शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

राहुल तिवारी की कविता - हे विप्र!

image

हे विप्र !

हे विप्र ! पाने को तंडुल
मत हो अब तू इतना व्याकुल
ना अर्जुन से हैं,  शिक्षार्थी 
ना एकलव्य से रहे विद्यार्थी
जीवन हो गया दिल्ली-काबुल
ना रहे कौरव और पांडव
ना ही रहा शिक्षा का मूल
हे विप्र ! पाने को तंडुल
मत हो अब तू इतना व्याकुल

खत्म हो गई वो शिक्षा
खत्म हुई गुरु की दीक्षा
अब तेरा कोई शिष्य कैसा
शिक्षा के बदले देता पैसा
गुरु-शिष्य के पावन भूत पर
मत हो तू इतना शोकाकुल
हे विप्र !  पाने को तंडुल
मत हो अब तू इतना व्याकुल

कलयुग आया, अवसर लाया
छोड़ कर्तव्यबोध अपना ले समय की छाया
नया युग है नयी चाल अपना ले
अब नए व्यवसाय का सपना ले
ना रहे वे छात्र ना वो तीर शूल
ना वो मात-पिता ना कौरव-पांडव का कुल
हे विप्र ! पाने को तंडुल
मत हो अब तू इतना व्याकुल

---

    राहुल तिवारी
c /o बाल्मीकि तिवारी
नाम्नाकला (पानी टंकी के पास )
अंबिकापुर
जिला - सरगुजा  (छत्तीसगढ़ ) 497001
इ-मेल  - rahultiwari131985@gmail.com

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------