पेट भर

आशा थी लम्‍बी

बात छोटी

उसमें भी सुननी पड़ती

खरी-खोटी

एक मानव

सभ्‍य समाज का

कटोरे में डालकर चवन्‍नी

खड़ा था

''बारह आने '' लौटाने की आस में

दरिद्र कौन

समक्ष में नही आया

थोड़ी देर बाद

सीढ़ियों पर से एक हाथ

हवा में लहराया

ले लो बाबूजी

ये पैसे ,

आप लोगों की ही

बदौलत !

हम पड़े हैं

जैसे - के- तैसे

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धनंजय कुमार उपाध्‍याय

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