मंगलवार, 20 सितंबर 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की दो रचनाएँ

पागल लफ्फेबाजों का आ जाता हर दिन बयान


पागल लफ्फेबाजों का आ जाता हर दिन बयान
जैसे कौवे चीख रहे हों भौंक रहे हों श्वान।


कहा किसी ने उन‌को पागल विकृत हुआ दिमाग
पागलखाना भेजो उनको व‌ही उचित एक स्थान।


बिना बयान के चैन न आये रात न आये नींद
बिना बयान के हज़म न होता उसको भोजन पान।


दौड़ रहे कौओं के पीछे इधर उधर सब ओर
कहते हैं कि कौवे उनके चुरा ले गये कान।


कुछ सनकी है और सिरफिरा जैसे डाकू चोर
चेहरे पर दिखती है हरदम कुटिल धूर्त मुस्कान।


वजन कहां उसकी बातों में है झूठे मक्कार
उनके धृष्ट भ्रष्ट कर्मों को लोग गये हैं जान।


इनसे रहाअ दूर हमेशा सौ दो सौ गज दूर‌
इनकी बेहूदा बातों पर कभी न देना ध्यान।


--

एक नव गीत‌


भारती फिर से करेगी मंच संचालन‌
लग रहा है देश के
हर प्राण का तन मन‌
क्रांति की करवटों का
लक्ष्य परिवर्तन।

इतिहास का निर्माण नव‌
भूगोल नव आकार‌
इस तरह से हो सकेंगे
स्वप्न सब साकार‌
तीव्र से हो तीव्रतर‌
फिर तीव्रतम की ओर‌
बह उठेगी प्राणधारा
विश्व में चहुं ओर‌
कर रहा है आंकलन‌
अब विश्व का जन मन।


वह पुरातन शौर्य वैभव‌
स्वर्ण युग की बात‌
फिर उसे वापिस बुलाने
बढ़ रहे हैं हाथ‌
तंत्र की न साधना है
मंत्र का न जोर‌
सत्य के ही सद कदम पर‌
ले जा रहे उस ओर‌
भारती फिर से करेगी
मंच संचालन।

4 blogger-facebook:

  1. dono hi rachnaaye bhaavpurn abhivaykti....

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी6:03 pm

    acchi prastuti
    Goverdhan yadav

    उत्तर देंहटाएं
  3. गोवर्धन यादव11:14 am

    अच्छी रचनाएं है. सच है ,आज कल लोगों को कुछ ज्यादा ही उलटी-सीधी बाते करते रहने की आदत सी हो गई है. शायद उनका मकसद यह है कि हर तरफ़ छाए रहें. सही भी है कि आप अच्छा काम करे तो कोई पूछने वाला न मिले.किसी बडॆ को एक चांटा जड दो,पूरा शहर आपको जानने पहचानने लगेगा और झुककर नमस्कार भी.

    उत्तर देंहटाएं

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