सोमवार, 19 सितंबर 2011

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य : चौपाल व्यंग्यकारों की


चौपाल व्‍यंग्‍यकारों की


- यशवन्‍त कोठारी

जब ब्रह्मचारी से लेकर सदाचारी तक की चौपाल बिछ गयी, खुशवन्‍त सिंह भी निपट गए तो मैंने सोचा हिन्‍दी के व्‍यंग्‍यकारों से मुझे ही निपटना पड़ेगा। कमल सहाय इस ओर ध्‍यान देने में असफल रहेंगे।

जब तय हो ही गया तो मैंने कन्‍धे पर झोला लटकाया, पत्रकारों वाली डेढ़ सेन्‍टीमीटरी मुस्‍कान चेहरे पर चिपकाई, कैमरे को कांख में दबाया और चल दिया, चौपालों के शहर जबलपुर।

चौपाल परसाई की-त्‍यागीजी के अनुसार मध्‍यप्रदेश के शहर जबलपुर में दो चीजें महत्‍वपूर्ण हैं,एक हरिशंकर परसाई और दूसरी भेड़ा घाट। चूंकि मैंने आज तक दोनों को नहीं देखा है, मैं इस बारे में अधिकृत रूप से लिख सकता हूं।

परसाईजी कबीर से अभी-अभी सलाह करके एक पीठ से उतरे थे। किस्‍मत की बात उम्र के इस साठवें दौर में एक चकल्‍लस, अकादमी और शिखर याने कुल मिलाकर करीब पचास हजार का नकद मुनाफा और मजा ये कि चकल्‍लस लेने खुद नहीं गए, शिखर लेने गये या नहीं, इसकी सूचना चौपाल नहीं पहुंची।

परसाईजी से पूछा-ये सरकारें कैसे चलती है, उलट बांसी सुनाने में माहिर परसाईजी बोले, एक राजा थे, भंग वंग के शौकीन थे। एक रोज रात को ज्‍यादा चढ़ गयी, नशे में खाट के नीचे खिसक गए, देखा-धड़ तो खाट पर पड़ा है और सिर नीचे है, टटोल कर देखा, सर का पता नहीं लगा, तो रानी को आवाज देकर कहने लगे-सुनो, तलवार लाना, शायद मेरा सिर किसी ने काट लिया है, उसे मारना है, रानी समझदार थी, बोल पड़ी-यदि सर कट गया तो आप बोल कैसे रहे हैं ?
राजा ने कहा- अटकल (तरकीब) से बोल रहा हूँ।

तो हे चौपालकार ! यह सरकार तो अटकल याने तरकीब से चल रही है। तीसरी आजादी के जांच कमीशन से तुलसीदास चन्‍दन घिसे तक की महती यात्रा और रानी नागफनी के केक्‍टस देखकर कौन विकलांग श्रद्धा के चक्‍कर में पड़े।

वहां से उठा और भोपाल में चौपाल जमाने चल दिया।

चौपाल शरद जोशी की- शरद जोशी की एक विशेषता है कि उनका स्‍थायी निवास भोपाल और बम्‍बई है, अक्‍सर दोनों जगह नही पाए जाते, पहले खार में डेरा था, आजकल यशवन्‍त नगर में बिराज रहे हैं। चकल्‍लस और काका हाथरसी पुरस्‍कार पर हाथ साफ कर चुके हैं।

शरद पूरे देश में व्‍यंग्‍य पढ़ते हैं, फिर भी समय बच जाता है तो नाटक और फिल्‍मों में घुस जाते हैं, फिर भी मन नहीं मानता तो मद्रास जाकर मन का आंगन लिख आते हैं। हिन्‍दी एक्‍सप्रेस को चालूकर के बन्‍द कर चुके हैं। पिछले दिनों जीप पर सवार इल्‍लियों के चक्‍कर में अन्‍धों का हाथी भी बना चुके हैं। कमलेश्‍वर अशोक बाजपेई से लगाकर अज्ञेय तक पर व्‍यंग्‍य लिख चुके हैं। आजकल भोपाल के कवियों पर मेहरबान हैं।

मैंने पूछा- शरद भाई, आखिर यह देश चल कैसे रहा है ?

अमां यार, तुम तो निहायत भोंदूं हो। लो, एक कहानी सुनो।

अंग्रेज लार्ड जब देश छोड़कर जा रहे थे, बंगले से निकलते समय सभी नौकरों को बख्‍शीश दे रहे थे। एक साइस कुछ देर से आया। बख्‍शीश खत्‍म हो चुकी थी। साईस ने अर्ज किया- हुजूर मेरे आवारा बच्‍चे को कोई नौकरी दीजिए।

लार्ड परेशानी में, उन्‍होंने कुछ सोचा और सैक्रेटरी को कहा-
इसके लड़के को डिप्‍टीकलक्‍टर बना दो-
साईस बेचारा परेशान, आवारा नाकारा लड़का और डिप्‍टी कलक्‍टरी, बोला-हुजूर। हंसी न करे, लड़का बेपढ़ा है।

लार्ड ने कहा-फिकर मत करो, कुर्सी सब सिखा देगी।

और शरद भाई ने कहा-‘‘इस देश में कुर्सी सब सिखा देती है, देखो देश चल रहा है, या नहीं।''
शरद भाई इतना कह कर फिल्‍मों में चले गये। मैंने चोपाल उठाई और दिल्‍ली होता हुआ मेरठ आ पहुंचा।

चौपाल त्‍यागीजी की- त्‍यागी जी को दो चीजें बहुत प्रिय हैं- युवतियां और श्‍वान समुदाय, इन दोनों के बाद जो समय बचता है, उसमें वे शेर सुनाकर सिगरेट सुलगा लेते हैं। भित्त्‍ाि-चित्रों पर माल्‍लिनाथ की परम्‍परा में ऋतु वर्णन करते हुए इस देश के लोगों को भद्र पुरुष बनाने पर तुले हुए हैं।

जब भी समय मिलता है, फाइलों पर आंकड़ों के हल जोतते रहते हैं। इधर तबादलों में व्‍यस्‍त हैं, कहने लगे ये चौपाल-वोपाल जो है न सो है ही, और जो नहीं है सो तो नहीं ही है। वैसे चौपाल का रंग युवतियों के साथ ठीक आता है। वैसे भी एक शायर ने कहा है- लेकिन मैं शायर नहीं हूं अतः पूछा-आप बताएं, यह देश कैसे चल रहा है ?

चल रहा है- किस बेवकूफ ने कह दिया कि देश चल रहा है, देश तो चौंसठ वर्षों से एक ही जगह है, केवल जूते चल रहे हैं।

हे पाठकों ! बात जब चौपाल से जूतमपैजार पर आ गयी तो मैंने रुखसत होना ही उचित समझा। इति श्री चौपाल जिज्ञासा।
(सभी से क्षमायाचना सहित!)

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यशवन्‍त कोठारी
86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,
जयपुर-302002 फोनः-2670596
ykkothari3@gmail.com

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