राहुल तिवारी की कविता - हे विप्र!

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हे विप्र !

हे विप्र ! पाने को तंडुल
मत हो अब तू इतना व्याकुल
ना अर्जुन से हैं,  शिक्षार्थी 
ना एकलव्य से रहे विद्यार्थी
जीवन हो गया दिल्ली-काबुल
ना रहे कौरव और पांडव
ना ही रहा शिक्षा का मूल
हे विप्र ! पाने को तंडुल
मत हो अब तू इतना व्याकुल

खत्म हो गई वो शिक्षा
खत्म हुई गुरु की दीक्षा
अब तेरा कोई शिष्य कैसा
शिक्षा के बदले देता पैसा
गुरु-शिष्य के पावन भूत पर
मत हो तू इतना शोकाकुल
हे विप्र !  पाने को तंडुल
मत हो अब तू इतना व्याकुल

कलयुग आया, अवसर लाया
छोड़ कर्तव्यबोध अपना ले समय की छाया
नया युग है नयी चाल अपना ले
अब नए व्यवसाय का सपना ले
ना रहे वे छात्र ना वो तीर शूल
ना वो मात-पिता ना कौरव-पांडव का कुल
हे विप्र ! पाने को तंडुल
मत हो अब तू इतना व्याकुल

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    राहुल तिवारी
c /o बाल्मीकि तिवारी
नाम्नाकला (पानी टंकी के पास )
अंबिकापुर
जिला - सरगुजा  (छत्तीसगढ़ ) 497001
इ-मेल  - rahultiwari131985@gmail.com

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1 टिप्पणी "राहुल तिवारी की कविता - हे विप्र!"

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